बताया जाता है कि लोकायुक्त के मामले में अंत में स्वामी प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव का साथ तब छोड़ा जब मायावती ने उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य किया
बहुजन समाज पार्टी में इन दिनों अच्छे दिनों के आने की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है और इसके साथ ही पार्टी में नंबर दो की दौड़ भी तेज दिखने लगी है. पिछली बार जब मायावती सत्ता में थीं तब सतीश मिश्र नंबर दो माने जाते थे. सर्वजन नेता बनाने से लेकर मायावती को अनेक मुकदमों से बचाने तक की कानूनी काबिलियत के चलते वे बसपा सुप्रीमो के सबसे चहेते बन गए थे. लेकिन पिछले कुछ सालों में सतीश मिश्र की पार्टी में भूमिका कमजोर होती चली गई. विधानसभा चुनावों में ‘सबका साथ’ न दिला पाने के बाद लोकसभा चुनाव में हुई पार्टी की दुर्गति के कारण सतीश मिश्र का महत्व घटता गया.
ऐसा ही कुछ नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ भी हुआ, जिन्हें सतीश मिश्र के बाद मायावती का दूसरा प्रमुख दरबारी माना जाता था. लेकिन बसपा के खराब समय में भी मायावती के तीसरे सबसे करीबी नेता के तौर पर जमे रहे स्वामी प्रसाद मौर्य की अहमियत कभी कम नहीं हुई. मगर हाल ही में कुछ बातें ऐसी हुई हैं कि वे पार्टी में अपने दोनों प्रतिद्वंद्वियों के कमजोर होने के बाद भी ऊपर चढ़ने की हालत में नहीं लग रहे हैं. एक ऐसे समय में जब बसपा फिर से सिर उठाती दिखाई दे रही है उनकी राह में कांटे बिछते दिखने लगे हैं.
अब भी विधानसभा में जब वे बोलते हैं तो कहा जाता है कि माइक की जरूरत नहीं रहती. पिछड़ों का नेता होने के साथ-साथ वे बसपा के अनुकूल इसलिए भी हैं कि अपनी महत्वाकांक्षाओं का दमन करना जानते हैं
मायावती के तीनों सूबेदारों में स्वामी प्रसाद मौर्य ही अकेले ऐसे नेता हैं जिन्हें जमीनी आधार वाला माना जा सकता है. सतीश मिश्र खास नेता तो बन गए लेकिन जननेता कभी नहीं बन पाए. अच्छे वकील के साथ साथ ब्राह्मण होना उनकी सबसे बड़ी खासियत रही. ऐसा ही कुछ हाल नसीमुद्दीन सिद्दीकी का भी है. वे मायावती के प्रति निष्ठावान होने के अलावा बसपा का मुस्लिम चेहरा होने की खा रहे हैं, ऐसा कहा जाता है.
लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य छात्र जीवन से ही दमदार नेता रहे हैं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दिनों से उन्हें जोशीला नेता माना जाता रहा है. अब भी विधानसभा में जब वे बोलते हैं तो कहा जाता है कि माइक की जरूरत नहीं रहती. पिछड़ों का नेता होने के साथ-साथ वे बसपा के अनुकूल इसलिए भी हैं कि अपनी महत्वाकांक्षाओं का दमन करना जानते हैं. वे मायावती के प्रति बहुत लंबे समय से असंदिग्ध रूप से वफादार बने हुए हैं और इसलिए चार बार विधायक और मंत्री तथा तीन बार नेता विपक्ष भी रहे हैं. इन वजहों से माना जाने लगा था कि 2017 के चुनावी माहौल में वे ही मायावती के सबसे खास सिपहसालार होंगे.
परन्तु खुद उन्हीं की कुछ हरकतों ने बहनजी के सामने उनकी स्थिति को डांवाडोल कर दिया है. इनमें से एक मामला लगभग सवा वर्ष पूर्व के उनके एक भाषण का है, जिसमें उन्होंने कहा था कि शादियों में गौरी-गणेश विवाह नहीं करना चाहिए. यह मनुवादी व्यवस्था में दलितों और पिछड़ों को गुमराह कर उनको गुलाम बनाने की साजिश है. उन्होंने इसके साथ ही कुछ देवी-देवताओं पर भी अभद्र टिप्पणी की थीं. स्वामी प्रसाद मौर्य के इस बयान पर उस समय कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी. भाजपा ने इसे सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाला बयान कहकर उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी और अनेक संगठनों ने भी इसके खिलाफ प्रदर्शन आदि किए थे.
मायावती की नाराजगी के बाद ही लोकायुक्त चयन के मामले में स्वामी प्रसाद मौर्य को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर अपनी भूमिका भी स्पष्ट करनी पड़ी
बढ़ते विरोध को देख कर मायावती ने इस बयान को मौर्य का निजी बयान कह कर मामला शांत करने की कोशिश की और कहा कि उनकी ‘पार्टी बाबा भीमराव अंबेडकर द्वारा निर्मित भारतीय संविधान के धर्म निरपेक्षता के मूल सिद्धान्त के आधार पर और उसकी सही मंशा के अनुसार सभी धर्मों का सम्मान करती है. वह अपने देश में अलग-अलग धर्मों के मानने वाले सर्वसमाज के लोगों के रहन-सहन, शादी विवाह, पूजा-पाठ व उनकी संस्कृति आदि के तौर-तरीकों का भी आदर सम्मान करते हुए उनमें दखल देने के खिलाफ है.’
बयान पर बढ़ते विरोध को देखते हुए मायावती ने मौर्य का लिखित में जवाब भी तलब किया था. इस मामले में सुलतानपुर में उनके खिलाफ एक मुकदमा भी दर्ज कराया गया था और अदालत ने स्वामी प्रसाद मौर्य के खिलाफ गैर जमानती वारंट भी जारी किया था. यह मुकदमा अब भी चल रहा है.
अब मायावती एक बार फिर से ‘सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर वापस आना चाह रही हैं. मगर मौर्य के इस तरह के बयान उनके इरादों पर पानी फेर सकते हैं. यही वजह है कि मौर्य भी अब उस मुकदमे को खत्म करने की जल्दी में हैं. उन्होंने इस मामले में ग्यारह जनवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से एक स्थगन आदेश भी प्राप्त किया है.
मायावती एक बार फिर से ‘सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर वापस आना चाह रही हैं मगर मौर्य के इस तरह के बयान उनके इरादों पर पानी फेर सकते हैं
मायावती की नाराजगी के बाद ही लोकायुक्त चयन के मामले में स्वामी प्रसाद मौर्य को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर अपनी भूमिका भी स्पष्ट करनी पड़ी. शुरूआती दौर में इस मामले में गोल-मोल बात कहने के बाद अब उन्होंने राज्यपाल तथा सर्वोच्च न्यायालय को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि 16 दिसंबर को लोकायुक्त चयन के लिए हुई उनकी, अखिलेश यादव और इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की बैठक में उन्होंने जस्टिस वीरेंद्र सिंह के नाम पर कतई सहमति नहीं दी थी. मौर्य ने कहा कि ‘मैने कभी भी न सीएम के सुझाए नाम पर सहमति व्यक्त की थी और न ही जस्टिस वीरेंद्र सिंह के नाम पर 16 दिसम्बर की मीटिंग में सहमति दी थी. मैने दोनों ही दिन मीटिंग में यही कहा था कि चीफ जस्टिस और सीएम किसी एक नाम पर सहमति कर लें, उस पर मैं अपनी सहमति दे दूंगा.’
जबकि सच्चाई यह है कि लोकायुक्त की नियुक्ति के मामले में वे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ और इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ सिंह के खिलाफ खड़े दिखाई देते रहे. माना जा रहा है कि मौर्य का हालिया पत्र तब आया जब बसपा सुप्रीमो ने उन्हें फटकार लगाई क्योंकि लोकायुक्त की नियुक्ति का मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर इतना संवेदनशील हो चुका है कि मायावती इसपर कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहती थीं. इसलिए मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान स्वामी प्रसाद मौर्य को सार्वजनिक तौर पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी.
इसी का नतीजा यह है कि मायावती के जन्मदिन के लिए जो पोस्टर शहर में लगे हैं उनमें इस बार भी मायावती के साथ मौर्य का चित्र तो है लेकिन फिर से वे सतीश मिश्र और नसीमुद्दीन के बाद तीसरे नंबर पर ही नजर आ रहे हैं.