‘दानिश, अयोध्या चलें क्या? बुलेट से?’ राहुल भाई ने जब यह पूछा तो उनके सवाल के दूसरे हिस्से ने मुझे ज्यादा उत्साहित किया. ‘बुलेट से.’ दिल्ली से अयोध्या की दूरी लगभग सात सौ किलोमीटर है. इतना लंबा सफ़र बुलेट से तय करना किसी चुनौती से कम नहीं था. वैसे चुनौती तो यह भी थी कि एक मुसलमान ‘वहीं’ जा रहा था. ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ वाला ‘वहीं’. लेकिन इस चुनौती से ज्यादा अभी तो यही बात रोमांचित कर रही थी कि मैं बुलेट पर इतने लंबे सफ़र को जा रहा हूं. मैंने तुरंत हामी भरते हुए कहा, ‘चलो दद्दा.’ राहुल भाई को मैं कॉलेज के दिनों से ही ‘दद्दा’ कहकर बुलाता हूं. मैंने पूछा, ‘बताओ दद्दा कब चलना है?’ उन्होंने कहा ‘अभी.’

नई नौकरी शुरू किये अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है. ऐसे में ऑफिस से छुट्टी कैसे मिलेगी? वापस कब लौटेंगे? घर पर क्या बताऊंगा? ये सवाल एक साथ मन में उचल पड़े. लेकिन मेरे उत्साह ने एक साथ ही इन सारे सवालों को दरकिनार कर दिया.

गलत नाम बताकर शायद विवाद से बच सकता हूं. लेकिन तब अगर किसी ने पहचान-पत्र मांग लिया और यह सामने आ गया कि मैं एक मुसलमान हूं और पहचान छिपाकर अंदर जा रहा हूं तो क्या होगा!

हमने एक ही बैग में अपना सारा सामान रखा और घर से नीचे उतर गए. दद्दा ने बुलेट पर कपड़ा मारा और बोले, ‘बैठ.’ मैं बैठते हुए उनसे बोला, ‘दद्दा क्या इत्तेफाक है. जो राम मंदिर-बाबरी मस्जिद सारे देश में हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों की जड़ हैं, उसे देखने हम दोनों पहली बार एक साथ ही जा रहे हैं. एक मुगलों का वंशज मुसलमान और एक देवभूमि का ब्राह्मण.’ इस पर हम दोनों ही हंसे और लाजपत नगर से नोएडा की तरह बढ़ चले.

आगरा पहुंचते-पहुंचते सूरज ढ़लने लगा था और अभी हमने एक-तिहाई सफ़र भी पूरा नहीं किया था. अयोध्या अब भी लगभग पांच सौ किलोमीटर दूर था. दिल्ली से निकलते वक्त हमारे उत्साह ने हमें यह सोचने का मौका भी नहीं दिया था कि दिसंबर की यह ठंड इतने लंबे सफ़र में हमारे हौसले को किस बुरी तरह से हिला सकती है. हमने यह तो सोचा था कि यदि पहले दिन अयोध्या न पहुंचे तो रात को लखनऊ में ही रुक जाएंगे. लेकिन आगरा से इटावा की ओर बढ़ते हुए ही अंधेरा होने लगा था. ऐसे में लखनऊ पहुंच पाना भी मुमकिन नहीं लग रहा था. तीन सौ किलोमीटर से ज्यादा का सफ़र हम तय कर चुके थे. शरीर अब जवाब देने लगा था. इटावा पहुंच कर हमने सड़क किनारे बनी एक चाय की दुकान पर बुलेट रोकी. मिटटी के कुल्हड़ में गर्मागर्म चाय पी, आग में कुछ देर हाथ सेंके और फिर आगे बढ़ गए. अब बुलेट मैं चला रहा था और दद्दा पीछे बैठे थे.

अब मन में वे ख्याल आने लगे जिनके बारे में अब तक ज्यादा नहीं सोचा था. ‘मैं अयोध्या जा रहा था.’ वही अयोध्या जहां बाबरी मस्जिद ‘शहीद’ की गई थी. जिसके चलते 90 के दशक में कई दंगे हुए थे. 1992 में मैं सिर्फ तीन साल का था. मुझे कुछ भी याद नहीं कि तब क्या हुआ था. लेकिन मुझे वो सारे किस्से याद आने लगे जो मैंने अपने बुजुर्गों से सुने थे. दादी का सुनाया वह किस्सा जो किसी फ़िल्मी दृश्य से भी ज्यादा फ़िल्मी और भयानक लगता है. दादी ने बताया था, ‘उस वक्त पूरे उत्तर प्रदेश में भयानक दंगे हुए थे. कई लोग मारे गए थे. हमारे मोहल्ले में तब अख्तर नाम का एक शराबी रहता था जो लाशों को अपने ठेले पर ढोया करता था. कई दिनों तक वह रोज़ शाम को लाशें लेकर मोहल्ले में आता था और आवाज़ लगाता था कि ‘आकर लाशें पहचान लो’. जिनके भी घर से कोई बाहर गया होता था वे भागे-भागे जाकर देखते थे कि कहीं उन लाशों में उनके रिश्तेदारों की भी लाशें तो नहीं हैं.’

1992 में मैं सिर्फ तीन साल का था. मुझे कुछ भी याद नहीं कि तब क्या हुआ था. लेकिन मुझे वो सारे किस्से याद आने लगे जो मैंने अपने बुजुर्गों से सुने थे

ऐसा ही एक किस्सा उस वक्त का भी है जब मैं दर्जा आठ में पढ़ता था. सर्दियों का मौसम था, मेरे दादा लिहाफ को चारों तरफ लपेटे हुए, सिर्फ मुंह निकाले चाय पी रहे थे. उनकी चारपाई के पास एक मिटटी के चूल्हे में आग जल रही थी जिसमें चाचा और अब्बा हाथ सेक रहे थे. मैं स्कूल के लिए निकलने ही वाला था तभी चाचा ने रेडियो को ट्यून किया और कहा ‘बाबरी मस्जिद के बारे में कोई खबर है.’ ये सुनकर एक शांति सी छा गई. मेरे अब्बा ने मुझे बुलाया और कहा, ‘बेटा स्कूल में बाबरी मस्जिद के बारे में बात हो तो तू चुप ही रहना.’ मैंने कोई सवाल नहीं किया. तब मुझे लगा था कि शायद बाबरी की बात करने से फेल हो जाते होंगे.

अचानक सामने से आती एक गाडी की तेज रौशनी से मेरी आंखें चौंधिया गई और बुलेट का टायर एक गड्ढे से होता हुआ वापस अपनी गति में आ गया. कमर में जोर का झटका लगा और मेरा ध्यान यादों से लौटकर सड़क पर आया. बुलेट पर बैठे-बैठे लगभग आठ घंटे हो चुके थे. लखनऊ अब भी करीब दो सौ किलोमीटर दूर था. मैंने बुलेट किनारे लगाई और बोला, ‘दद्दा अब और हिम्मत नहीं है. आज लखनऊ नहीं पहुंच पाएंगे. उससे पहले ही कहीं रुकते हैं.’ ‘हां, कानपुर लगभग सौ किलोमीटर दूर है. वहीं रुकेंगे.’ यह कहकर अब दद्दा बुलेट चलाने लगे और मैं पीछे बैठ गया. अब तक शरीर की ऐसी हालत हो चुकी थी कि एक-एक किलोमीटर भी भारी पड़ रहा था. मुझे अचानक कमलेश्वर की ‘कितने पकिस्तान’ याद आ गई. उसमें बाबर का एक संवाद दोहराते हुए मैंने कहा, ‘दद्दा. कितने पकिस्तान में बाबर ने ठीक ही कहा था कि ‘मुझे मंदिर तोड़ना होता तो मैं कृष्ण की जन्मभूमि जाता जो दिल्ली से नजदीक है. मंदिर तोड़ने दिल्ली से इतनी दूर अयोध्या क्यों जाता.’ यार हम इतनी देर से, वो भी बुलेट से, चल रहे हैं और अब भी अयोध्या नहीं पंहुचे. बाबर इतनी दूर कैसे आया होगा?’

रात लगभग दस बजे हम लोग कानपुर पहुंचे. यहां जो पहला ही होटल हमें दिखा उसमें हमने कमरा ले लिया. बिस्तर पर लेटते ही कमर को ऐसा आराम मिला जैसा कई साल पहले स्कूल टीचर की सजा पर घंटों मुर्गा बनने के बाद कमर सीधी करने पर मिला करता था. जल्दी से हमने खाना मंगवाया, खाया, सुबह पांच बजे का अलार्म लगाया और सो गए. नींद आते ही अलार्म बज गया. मुझे लगा शायद गलती से बजा है. लेकिन मोबाइल देखा तो यकीन हुआ कि सच में पांच बज चुके थे. हाथ-मुंह धोया और आगे के सफ़र पर बढ़ गए.

अयोध्या में जब भी ‘जय श्रीराम’ का नारा लगता तो लोगों में भक्ति-भाव से ज्यादा जीत का भाव नज़र आता रहा मुझे. मस्जिद पर मंदिर की जीत, मुसलमानों पर हिन्दुओं की जीत

लखनऊ और बाराबंकी पार करने के बाद हमने एक जगह नाश्ता किया और फिर सीधे अयोध्या पहुंचकर ही बुलेट रोकी. लगभग 11.30 बज चुके थे लेकिन दुकानें अभी खुल ही रही थी. यह शहर यूपी के आम शहरों जैसा ही था. बस यहां मंदिरों की भारी संख्या और साधू-संतों की बहुतायत इसे कुछ हद तक हरिद्वार जैसा भी बना देते हैं. एक पान की दुकान के पास रूककर दद्दा ने पूछा, ‘राम जन्मभूमि किस तरफ है?’ पान वाले के जवाब देने से पहले ही हमारे पीछे से आवाज़ आई, ‘बाबूजी राम लला के दर्शन अब एक बजे के बाद होंगे. 11 से 1 बजे तक राम लला के भोजन और विश्राम का समय होता है. कहिये तो तब तक आपको सरयू में स्नान करवा लाएं और अयोध्या के बाकी मंदिरों के दर्शन करवा दें.’ 20-21 साल के इस लड़के की बात और कहने के अंदाज़ से ही पता चलता था कि वह गाइड है. ‘नाम क्या है तुम्हारा?’ यह पूछने पर दोनों हाथ जोड़ते हुए उसने जवाब दिया, ‘हमारा नाम सौरभ पांडेय है बाबूजी.’

सौरभ ही हमें राम होटल ले गया. यहां कमरा लेने के बाद राहुल भाई ने अपने पत्रकारीय संबंधों का इस्तेमाल करते हुए कुछ नंबर मिलाए और जल्द ही कुछ लोगों से मिलने का समय तय कर लिया. नहा-धोकर हम लोग अयोध्या नगरी घूमने को निकल पड़े. मेरे हाथ में कैमरा था और आस-पास की तस्वीरें उतार रहा था, राहुल भाई लोगों से बात कर रहे थे. होटल के पास ही एक चाय वाले से दद्दा ने पूछा, ‘मंदिर का मुद्दा इन दिनों देश भर में छा रहा है. यहां शहर में कैसा माहौल है?’ चायवाला बोला ‘साहब माहौल तो नेता लोग बिगाड़ते हैं. इन नेताओं ने ही उन लोगों को ज्यादा सर चढ़ा रखा है. अभी बारावफात के दिन कुछ मुसलमानों ने जुलूस निकाला. उन्होंने बाबरी मस्जिद का नक़्शा भी बनाया और वे नारे लगाते हुए पूरे शहर में घूमे.’ वह आगे बोला, ‘गिनती के तो मुसलमान हैं यहां. लेकिन सरकार सिर्फ उनकी ही सुनती है. वो चार होंगे और हम 400 तब भी उन्हीं की सुनी जाएगी.’ राहुल भाई को बारावफात समझ नहीं आया. उन्होंने पूछा, ‘किस दिन की बात है?’ मैं बीच में बोल बैठा ‘बारावफात. पैगंबर का जन्मदिन.’ चायवाले ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया. लेकिन मैं खुद ही असहज हो गया.

बचपन से सुनता आया था कि ‘बाबरी मस्जिद शहीद की गई थी.’ यहां बार-बार सुनने को मिल रहा था कि कैसे बाबरी ‘गिराई’ गई, ‘ढहाई’ गई. इस्लाम के नज़रिए से देखूं तो यह सुनना गुनाह है

वहां से आगे बढ़ने पर राहुल भाई ने मुझसे कहा, ‘दानिश, जब तक जरूरत न हो मैं तेरा नाम नहीं लूंगा. तभी लोग इतना खुलकर अपने विचार बता पाएंगे जितना चाय की दुकान पर बता रहे थे.’ अपने पूर्वाग्रहों के चलते मैं अपनी पहचान को लेकर अहसज महसूस कर ही रहा था. इसलिए राहुल भाई की बात पर मैंने भी तुरंत कहा, ‘हां दद्दा. आप यहां मुझे डैनी कहकर ही बुलाओ. बिजनौर में भी मेरे दोस्त मुझे यही कहते हैं.’

कुछ स्थानीय पत्रकारों से मुलाकात के बाद हम होटल लौटे. होटल के बाहर ही सौरभ हमारा इंतज़ार कर रहा था. हमें देखते ही वह बोला, ‘चलिए बाबूजी दो बज गए हैं. राम लला के दर्शन का समय हो गया है. अपना कैमरा, मोबाइल, कॉपी, पेन, घडी, पर्स, बेल्ट, चश्मा जो भी है होटल में ही रख दो. वहां कुछ भी लेकर जाना एलाउड नहीं है.’ मेरे मन में पहले से ही घबराहट थी. सौरभ की बातों ने मुझे और भी डरा दिया. एक बार को मन में आया कि होटल में ही रुक जाऊं. लेकिन दद्दा के कहने पर मैं उनके साथ चल दिया.

बड़ी-बड़ी बैरिकेडिंग और सुरक्षाकर्मियों की कई टुकड़ियां दूर से ही नज़र आने लगी थी. बैरिकेड के पास पहुंच कर सौरभ बोला, ‘आप लोग यहां लाइन में लग जाइये. मैं आपको पिछले गेट के पास मिलूंगा जहां से आप बाहर आएंगे.’ हम लाइन में खड़े हो गए. यूपी पुलिस, पीएसी, सीआरपीएफ और महिला सुरक्षाकर्मियों की कई टुकडियां यहां मौजूद हैं. इनमें से सीआरपीएफ वालों की तो ड्रेस भी डराने वाली थी. उन सभी ने सर पर काले रंग का कपडा बांधा है जो उनके कन्धों से नीचे तक आ रहा है. इतनी भारी फ़ौज के कारण ऐसा नहीं लगता कि हम किसी मंदिर में दर्शन को जा रहे हों बल्कि ऐसा लगता है जैसे हम पकिस्तान के बॉर्डर की तरफ बढ़ रहे हों.

दोनों ओर बनी दुकानों में जो टीवी लगे हैं उनमें भगवान की नहीं बल्कि लाशों की तस्वीरें हैं, अंतिम संस्कारों के दृश्य हैं, पुलिस द्वारा लाठियां भांजने और गोलियां चलाने के दृश्य हैं

मेरे मन के अंतर्द्वंद लगतार बढ़ रहे थे. क्या ये लोग मेरी भी सुरक्षा के लिए हैं? मन में यह सवाल इसलिए उठा क्योंकि यह सुरक्षा मुख्यतः इसलिए है कि कोई मुस्लिम कट्टरपंथी यहां हमला न कर दे. ऐसे में अगर मेरी पहचान का इन्हें पता चला तो क्या होगा. मुझ पर कई सवाल उठेंगे. कोई मुसलमान राम लला के दर्शन को क्यों आएगा? वह भी ऐसी जगह जहां एक मस्जिद तोड़ी गई थी. कहीं ये लड़का इस इलाके का जायजा लेने तो नहीं आया? इसके पीछे किसी संगठन का हाथ तो नहीं? क्या ये सुरक्षा व्यवस्था देखने आया है? मेरा मन ऐसी कई संभावनाएं टटोलने लगा जो मेरा नाम सुनते ही यहां पैदा हो सकती थी.

स्कैनर पार करते ही आगे दो पुलिसकर्मी बैठे थे जो हर आने वाले की तलाशी ले रहे थे. हम वहां तक पहुंचे तो उनमें से ने एक मेरी तलाशी लेना शुरू किया और दूसरे ने राहुल भाई की. मेरी जेब में होटल के कमरे की चाबी थी. उस पर हाथ पड़ते ही वह पुलिसवाला बोला, ‘क्या है जेब में? निकालो.’ दिसंबर की इस ठंड में भी मुझे घबराहट से पसीना आने लगा. अब इन्होंने मेरा नाम पूछ लिया तो क्या होगा? मैं अपना असली नाम बताऊं या नहीं? अगर बताता हूं तो ये लोग क्या करेंगे? क्या मुझे यहीं रोक लिया जाएगा? गलत नाम बताकर शायद विवाद से बच सकता हूं. लेकिन तब अगर किसी ने पहचान-पत्र मांग लिया और यह सामने आ गया कि मैं एक मुसलमान हूं और पहचान छिपाकर अंदर जा रहा था, तब तो मेरी मंशा पर शक करना लाजिमी ही हो जाएगा. कहीं मैंने बिना सोचे समझे यहां आकर भारी भूल तो नहीं कर दी? कई सारे सवाल एक साथ मन में कौंध गए. राहुल भाई की तलाशी हो चुकी थी और वे आगे बढ़ चुके थे. मेरे हाथों से ठंडा पसीना छूट रहा था. अब तो वापस भी नहीं लौट सकता. वापस गया तो ये लोग पूछेंगे कि दर्शन किये बिना ही मैं वापस क्यों जा रहा हूं. मेरी घबराहट बेहोशी में तब्दील होती इससे पहले ही पुलिस वाले ने चाबी मुझे देते हुए आगे भेज दिया.

बुरा इसलिए महसूस कर रहा था कि मंदिर जैसी पवित्र जगह पर धर्म के नाम पर जोड़ने की नहीं बल्कि तोड़ने की बातें हो रही थीं

तलाशी वाले कमरे से बाहर निकला तो देखा राहुल भाई मेरा इंतज़ार कर रहे थे. मेरे चेहरे की उड़ी हुई रंगत देखकर ही वो समझ गए थे कि मैं डरा हुआ हूं. वो मुझसे कुछ पूछते इससे पहले ही मेरी नज़र आगे खड़े सुरक्षाकर्मियों पर पड़ी जहां तलाशी का दूसरा दौर चल रहा था. यह देखते ही मैंने जेब से चाबी निकाली और राहुल भाई को थमाते हुए कहा, ‘आप रखो यार इसे. इसके चक्कर में उन्होंने मुझे रोक लिया था और मेरी जान सूख गई थी.’ कुल चार बार तलाशी देने के बाद हम लोहे की जालियों से बनी एक संकरी सी गली में पहुंचे. यहां लाइन बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी. अचानक पीछे से एक व्यक्ति ने नारा दिया, ‘जय श्रीराम.’ सात-आठ लोगों ने इस नारे को आगे बढ़ाते हुए हाथ ऊपर उठाते हुए कहा, ‘जय-जय श्रीराम.’ उस व्यक्ति ने दोबारा नारा दिया, ‘जय श्रीराम.’ इस बार वहां मौजूद लगभग सभी लोग एक स्वर में बोल उठे, ‘जय-जय श्रीराम.’ पूरा माहौल राम नाम से गूंज उठा. लेकिन न जाने क्यों इस माहौल में मुझे वैसी भक्ति का एहसास नहीं हुआ जैसा दूसरे हिन्दू मंदिरों में होता है.

देहरादून में पढ़ाई करने और डाक्यूमेंट्री मेकिंग से जुड़ा होने के चलते मैं कई बार हरिद्वार और ऋषिकेश के न जाने कितने ही मंदिरों में गया हूं. वहां जैसी शांति, भक्ति और दिव्यता का एहसास होता है वह यहां नहीं लगा मुझे. हो सकता है कि मैंने अपने पूर्वाग्रहों के चलते ही ऐसा महसूस किया हो. लेकिन अयोध्या में जब भी ‘जय श्रीराम’ का नारा लगता तो लोगों में भक्ति-भाव से ज्यादा जीत का भाव नज़र आता रहा मुझे. मस्जिद पर मंदिर की जीत, मुसलमानों पर हिन्दुओं की जीत. मेरा यह एहसास इसलिए भी मजबूत हुआ क्योंकि यहां ऐसे बहुत ही सीमित लोग थे जो श्रद्धा में डूबकर राम को याद कर रहे थे. ज्यादातर लोग बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने को याद करते नज़र आ रहे थे. आस-पास खड़े लोगों की आपसी चर्चा सिर्फ बाबरी मस्जिद तक ही सीमित थी.

लगभग आधे घंटे लाइन में रहने के बाद वह जगह दिखाई दी जहां ‘राम लला’ की मूर्ति स्थापित है. कपड़े के एक टेंट के नीचे रखी इस मूर्ति को हम ध्यान से देख भी नहीं पाते कि सुरक्षाकर्मी आगे बढ़ने के आदेश दे देते हैं. बाहर निकलते ही एक आदमी हाथ में कुछ डीवीडी लेकर हमारे पास आता है. ‘डीवीडी ले जाइये साहब. इसमें पूरा रिकॉर्ड है. कैसे मस्जिद गिराई गई, कैसे कारसेवकों ने चढ़ाई की. पचास रूपये में दो हैं.’ यह सुनकर कुछ अजीब लगता है. बचपन से सुनता आया था कि ‘बाबरी मस्जिद शहीद की गई थी.’ यहां बार-बार सुनने को मिल रहा था कि कैसे बाबरी ‘गिराई’ गई, ‘ढहाई’ गई. इस्लाम के नज़रिए से देखूं तो यह सुनना गुनाह है. इसके लिए मुझे अस्ताग्फार पढ़ना चाहिए (गुनाहों की माफ़ी मांगना).

राम लला के दर्शन वाले अपने अनुभव को बहुत सीमित करके बताऊं तो यह शायद ऐसा हो जैसे कोई हिंदू हज पर जाने पर अनुभव करे. लेकिन किसी हिंदू के हज पर जाने का तो कोई प्रावधान ही नहीं है

हरिद्वार या अन्य मंदिरों के पास बनी दुकानों पर भव्य और सौम्य भक्ति गीत बज रहे होते हैं. लेकिन अयोध्या में ऐसा नहीं है. यहां बनी दुकानों पर वही डीवीडी चल रही होती है जो कुछ देर पहले वो आदमी हमें बेच रहा था. जिसके कवर पर रामजन्मभूमि के साथ ही लिखा था, ‘एक रक्त रंजित इतिहास.’ दोनों ओर बनी दुकानों में जो टीवी लगे हैं उनमें भगवान की नहीं बल्कि लाशों की तस्वीरें हैं, अंतिम संस्कारों के दृश्य हैं, पुलिस द्वारा लाठियां भांजने और गोलियां चलाने के दृश्य हैं, भीड़ द्वारा पत्थर फेंकने के दृश्य हैं और मस्जिद के गुम्बद पर चढ़कर सरिये मारते लोगों के दृश्य हैं. इन दृश्यों के साथ जो वॉइस ओवर ऊंची आवाज़ में बज रहा है उसके बोल हैं, ‘एक नौजवान ने गुंबद के कमल को तोड़ना शुरू किया था और दूसरे ने वहां केसरिया झंडा फ़हरा दिया.’ तमाम दुकानों में बिक रही इस डीवीडी की पहली ही पंक्ति है, ‘जिस हिन्दू का खून न खौले, खून नहीं वो पानी है. जो राम के काम न आए वो बेकार जवानी है.’ डीवीडी में आगे के बोल हैं, ‘श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए 76 धर्मयुद्ध हो चुके हैं. इनमें लगभग पौने चार लाख हिन्दुओं ने अभी तक अपना बलिदान दिया है. और 77वें धर्मयुद्ध का बिगुल हिन्दुओं ने बजा दिया है.’

तटस्थ होकर कहूं तो यह सब देखने के बाद मुझे बुरा लगा. इसलिए नहीं कि मेरी धार्मिक भावनाएं आहत हुई थीं. मैं लंबे समय से इप्टा जैसी प्रगतिशील संस्था से जुड़ा रहा हूं. पूरी तरह से नास्तिक तो नहीं हुआ हूं लेकिन इतनी समझ आ गई है कि मेरी धार्मिक भावनाएं किसी दूसरे के कुछ भी करने से आहत नहीं होतीं. बुरा इसलिए महसूस कर रहा था कि मंदिर जैसी पवित्र जगह पर धर्म के नाम पर जोड़ने की नहीं बल्कि तोड़ने की बातें हो रही थीं. जिस घटना को देश में आजाद हिन्दुस्तान पर कलंक के रूप में भी देखा जाता है, यहां आज भी उसका किस तरह से जश्न मनाया जा रहा है.

वापस होटल की तरफ लौटते हुए राहुल भाई ने पूछा, ‘जब घर पर बताएगा तो वे ज्यादा हैरान किस बात पर होंगे? तेरे अयोध्या जाने पर या बुलेट से वहां तक जाने पर?’ ‘मां तो बुलेट से जाने पर हैरान होगी और दोबारा कभी इतनी दूर बाइक पर न जाने की सलाह देगी. अब्बा अयोध्या जाने पर हैरान होंगे और कहेंगे कि वहां से मंदिर बनाए जाने की ख़बरें आ रही हैं, वहां माहौल ठीक नहीं है और तू मुंह उठाकर चल दिया. फिर मुझे डांटते हुए कहेंगे कि ये लड़का हमें चैन से नहीं रहने देगा. तुरंत वापस घर आने को कहेंगे.’

ध्रुवीकरण करके हीरो बनना चाहूं तो कह सकता हूं कि देखो मैंने कितनी बहादुरी का काम किया है. और एक अच्छा संदेश देना चाहूं तो कहूंगा कि हिन्दुस्तान के सबसे विवादित मंदिर में भी किसी मुसलमान के आने पर कोई प्रतिबंध नहीं है

‘बिजनौर के लोगों को अपना अनुभव बताएगा तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी?’ राहुल भाई ने आगे पूछा. मैंने कहा, ‘इस बात पर निर्भर करेगा दद्दा कि मैं कैसे बताता हूं. ध्रुवीकरण करके अपने समुदाय में हीरो बनना चाहूं तो इस अंदाज़ में बता सकता हूं कि देखो मैंने कितनी बहादुरी का काम किया है. और एक अच्छा संदेश देना चाहूं तो कह सकता हूं कि हिन्दुस्तान के सबसे विवादित मंदिर में भी किसी मुसलमान के आने पर कोई प्रतिबंध नहीं है. राम कोई भेद-भाव नहीं करते. उनके नाम पर राजनीति करने वाले और उसके जरिये अपनी दुकाने चलाने वाले लोग ये भेद करते हैं.’

रात तक कई लोगों से मिलने के बाद हम लोग अगली सुबह अयोध्या से वापस दिल्ली के लिए निकल पड़े. इस बार हमने एक ही दिन में सात सौ किलोमीटर का यह सफ़र पूरा कर लिया.

मन के जो अंतर्द्वंद अयोध्या में चल रहे थे वे अब शांत होने लगे हैं. यह सफ़र अब हमेशा के लिए यादगार हो गया है. राम लला के दर्शन वाले अपने अनुभव को बहुत सीमित करके बताऊं तो यह शायद ऐसा हो जैसे कोई हिंदू हज पर जाने पर अनुभव करे. लेकिन किसी हिंदू के हज पर जाने का तो कोई प्रावधान ही नहीं है. और यहीं अपना हिन्दुस्तान, अपना संविधान सारे धर्मों को पीछे छोड़ते हुए उनसे आगे निकल जाता है.

धर्म का भेद न अल्लाह करता है न भगवान. न कुरआन सिखाती है न गीता. लेकिन धर्म के ठेकेदार इन पवित्र ग्रंथों की व्याख्या अपने अनुसार करते हुए यह भेद सिखा देते हैं. लेकिन हमारा संविधान किसी ठेकेदार को भी अपनी गलत व्याख्या का यह मौका नहीं देता.