जीतनराम मांझी और नीतीश कुमार
जीतनराम मांझी और नीतीश कुमार
बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने कैबिनेट में नीतीश कुमार समर्थक सदस्यों की गैरमौजूदगी में बिहार विधानसभा को भंग करने का प्रस्ताव पास कर दिया है. कुछ ही देर पहले हुई बिहार कैबिनेट की बैठक में मांझी के करीबी कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह ने विधानसभा भंग करने का प्रस्ताव रखा जिसे कैबिनेट के 21 मंत्रियों ने खारिज कर दिया. वे बैठक छोड़कर बाहर आ गए. इन मंत्रियों के मुताबिक सिर्फ सात मंत्री ही इस प्रस्ताव के समर्थन में थे. इसके बाद आ रही खबरों के अनुसार इस प्रस्ताव को कैबिनेट के इन बचे हुए सदस्यों के साथ ही जीतनराम मांझी ने पारित कर दिया है और इसे राजभवन में भेजने की तैयारी हो रही है. उधर नीतीश खेमा कुछ देर में होने वाली विधायक दल की बैठक के लिए तैयार हो रहा है जिसमें इसके नये नेता का चुनाव किया जाएगा. ऐसी हालत में सभी की निगाहें राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी की ओर लगी हुई हैं. उन्होंने नीतीश कुमार के करीबी दो मंत्रियों को बर्खास्त करने की मांझी की कल की गई अनुशंसा को कुछ समय पहले ही अपनी मंजूरी दे दी है.
इस बैठक में भी बात बनी नहीं. जीतनराम मांझी मुख्यमंत्री पद न छोड़ने की अपनी जिद पर अड़े रहे और नीतीश अब एक बार में ही जीतनराम मांझी और इस मसले से निपटने की अपनी जिद पर.
कल पूरे दिन और रात बिहार में सुलह-समझौते की कोशिशें चलती रहीं. इसके बाद आज सुबह जीतनराम मांझी की नीतीश कुमार से फोन पर बात हुई. निश्चित हुआ कि दोनों नेताओं को मुलाकात कर इस मामले से निपटने की कोशिश करनी चाहिए. यह मीटिंग हुई तो इसके पीछे तमाम कारण रहे. नीतीश कुमार को लगा कि अब उन्हें कुछ करते दिखना चाहिए और मांझी की बगाबत के बावजूद अगर वे मुख्यमंत्री बनते हैं तो इससे न केवत उनके महादलित वोटबैंक के छिटक जाने का खतरा है बल्कि उनकी छवि को और भी बट्टा लग सकता है. उधर मांझी को भी इस बात की गारंटी नहीं मिल पा रही थी कि वे नीतीश कुमार से बगावत करने के बाद भी मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं. भाजपा का उन्हें समर्थन देने के पीछे अपना मकसद था और इस बात की भी कोई गारंटी नहीं थी कि अपेक्षित संख्या में विधायकों का उन्हें समर्थन भी मिल सकेगा या नहीं. लेकिन दो घंटे तक चली इस बैठक में भी बात नहीं बनी. जीतनराम मांझी मुख्यमंत्री पद न छोड़ने की अपनी जिद पर अड़े रहे और नीतीश एक बार में ही जीतनराम मांझी और इस मसले से निपटने की अपनी जिद पर.
अगर कल की बात करें तो जीतनराम मांझी ने परसों जो कहा जो कहा था वही किया. सहरसा की रैली में वे बोले - नीतीश भीष्म पितामह की तरह चुप हैं और केसी त्यागी यमदूत बन गए हैं. मैं महाभारत का धर्मयुद्ध लड़ रहा हूं. अब पीछे नहीं हटूंगा. और वे पीछे हटे भी नहीं. उन्होंने नीतीश के सबसे करीबी दो मंत्रियों - राजीव रंजन सिंह लल्लन और पीके शाही - को बर्खास्त करने की सिफारिश राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी से कर दी. बड़े पैमाने पर अफसरों के भी तबादले शुरू हो गए. पहली खेप में ही दो आईएएस और 44 एसडीओ के ट्रांसफर कर दिए गये. पांच उपसचिव स्तर के अफसरों के भी तबादले का आदेश दे दिया गया.
इस दौरान शरद यादव ने बार-बार राज्यपाल से मिन्नतें की कि यदि मांझी विधानसभा भंग करने की सिफारिश करते हैं तो वे उसे नहीं मानें. उन्हें डर था, अभी भी है कि पूर्व भाजपाई राज्यपाल इस मामले में सक्रिय और बड़ी भूमिका निभाकर जेडीयू के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. इसके साथ ही आरजेडी के साथ भी नीतीश कुमार खेमे की बातचीत हुई. तय हुआ कि चाहे जो भी हो अब जीतनराम को मुख्यमंत्री नहीं बने रहने देना है. इसके बाद जनता दल यूनाइटेड, टूटने की कगार पर पहुंच गया. पहली बार ऐसा हुआ जब नीतीश की पार्टी के नेता खुलकर नीतीश के खिलाफ बोल रहे थे. जो नीतीश से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे वे उन्हें ललकार रहे थे.
कल ही शरद यादव ने आज की विधायक दल की बैठक बुलाने की घोषणा भी की थी. लेकिन मांझी ने वहां नीति आयोग की बैठक में दिल्ली जाने का ऐलान कर दिया. यहां मांझी की नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात होनी थी. जेडीयू इस मुलाकात को लेकर खासी सशंकित थी. इसलिए उसके नेता बार-बार कह भी रहे थे कि आखिर मांझी किस हैसियत से दिल्ली जा रहे हैं.