महिलाओं द्वारा संचालित एशिया का यह सबसे बड़ा बाजार राज्य के इतिहास और प्रतिरोध का प्रतीक रहा है
मणिपुर में आए भूकंप को हफ्ता भर बीत चुका है. रिक्टर स्केल पर 6.7 की तीव्रता वाले इस भूकंप की राष्ट्रीय स्तर पर कोई खास चर्चा इस दौरान नहीं हुई. लेकिन मणिपुरवासी शायद ही यह भूकंप कभी भूल पाएं. इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि इस आपदा में नौ लोग मारे गए और सैकड़ों घर तबाह हुए हैं. इस भूकंप से ईमा कीथेल या ‘मांओं का बाजार’ को काफी नुकसान पहुंचा है और पूरे मणिपुर के लिए यह अलग तरह का भावनात्मक नुकसान है.
ईमा कीथेल को मणिपुर की सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का केंद्र माना जाता है. भूकंप के बाद इस विशाल इमारत के खंबों और दीवारों को जो नुकसान पहुंचा है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि फिलहाल यह यह मार्केट तबाह हो चुका है.
इस बाजार में दिन के किसी भी समय 5000-6000 महिला दुकानदार मौजूद रहती थीं और राजधानी ही नहीं मणिपुर के दूसरे हिस्सों से आई महिलाएं भी यहां दुकानदारी करती थीं
इंफाल का ईमा कीथेल सिर्फ मणिपुर या भारत ही नहीं एशिया की भी एक बड़ी पहचान रहा है. इसे महाद्वीप में महिलाओं के सबसे बड़े बाजार का दर्जा का हासिल है. मणिपुर विश्वविद्यालय में मानवशास्त्र के अध्यापक डब्ल्यू नबकुमार बताते हैं कि इस बाजार में दिन के किसी भी समय 5000-6000 महिला दुकानदार मौजूद रहती थीं. राजधानी ही नहीं, मणिपुर के दूसरे हिस्सों से आई महिलाएं भी यहां दुकानदारी करती थीं और सामान खत्म होने पर वापस लौट जाती थीं. नबकुमार कहते हैं कि यहां सामानों की बिक्री और खरीददारी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है. ईमा कीथेल में सूखी मछली, मसाले, सब्जियों से लेकर खिलौने और स्थानीय स्तर पर बने कपड़े तक मिलते थे.
ईमा कैथेल ने इतिहास के कई दौर देखे हैं
दुनिया के लिए ईमा कीथेल की पहचान सिर्फ आर्थिक वजह हो सकती है लेकिन मणिपुरवासियों के लिए ऐसा नहीं है. ‘यह मणिपुर के इतिहास का हिस्सा है’ नबकुमार कहते हैं, ‘काफी पहले से मणिपुरी समाज की महिलाएं अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आई हैं.’ यह बीती शताब्दी के शुरुआत की बात है. भारत पर अंग्रेजी राज के समय टीसी होडसन राज्य के अधीक्षक थे. वे अपनी किताब- द मैतीज, में लिखते हैं, ‘मणिपुर में महिलाएं स्वतंत्र हैं और उन्हें ऊंचा दर्जा हासिल है. सारा आंतरिक व्यापार और क्षेत्र के उत्पादों का कारोबार उनके हाथों में है... सड़क के किनारे सुविधाजनक स्थानों पर बाजार लगते हैं जहां सुबह-सुबह महिलाएं इकट्ठा हो जाती हैं.’
ईमा कीथेल का बाजार जिस विशाल इमारत में लगता रहा है वह मणिपुरी इतिहास के कई हिस्सों की गवाह कही जा सकती है. पक्की इमारत बनने के पहले यहां बांस के ढांचे से बनी दुकानें हुआ करती थीं. 1891 में यहां अंग्रेजों का शासन स्थापित हुआ और उन्होंने स्थानीय अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने की शुरुआत कर दी. नबकुमार जानकारी देते हैं, ‘उन्होंने यहां लोहे की चद्दरों की छत वाले बाजार का निर्माण करवाया था. यह ढांचा अस्सी के दशक तक रहा. फिर यहां इस विशाल इमारत का निर्माण हुआ.’
अंग्रेजों ने जब मणिपुर में अपने फायदे के लिए आर्थिक नियम बनाए तो 1904 में ईमा कीथेल की महिला दुकानदारों ने इसके खिलाफ एक लड़ाई लड़ी थी
सिर्फ बाजार नहीं प्रतिरोध का प्रतीक भी है
ईमा कैथेल बाजार
ईमा कैथेल बाजार
ईमा कीथेल एक शताब्दी से भी ज्यादा समय से प्रतिरोध का प्रतिरोध केंद्र बना हुआ है. अंग्रेजों ने जब मणिपुर में अपने फायदे के लिए आर्थिक नियम बनाए तो 1904 में ईमा कीथेल की महिला दुकानदारों ने इसके खिलाफ एक लड़ाई लड़ी थी. इसे नूपी लान (महिलाओं का युद्ध) कहा जाता है और यही घटना 1939 में भी दोहराई गई.
आजादी के बाद जब राज्य में कई विद्रोही आंदोलन शुरू हुए, हिंसक घटनाएं रोजमर्रा की बात हो गईं तब यह बाजार सामाजिक-राजनैतिक विचारों के आदान-प्रदान की जगह बन गया. ‘प्रिंट मीडिया की अनुपस्थिति में ईमा कीथेल राज्य के दूर-दराज के इलाकों में संदेश पहुंचाने का केंद्र बन गया था.’ नबकुमार बताते हैं, ‘लोग अलग-अलग हिस्सों से यहां आते थे और फिर वापस अपने क्षेत्रों में सूचनाएं और खबरें देते थे.’
ईमा कैथेल प्रतिरोध का प्रतीक तो है लेकिन साथ ही इसने राज्य में अलग-अलग तबकों को एक साथ लाने का काम भी किया है
ईमा कैथेल की यह इमारत कांगड़ा किले के नजदीक ही है. 2004 में जब सुरक्षाबल जवानों द्वारा एक थांग्जाम मनोरमा के बलात्कार और हत्या की बात सामने आई थी तब कांगड़ा किले के सामने कुछ महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर विरोध प्रदर्शन किया था. यह खबर कई दिनों तक राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय रही थी. उस दौरान हुए विरोध प्रदर्शनों में ईमा कैथेल की दुकानदारों ने भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था.
ईमा कैथेल से जुड़े महिला संगठनों ने हमेशा ही राज्य में मानवाधिकार हनन के खिलाफ होने वाले विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया है. छात्र संगठनों के पक्ष में भी ये संगठन हमेशा खड़े दिखते हैं.
ईमा कैथेल प्रतिरोध का प्रतीक तो है लेकिन साथ ही इसने राज्य में अलग-अलग तबकों को एक साथ लाने का काम भी किया है. एक ऐसा राज्य जहां जातीय विविधता कई संघर्षों की बुनियाद है वहां यह बाजार इस विविधता को एक साथ लाने और सामांजस्य बिठाकर आगे बढ़ने का मौका देता है. बाजार में मणिपुर के हर हिस्से की बोली, खानपान और रवायतें एक साथ देखी जा सकतीं है. नबकुमार कहते हैं, ‘यह मैती, मुस्लिम और पहाड़ी क्षेत्रों की तमाम जनजातियों का बाजार है.’
भूकंप ने मणिपुरी लोगों के मेलजोल के सबसे महत्वपूर्ण स्थान को तबाह कर दिया है. लेकिन ईमा कैथेल का इतिहास बताता है कि इससे जुड़ी भावना को मणिपुर में किसी इमारत की दरकार नहीं है.
(यह हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन पर प्रकाशित आलेख का संपादित स्वरूप है)