अक्टूबर 2015 में मद्रास उच्च न्यायालय का एक फैसला चर्चित होने के साथ ही काफी विवादित भी हुआ था. यह फैसला देते हुए जस्टिस किरुबकरण ने सुझाव दिया था कि बच्चों का यौन शोषण करने वाले अपराधियों को नपुंसक बना दिया जाना चाहिए. जस्टिस किरुबकरण का यह सुझाव इन दिनों एक बार फिर चर्चाओं में है. 'सुप्रीम कोर्ट वीमेन लॉयर्स एसोसिएशन' (एससीडब्ल्यूएलए) ने एक जनहित याचिका में मांग की है कि जस्टिस किरुबकरण के सुझावों को कानून का रूप देने के लिए सरकार को निर्देशित किया जाए. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए बीते सोमवार सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि केंद्र सरकार बच्चों से बलात्कार करने की सजा बढ़ाए जाने पर विचार करे. एससीडब्ल्यूएलए की अध्यक्ष और इस याचिका की पैरवी कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता महालक्ष्मी पवानी से इस पूरे मामले पर बातचीत:
बलात्कारियों को नपुंसक बनाने की बात कुछ समय पहले जस्टिस किरुबकरण ने भी कही थी. क्या यह याचिका उन्हीं के सुझावों पर आधारित है? 
बीते दिसंबर में दो ऐसी घटनाएं हुई जिन्हें सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए. ये दोनों घटनाएं बहुत छोटी बच्चियों से बलात्कार किये जाने की थीं. इन घटनाओं ने हमें बहुत विचलित किया. इस तरह का घिनौना काम कोई इंसान नहीं बल्कि कोई शैतान ही कर सकता है. इन घटनाओं के बाद हम लोग उन तरीकों पर विचार कर रहे थे जिनसे ऐसे अपराधियों के मन में इतना भय हो कि फिर कोई भी इस तरह का अपराध करने की सोच भी न सके. तभी हमें जस्टिस किरुबकरण के सुझावों की जानकारी मिली. हमें वे सही लगे इसलिए याचिका के माध्यम से हमने उन सुझावों को कानून का रूप देने की मांग की.
2013 में देश भर में बच्चों के यौन शोषण के 58 हजार मामले सामने आए थे. 2014 में यह संख्या बढ़कर 89 हजार हो गई. मौजूदा कानून इस दिशा में सार्थक साबित नहीं हो रहे.
कई लोगों का मानना है कि अपराधों पर रोक लगाने के अन्य तरीके भी हो सकते हैं. इसके लिए एक बर्बर कानून ही क्यों? 
बर्बर अपराधों के लिए बर्बर सजा ही होनी चाहिए तभी अपराधियों के मन में भय पैदा होगा. आज यह भय नहीं है इसलिए इस तरह के अपराध लगातार बढ़ रहे हैं. 2013 में देश भर में बच्चों के यौन शोषण के 58 हजार मामले सामने आए थे. 2014 में यह संख्या बढ़कर 89 हजार हो गई. मौजूदा कानून इस दिशा में सार्थक साबित नहीं हो रहे. ऐसे अपराधियों को नपुंसक बनाए जाने का प्रावधान ही इन अपराधियों में डर पैदा कर सकता है. तब कोई भी व्यक्ति ऐसा अपराध करने से पहले कई बार सोचेगा.
यही तर्क फांसी की सजा के लिए भी दिया जाता है. लेकिन पिछले कुछ समय में हुई फांसियों के बावजूद आतंकी गतिविधियों में कमी नहीं आई है.
वह इसलिए कि न्यायालय की प्रक्रिया बहुत धीमी है. सख्त सजा के साथ ही मामलों का जल्द निबटारा भी बेहद जरूरी है. मामले कई साल तक लंबित रहते हैं इसलिए अपराधियों को समय पर सजा नहीं हो पाती. यही कारण है कि फांसी जैसी सजा भी लोगों में भय पैदा नहीं कर पाती.
महालक्ष्मी पवानी
महालक्ष्मी पवानी
ऐसे में अपराधियों को नपुंसक बनाने का कानून भी कैसे लोगों में भय पैदा करेगा?
हम लोग मांग करेंगे कि बच्चों से जुड़े मामलों को जल्द से जल्द निबटाया जाए. लेकिन पहले सख्त कानून का प्रावधान तो हो. मौजूदा कानून में तो बच्चों को अलग से परिभाषित भी नहीं किया गया है. उन्हें 'किशोर' की परिभाषा में ही शामिल कर लिया जाता है. हमारी याचिका के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से यह भी कहा है कि बच्चों को अलग से परिभाषित किया जाए.
मौजूदा कानून में तो बच्चों को अलग से परिभाषित भी नहीं किया गया है. उन्हें 'किशोर' की परिभाषा में ही शामिल कर लिया जाता है.
कुछ अन्य देशों में भी बलात्कारियों को अतिरिक्त सजा के तौर पर नपुंसक बनाए जाने का प्रावधान मौजूद है. क्या उन देशों में ऐसे अपराध कम हुए हैं? 
बिलकुल. सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि जिन देशों में यह कानून है वहां ऐसे अपराधों की संख्या कम हुई है.
भारत में निर्भया कांड के बाद भी इस तरह की मांग उठी थी. लेकिन तब बलात्कार संबंधी कानूनों पर पुनर्विचार कर रही जस्टिस वर्मा समिति ने इस मांग को ख़ारिज कर दिया था. उनका मानना था कि किसी को नपुंसक बनाया जाना असंवैधानिक भी है और मनावाधिकारों के खिलाफ भी. आपको ऐसा नहीं लगता? 
मुझे समझ नहीं आता कि लोग अपराधियों के मानवाधिकारों के लिए इतना चिंतित क्यों रहते हैं. क्या मानवाधिकार उन बच्चों के नहीं हैं जिनके साथ ये अपराधी इतना घिनौना अपराध करते हैं. भारत सिर्फ मानवाधिकार की अंतरराष्ट्रीय संधियों में ही हस्ताक्षरकर्ता नहीं है बल्कि बच्चों के अधिकारों से जुडी संधियों में भी हस्ताक्षरकर्ता है. इसलिए हर बच्चे के अभिभावक के रूप में उसकी रक्षा करना कानून की प्राथमिकता होनी चाहिए.
बच्चों से बलात्कार करने वालों को सिर्फ अपराधी नहीं बल्कि एक मानसिक रोगी के तौर भी देख जाता है. इसलिए कई लोग मानते हैं कि ऐसे लोगों को सजा की नहीं बल्कि इलाज की जरूरत होती है. क्या आपने याचिका में चिकित्सा विशेषज्ञों की राय भी शामिल की हैं? 
नहीं, हमने उनकी राय शामिल नहीं की है.
सर्वोच्च न्यायालय ने आपकी याचिका पर केंद्र सरकार से कानूनों पर पुनर्विचार करने की बात कही है. लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि बर्बर सजा दिए जाने की आपकी मांग भावनाओं पर आधरित है और कानून भावनाओं के आधार पर नहीं बनते. ऐसे में आपको लगता है कि केंद्र सरकार आपकी मांग के अनुसार कानून बनाने पर विचार करेगी? 
हमें पूरी उम्मीद है कि सरकार कानून बनाएगी. बच्चों के अपराधियों को सख्त सजा देने पर एक बहस तो शुरू हो चुकी है जो कि हमारी पहली जीत है. न्यायालय ने सरकार को कानून बनाने पर विचार करने को भी कहा है. यदि सरकार जस्टिस किरुबकरण के सुझावों के अनुसार अपराधियों को नपुंसक बनाने का प्रावधान बना देती है तो इसके जादुई नतीजे होंगे. कोई अपराधी किसी बच्चे का शोषण करने की सोचेगा भी नहीं.