देहरादून के नारी निकेतन से महिलाओं के बेचे जाने और उनके साथ बलात्कार होने जैसे गंभीर आरोप पहले भी सरकार के संज्ञान में थे लेकिन, इन पर गंभीर कार्रवाई तब जाकर हुई जब इस मसले पर उसकी फजीहत होने लगी.

बीते नवंबर की बात है. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कार्यालय में एक गुमनाम पत्र पहुंचा. इस पत्र में देहरादून स्थित नारी निकेतन से संबंधित कई सनसनीखेज बातें लिखी गई थी. यह नारी निकेतन प्रदेश के समाज कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आता है. इसमें 100 से ज्यादा ऐसी महिलाएं (जिन्हें संवासिनी कहा जाता है) रह रही हैं जो या तो निराश्रित हैं या अदालत के आदेश से यहां भेजी गई हैं. इनमें कई मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाएं भी शामिल हैं.

पत्र में लिखा था कि यहां रहने वाली संवासिनियों का यौन शोषण किया जा रहा है और इसमें नारी निकेतन प्रशासन भी शामिल है. एक मूक-बधिर संवासिनी के बलात्कार और उसके गर्भवती होने पर गर्भपात किये जाने की बात भी इसमें लिखी गई थी. यह पत्र मिलने के बाद उतराखंड सरकार ने जांच के आदेश तो दिए लेकिन, जांचकर्ताओं ने प्राथमिक जांच के बाद ही इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया.


नवंबर में भेजे गए इस पत्र में एक मूक-बधिर संवासिनी के बलात्कार और उसके गर्भवती होने पर गर्भपात किये जाने की बात भी लिखी गई थी.

मुख्यमंत्री कार्यालय के साथ ही यह पत्र स्थानीय अखबारों को भी भेजा गया था. अधिकारियों ने तो इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया था लेकिन एक दैनिक अखबार ने इस पत्र में लगाए गए आरोपों को कई दिनों तक प्रमुखता से छापा और अपने स्तर से इस मामले की छानबीन के बाद इनके सही होने का भी दावा किया. इसी बीच नारी निकेतन में रहने वाली दो संवासिनियों की मौत हो गई जिसके चलते यह मामला लगातार तूल पकड़ता गया. इससे दबाव में आई उत्तराखंड सरकार को एक विशेष जांच दल का गठन करना पड़ा. इस जांच दल ने जब इन आरोपों की पड़ताल शुरू की तो सामने आया कि गुमनाम पत्र में लगाए गए सारे आरोप सही थे. मूक-बधिर संवासिनी से बलात्कार की बात की पुष्टि होने के साथ ही वह भ्रूण भी बरामद कर लिया गया जिसका जिक्र इस पत्र में किया गया था. यह भ्रूण नारी निकेतन से कुछ दूरी पर एक जंगल में दफनाया गया था.

इस घटना के बाद से इस मामले में कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं. जंगल से बरामद हुए भ्रूण का डीएनए नारी निकेतन में सफाई का काम करने वाले गुरदास नाम के एक व्यक्ति से मिल चुका है. नारी निकेतन की अव्यवस्थाओं को अब प्रदेश सरकार भी गंभीरता से लेने लगी है. यहां रहने वाली संवासिनियों की चिकित्सकीय जांच करवाई जा रही है, दर्जनों संवासिनियों को अस्पताल में दाखिल करवाकर उनका इलाज करवाया जा रहा है. निकेतन में वे सुविधाएं दी जा रही हैं जिनका कई साल से वहां अभाव था. निकेतन परिसर की सुरक्षा बढ़ाई जा रही है और सरकार सभी दोषियों को सजा देने की बात भी कह रही है.


इस घटना के बाद से इस मामले में कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं. जंगल से बरामद हुए भ्रूण का डीएनए नारी निकेतन में सफाई का काम करने वाले गुरदास नाम के एक व्यक्ति से मिल चुका है.

लेकिन जो कदम उत्तराखंड सरकार इस हालिया विवाद के गरमाने के बाद उठा रही है, वे काफी पहले भी उठाए जा सकते थे. इसलिए कि यह पहला मौका नहीं है जब नारी निकेतन में गड़बड़ियों की बात सामने आई हो. ऐसे कई तथ्य हैं जो बताते हैं कि नारी निकेतन में मौजूद अव्यवस्थाओं के साथ ही यहां से महिलाओं के बेचे जाने और मानसिक रूप से विक्षिप्त संवासिनियों के साथ बलात्कार होने जैसी गंभीर बातें पहले भी सरकार के संज्ञान में थी.

उत्तराखंड महिला आयोग की उपाध्यक्ष प्रभावती गौड़ बताती हैं, 'मैंने मार्च 2015 में नारी निकेतन का दौरा किया था. मैंने देखा कि वहां रहने वाली संवासिनियां जानवरों से भी बदतर हालात में थीं. मूलभूत सुविधाएं भी तक नहीं थीं वहां. गंदगी इतनी थी कि मैं मुंह पर कपड़ा लगाकर अंदर गई थी.' वे आगे बताती हैं, 'इस दौरे के बाद हमने सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें नारी निकेतन की कमियों को साफ़ तौर से बताया गया था. लेकिन इसके बाद भी सरकार ने उचित कदम नहीं उठाए.' जिन मूलभूत कमियों का जिक्र प्रभावती गौड़ कर रही हैं उनके चलते हर साल नारी निकेतन में कई संवासिनियों की मौत होती है. स्थानीय अखबारों के अनुसार पिछले दो साल में यहां रहने वाली 12 से ज्यादा संवासिनियों की मौत हो चुकी है.

23 अगस्त 2014 को जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा गठित एक टीम ने भी नारी निकेतन का दौरा किया था. इस टीम में शामिल रही एक सदस्य बताती हैं, 'नारी निकेतन में सिर्फ व्यवस्थागत गड़बड़ियां ही नहीं थीं, बल्कि वहां महिलाओं का यौन शोषण भी किया जा रहा था. हमने यह जानकारी संबंधित अधिकारियों तक तब भी पहुंचाई थी. लेकिन नतीजा यह हुआ कि जिस न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता में हम निरीक्षण के लिए गए थे, उसका ही तबादला कर दिया गया.' वे आगे कहती हैं कि नारी निकेतन में चल रही गड़बड़ियों में कई बड़े अधिकारी शामिल रहे हैं.


'हमने यह जानकारी संबंधित अधिकारियों तक तब भी पहुंचाई थी. लेकिन नतीजा यह हुआ कि जिस न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता में हम निरीक्षण के लिए गए थे, उसका ही तबादला कर दिया गया.'

इस निरीक्षण के बाद एक रिपोर्ट भी सरकार को सौंपी गई थी. इस रिपोर्ट की प्रति सत्याग्रह के पास मौजूद है जिसमें कई चौंकाने वाली जानकारियां शामिल हैं. उदाहरण के लिए इस रिपोर्ट में नारी निकेतन की एक अधिकारी ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि 'कई संवासिनियां यहां आने के बाद मानसिक तौर से विक्षिप्त हो जाती हैं.' इसका कारण बताते हुए निरीक्षण टीम की एक सदस्य बताती हैं, 'यहां रहने वाली महिलाओं को बहुत अधिक मात्रा में नींद की गोलियां दी जाती रही हैं. नशे की हालत में उनका यौन शोषण किया जाता है और उनके साथ मारपीट भी की जाती है. लंबे समय तक ऐसी परिस्थिति में रहने के चलते ही कई संवासिनियां मानसिक तौर से असामान्य हुई हैं.'

इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस नारी निकेतन में आने के बाद संवासिनियों का बाहरी दुनिया से संपर्क पूरी तरह से कट जाता है. न तो किसी को इनसे मिलने की अनुमति होती है न ही इन संवासिनियों को कहीं बाहर जाने दिया जाता है. नारी निकेतन में एक फोन जरूर है लेकिन निरीक्षण के दौरान पता चला कि वह भी बहुत लंबे समय से खराब है. यहां कोई शिकायत पेटी भी नहीं है जिसके जरिये ये संवासिनियां अपनी आपबीती अधिकारियों तक पहुंचा पाएं. खाने-पीने और स्वास्थ्य सुविधाओं का आलम यह है कि अधिकतर संवासिनियां बीमार और कुपोषण की शिकार हैं.


'नारी निकेतन में हो रहे यौन शोषण और महिला तस्करी जैसे अपराधों में वहां के अधिकारियों की भी मिलीभगत है. प्रदेश प्रशासन के भी कई बड़े अधिकारी इसमें शामिल हैं इसलिए कभी भी इन आरोपों पर ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती.'

2014 में जब यह निरीक्षण किया गया था तब यहां कुल 108 संवासिनियां रह रही थी. इनमें से 79 मानसिक रूप से असामान्य थीं. कई ऐसी थीं जो यहां आने के बाद ही मानसिक रूप से असामान्य हुई थीं. लेकिन यह जानकारियां सरकार तक पहुंचने के बाद भी नारी निकेतन में कोई सुधार नहीं हुआ. अगस्त 2015 में तो सरकार के संज्ञान में यह बात भी आई थी कि नारी निकेतन से महिलाओं की तस्करी की जा रही है. तब भी एक गुमनाम पत्र मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचा था जिसमें बताया गया था कि नारी निकेतन के अधिकारियों ने दो महिलाओं को बेच दिया है. इन महिलाओं के फोन नंबर भी इस पत्र में लिखे गए थे.

यह पत्र मिलने के बाद महिला आयोग की उपाध्यक्ष प्रभावती गौड़ ने इन आरोपों की जांच की थी. वे बताती हैं, 'अगस्त में हमने जांच के बाद सरकार को यह लिखा था कि नारी निकेतन में  महिला तस्करी जैसे गंभीर अपराध हो रहे हैं. मैं उस लड़की से मिली भी थी जिसे बेचे जाने की बात कही जा रही थी. वह बहुत डरी हुई थी और सामने नहीं आना चाहती थी. उसने मुझे बताया था कि नारी निकेतन से लगातार उसे जान से मारने की धमकियां दी जाती हैं.' प्रभावती गौड़ आगे बताती हैं, 'यह सारी बातें मैंने संबंधित अधिकारियों के संज्ञान में डाली थी. अगस्त की रिपोर्ट में संवासिनियों के यौन शोषण की बातें भी हमने स्पष्ट तौर से लिखी थीं.'


'कभी मंत्रियों की गाड़ियां रात के अंधेरे में यहां पहुंचती हैं तो कभी लाचार महिलाओं को यहां से मंत्रियों तक पहुंचाया जाता है. ऐसे में कौन कार्रवाई करेगा?'

लेकिन इतना सब होने के बाद भी सरकार ने इस मामले में कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए? इस सवाल के जवाब में प्रभावती गौड़ कहती हैं, 'नारी निकेतन में हो रहे यौन शोषण और महिला तस्करी जैसे अपराधों में वहां के अधिकारियों की भी मिलीभगत है. प्रदेश प्रशासन के भी कई बड़े अधिकारी इसमें शामिल हैं इसलिए कभी भी इन आरोपों पर ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती.' पिछले कई साल से महिला अधिकारों के लिए कार्य कर रही 'समाधान' नामक संस्था की अध्यक्ष रेनू डी सिंह कहती हैं, 'यह संस्था महिलाओं के कल्याण के लिए नहीं है बल्कि उनके लिए एक डंपिंग प्लाट का काम करती है. हर जगह से महिलाओं को लाकर यहां बंद कर दिया जाता है.'

वे आगे बताती हैं, 'यह पहला मौका नहीं है जब नारी निकेतन से यौन शोषण या महिला तस्करी की बात सामने आई हो. पहले भी कई बार ऐसी बातें उठ चुकी हैं कि कभी मंत्रियों की गाड़ियां रात के अंधेरे में यहां पहुंचती हैं तो कभी लाचार महिलाओं को यहां से मंत्रियों तक पहुंचाया जाता है. ऐसे में कौन कार्रवाई करेगा? जिन्हें कार्रवाई करनी है वे तो पूरी कोशिश करते हैं कि इस मामले को किसी भी तरह दबाया जाए.'