बीते हफ्ते प्रियंका गांधी का जन्मदिन था जो देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार की बेटी हैं. लेकिन इस परिवार की विरासत उन्हें मिलेगी या नहीं, यह उनसे ज्यादा उनके भाई और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की योग्यता पर निर्भर करता है.
खेल के मैदान की भांति राजनीति के मैदान में भी (एक आभासी ही सही) रिजर्व बेंच जरूर होती है. और इस बेंच पर बैठे हुए शख्स की स्थिति भी लगभग उस खिलाड़ी की ही तरह होती है, जिसे तब तक अपना कौशल दिखाने का मौका नहीं मिलता जब तक मैदान में मौजूद खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर रहा हो. उसके चोटिल होने, थक जाने या फिर किसी दूसरी वजह के चलते अपेक्षानुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाने के बाद ही रिजर्व बैंच पर बैठा खिलाड़ी मैदान में उतर पाता है. कई बार तो यह इंतजार इतना लंबा हो जाता है कि हुनरमंद खिलाड़ी रिजर्व बैंच पर बैठे-बैठे ही खर्च हो जाता है.
इसी तर्ज पर यदि राजनीति के मैदान की बात करें तो अपार संभावनाओं से लबरेज और अपनी दादी इंदिरा गांधी की याद दिलाने वाली प्रियंका गांधी को लेकर भी कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है. बेजोड़ आत्मविश्वास, अच्छी राजनीतिक समझ और आसानी के साथ जनता को खुद से जोड़ लेने की क्षमता जैसे कई सारे दुर्लभ गुणों के बावजूद वे अभी भी सक्रिय राजनीति से दूर ही हैं. वह भी तब जब कांग्रेस पार्टी के अंदर से ही नहीं बल्कि बाहर के भी कई सारे लोग उन्हें मंझधार में डोल रही पार्टी को पार लगाने में सक्षम बता रहे हैं.
कांग्रेस पार्टी के अंदर से ही नहीं बल्कि बाहर के भी कई सारे लोग उन्हें मंझधार में डोल रही पार्टी को पार लगाने में सक्षम बता रहे हैं. तब भी प्रियंका सक्रिय राजनीति से दूर बनी हुई हैं.
सामान्य समझ वाले आम लोगों से लेकर राजनीतिक पंड़ितों तक जिससे भी इसकी वजह पूछी जाती है, सबका जवाब एक ही होता है- ‘राहुल गांधी.’ इन सभी का मानना है कि जब तक राहुल गांधी पूरी तरह असफल साबित नहीं हो जाते, तब तक प्रियंका का राजनीतिक अवतरण मुमकिन नहीं है, और वे अधिकतम ‘राहुल के सहयोगी की उस भूमिका में ही बनी रहेंगी जिसका निर्वहन वे पिछले एक दशक से करती आ रही हैं.’
बेशक इसे अंतिम सत्य जैसा दावा नहीं माना जा सकता. लेकिन कांग्रेस के गठन से लेकर अब तक के तमाम घटनाक्रमों, गांधी परिवार के प्रति पार्टी की हद से ज्यादा निर्भरता, और खास तौर पर सोनिया गांधी की राहुल को आगे करने की चाह को देखते हुए इस दावे पर काफी हद तक यकीन तो किया ही जा सकता है. इसके अलावा एक सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं से लेकर बड़े कांग्रेसियों द्वारा प्रियंका को आगे लाने की मांग अब तक जितनी भी बार की गई, हर बार उसे नजरअंदाज ही किया गया है. बीते महीने की 19 तारीख को नेशनल हेराल्ड प्रकरण को लेकर हुई सोनिया गांधी और राहुल गांधी की पेशी और जमानत की घटना ने भी एक बार फिर से इस दावे का वजन बढा दिया है.
भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा दायर किए गए मुकदमे के तहत अदालत ने सोनिया और राहुल समेत सात कांग्रेसियों को 19 दिसंबर को पेश होने का फरमान सुनाया था. जैसे-जैसे यह तारीख पास आ रही थी, वैसे-वैसे कांग्रेस के भविष्य को लेकर भी तरह-तरह की बातें कही-सुनी जा रही थी. राजनीति में रुचि रखने वाले कई सारे लोग और मीडिया का एक बड़ा वर्ग अंदाजा लगा रहा था कि इंदिरा गांधी की तर्ज पर जेल का रास्ता चुन कर राहुल गांधी ‘मास्टर स्ट्रोक’ खेल सकते हैं. जबकि एक वर्ग ऐसे लोगों का था जो इस बात पर एकमत थे कि राहुल और सोनिया दोनों ही जमानत ले लेंगे.
जिस वक्त राहुल गांधी और सोनिया गांधी अदालत जाने की तैयारी कर रहे थे, ठीक उसी वक्त प्रियंका गांधी कांग्रेस संगठन के सबसे बड़े दिग्गजों के साथ बैठक कर रही थीं.
19 तारीख को अदालत ने दोनों को जमानत दे दी जिसके बाद साफ हो गया कि दूसरे धड़े का आकलन ही सही था. लेकिन इस सबके बीच एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात थी, जिस पर न तो मीडिया और न ही अन्य लोगों ने उतना गौर किया, जितना कि किया जाना चाहिए था. वह बात थी इस पूरे प्रकरण में प्रियंका गांधी की सक्रियता और फिर अचानक से उनका गायब हो जाना.
19 तारीख की सुबह जिस वक्त राहुल गांधी और सोनिया गांधी अदालत जाने की तैयारी कर रहे थे, ठीक उसी वक्त प्रियंका गांधी कांग्रेस संगठन के सबसे बड़े दिग्गजों के साथ बैठक कर रही थीं. इन दिग्गजों में मोती लाल बोरा, अहमद पटेल, एके एंटनी और गुलाम नबी आजाद जैसे नाम शामिल थे. सूत्रों की मानें तो प्रियंका ने इन सभी के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की कि यदि अदालत उनकी मां और भाई को जमानत देने से इंकार कर देती है तो फिर आगे का एजेंडा क्या होगा. हालांकि तब तक यह बात साफ हो चुकी थी कि सोनिया और राहुल जमानत लेंगे, फिर भी एहतियात के तौर पर यह बैठक बुलाई गई थी.
बैठक खत्म होने के बाद प्रियंका गांधी उस जुलूस में भी पूरी शिद्दत के साथ चलती हुई दिखाई दीं, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर कांग्रेस पार्टी के कई सारे नेता और कार्यकर्ता शामिल थे. सोनिया और राहुल के समर्थन में अदालत परिसर तक निकला और फिर वापस दस जनपथ तक पहुंचने वाला वह जुलूस लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस का सबसे बड़ा शक्ति प्रदर्शन कहा जा सकता है. इस लिहाज से भी प्रियंका गांधी का इसमें बढ-चढ कर शामिल होना स्वाभाविक रूप से इस अलकलबाजी को बल देने वाला लग रहा था कि अब उनका सक्रिय रूप से राजनीति में उतरना तय है.
पिछले साल लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पटखनी खाने के बाद से लेकर अब तक की ही बात करें तो, इक्का दुक्का अवसरों को छोड़ कर राहुल गांधी शायद ही कांग्रेस में जोश भर पाए हैं.
लेकिन इसके बाद जैसे ही सोनिया और राहुल गांधी ने दस जनपथ पहुंच कर प्रेस के सामने अपनी बात रखी, वैसे ही ये अटकलबाजी भी खत्म हो गई. राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर झूठ बोलने और बदले की भावना से काम करने का आरोप लगाते हुए ऐलानिया अंदाज में कहा कि, वे सरकार से डरने वाले नहीं हैं, और न तो वे और न ही उनकी पार्टी अपने कदम पीछे खींचेगी. जिस वक्त राहुल ने यह कहा, उनके बगल में खड़ी सोनिया गांधी के चेहरे पर तब जिस तरह के भाव नजर आ रहे थे, उसे देख कर साफ हो गया था, कि प्रियंका गांधी को अभी रिजर्व बेंच पर ही बैठे रहना होगा.
जानकारों का मत है कि जमानत मिलने के बाद राहुल गांधी ने जिस तरह के तेवर दिखाए, और केंद्र सरकार पर जुबानी हमले किए उन्हें देखते हुए कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का जोश में आना लाजमी था. ऐसे में अब यदि वे मरणासन्न अवस्था में पहुंच चुकी अपनी पार्टी में जान फूंक कर उसे फिर से खड़ा कर पाने में सफल रहते हैं तो फिर कहा जा सकता है कि प्रियंका गांधी का सक्रिय राजनीति में उतरना दूर-दूर तक संभव नहीं होगा. लेकिन यदि राहुल ऐसा कर पाने में नाकाम रहते हैं तो फिर इस बात पर भी किसी को शायद ही संदेह होगा, कि उसके बाद प्रियंका ही पार्टी की ‘आखिरी तारणहार’ होंगी.
पिछले साल लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पटखनी खाने के बाद से लेकर अब तक की ही बात करें तो, इक्का दुक्का अवसरों को छोड़ कर राहुल गांधी शायद ही कांग्रेस में जोश भर पाए हैं. इस दौरान उन्हें न तो पार्टी संगठन में नई ऊर्जा भरते हुए देखा गया और न ही संसद में कुछ ठोस करते हुए. पिछले साल बजट सत्र से ऐन पहले वे ऐसे वक्त में विदेश चले गए थे जब उनसे उम्मीद की जा रही थी कि वे संसद में सरकार पर निशाने साधेंगे. उस वक्त राहुल गांधी पूरे दो महीने तक राजनीतिक फलक से गायब रहे. तब कांग्रेस की हालत यह हो गई थी कि सरकार को घेरने के बजाय उसे राहुल गांधी के अज्ञातवास को लेकर सफाई देनी पड़ रही थी.
प्रियंका गांधी ने पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उनके और सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्रों अमेठी और रायबरेली में खूब काम किया है.’
उससे पहले की भी यदि बात करें तो राहुल गांधी के एक दशक से भी ज्यादा के राजनीतिक कैरियर को जानकार औसत से भी नीचे दर्जे का मानते हैं. जबकि दूसरी तरफ इतने से भी कम अवधि में प्रियंका गांधी ने अपनी बेहद सीमित भूमिका के बावजूद कई ऐसे प्रमाण प्रस्तुत किए हैं, जिनके दम पर लोग उन्हें संभावनाओं से लबरेज शख्सियत मानाने हैं. वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘दस साल से ज्यादा समय तक राजनीति में सक्रिय रहने के बावजूद राहुल गांधी न तो पार्टी संगठन में कोई सुधार ला सके हैं और ना ही बतौर सांसद संसद में अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे हैं. जबकि प्रियंका गांधी ने पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उनके और सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्रों अमेठी और रायबरेली में खूब काम किया है.’
राजनीतिक समझ के मामले में भी नीरजा चौधरी प्रियंका को ही राहुल से ज्यादा परिपक्व बताती हैं. वे कहती हैं, ‘राहुल गांधी की भाव-भंगिमाएं उन्हें एक उदासीन और राजनीति के लिए अनिच्छुक व्यक्ति की तरह पेश करती हैं, जबकि प्रियंका की बाडी लैंग्वेज और गजब का आत्म विश्वास उनके अंदर की असीम संभावनाओं को खुद ही आपके सामने रख देता है.’
‘राहुल गांधी की भाव-भंगिमाएं उन्हें एक उदासीन और राजनीति के लिए अनिच्छुक व्यक्ति की तरह पेश करती हैं, जबकि प्रियंका का मामला उलट है.'
लेकिन इस सबके बावजूद अभी तक का सच यही है कि सोनिया गांधी उनको नहीं बल्कि राहुल गांधी को कांग्रेस का कल बनाना चाहती हैं. कांग्रेस और खास तौर पर दस जनपथ की गहरी समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई की मानें तो सोनिया गांधी शुरुआत से ही राहुल गांधी को अपना राजनीतिक वारिस मानती हैं, और जब भी उनसे उनके बच्चों के राजनीति में उतरने को लेकर सवाल पूछे जाते थे, वे हर बार प्रिंयंका गांधी को नजरअंजदाज करते हुए राहुल गांधी की ही बात किया करती थीं.’ किदवई कहते हैं, ‘एक बार पत्रकारों ने जब उनसे खासतौर पर सिर्फ प्रियंका गांधी को लेकर सवाल पूछा, तो वे बुरी तरह बिफरते हुए पत्रकारों से ही पूछ बैठी थीं, कि क्या आपको मालूम नहीं कि उनके दो छोटे-छोटे बच्चे हैं.?’
वैसे जिन छोटे-छोटे बच्चों की दुहाई सोनिया गांधी देती रहती हैं, वे अब बड़े हो चुके हैं, और अक्सर प्रियंका गाधी के साथ सार्वजनिक मंचों पर देखे जाते रहते हैं. प्रियंका के बेटे की एक तस्वीर तो पिछले दिनों काफी चर्चित रही थी, जिसमें वे अपने मामा राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी के किसी गांव में खाट पर बैठ कर खाना खाते हुए दिख रहे थे. उस तस्वीर को देख कर कई लोगों का कहना था कि भविष्य में उनका झुकाव भी राजनीति की तरफ ही होगा.
यहां पर एक और तथ्य का जिक्र करना जरूरी है. लगभग तीन महीने पहले कांग्रेस के एक बुजुर्ग नेता माखन लाल फोतेदार की एक किताब ‘चिनार लीव्स’ सामने आई, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि इंदिरा गांधी प्रियंका गांधी को अपने राजनीतिक वारिस के तौर पर देखती थीं, और उन्हें इस बात की चिंता थी कि कहीं प्रियंका का यह हक मार न दिया जाए. फोतेदार का यह भी कहना था कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या के काफी समय बाद उन्होंने जब सोनिया गांधी से इस बात का जिक्र किया तो वे नाराज हो गईं थीं.
कांग्रेस के एक बुजुर्ग नेता माखन लाल फोतेदार की एक किताब ‘चिनार लीव्स’ में दावा किया गया है कि इंदिरा गांधी प्रियंका गांधी को अपने राजनीतिक वारिस के तौर पर देखती थीं,
बहरहाल बात जब प्रियंका के सक्रिय राजनीति में उतरने की हो रही है तो यह जानना भी जरूरी है कि इस बारे में उनकी खुद की राय क्या है. प्रियंका गांधी से अब तक जितनी भी बार यह सवाल पूछा गया, वे हर बार राजनीति में नहीं आने की बात ही कहती आई हैं. वे कहती रही हैं कि वे अमेठी और रायबरेली में ही खुश हैं और राजनीति में नहीं आना चाहती. लेकिन इस सबके इतर एक ध्यान देने वाला तथ्य यह भी है कि सोनिया गांधी, और यहां तक कि राजीव गांधी भी किसी वक्त ऐसी ही बातें किया करते थे. यह बात सभी जानते हैं कि उम्र में संजय गांधी से बड़ा होने के बावजूद राजीव गांधी ने कभी भी इंदिरा गांधी का वारिस बनने की इच्छा प्रकट नहीं की. लेकिन बाद में संजय और इंदिरा की हत्या के बाद जब कांग्रेस का भविष्य खतरे में दिखा तो वे न केवल मैदान में आए बल्कि उनके नेतृत्व में ही कांग्रेस पार्टी सबसे ज्यादा सीटों पर जीती.
उसके बाद सोनिया की कहानी भी कमोबेश ऐसी ही है. कहते हैं कि राजीव गांधी की हत्या के बाद एक वक्त वे बच्चों सहित विदेश में बसने का मन बना चुकी थीं. लेकिन बाद में उन्होंने मरणासन्न पड़ी कांग्रेस में न केवल जान फूंकी बल्कि पूरे एक दशक तक उसे सत्ता में भी बनाए रखा. अब 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पार्टी एक बार फिर अधमरी हालत में पहुंच गई है. लेकिन क्या राहुल गांधी, सोनिया और राजीव की तरह कांग्रेस को नया जीवन दे पाएंगे? यह लाख टके का सवाल है.
कई लोगों की मानें तो राहुल गांधी में आए इन सभी सकारात्मक लक्षणों के पीछे भी उनका खुद का नहीं बल्कि प्रियंका गांधी का ही सबसे ज्यादा योगदान है.
हालांकि इस बीच राहुल गांधी ने कुछ मौकों पर जरूर दमखम दिखाते हुए लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है. सड़क से लेकर संसद में भी वे कुछ मौकों पर प्रभाव छोड़ते हुए देखे गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक मौके पर पहने गए अपने नाम वाले सूट पर तंज करते हुए राहुल गांधी ने उन्हें ‘सूट बूट की सरकार’ कह कर जिस तरह संसद से लेकर सड़क तक घेरा है, उसने समूची कांग्रेस पार्टी में नई ऊर्जा का संचार तो किया ही है. लेकिन पार्टी की चिंता यह है कि उनकी इस आक्रामकता में निरंतरता नहीं है. यह बात बहुत हद तक सही मालूम पड़ती है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि उनके द्वारा प्रधानमंत्री पर हमला बोलने के बाद जैसे ही कांग्रेसजनों का जोश बढता है वे अचानक विदेश चले जाते हैं.
वैसे कई लोगों की मानें तो राहुल गांधी में आए इन सभी सकारात्मक लक्षणों के पीछे भी उनका खुद का नहीं बल्कि प्रियंका गांधी का ही सबसे ज्यादा योगदान है. जानकार बताते हैं कि पिछले साल लोकसभा चुनाव से कहीं पहले से और अब तक प्रियंका गांधी उनके साथ साए की तरह बनी रहती हैं और उन्हें भाषण से लेकर बयान देने तक का प्रशिक्षण देती हैं. इसके अलावा प्रियंका ही राहुल को बताती हैं कि जनता से जुड़े मुद्दों को किस तरह उठाया जाना चाहिए. इस बात से सहमति जताने वाले कई सारे लोग हैं. नीरजा चौधरी तीन साल पहले राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस के अधिवेशन में दिए गए भाषण का हवाला देते हुए कहती हैं, ‘उस भाषण के दौरान राहुल गांधी ने जिस तरह के शब्दों का प्रयोग किया और जैसे हाव-भाव दिखाए उसे देखते हुए उसमें प्रियंका गांधी की छाप साफ तौर पर नजर आ रही थी ’ इसके अलावा केंद्र सरकार के खिलाफ राहुल के जिन आक्रामक तेवरों की अक्सर तारीफ होती है, उसकी पटकथा लेखक भी प्रियंका ही बताई जाती हैं.
‘ऐसा होने की स्थिति में राहुल और प्रियंका के बीच होने वाली तुलना और भी खुले रूप में सामने आने लगेगी, जो राहुल गांधी पर भारी पड़ सकती है.’
यदि यह बात सच है तो फिर सवाल यही उठता है कि प्रियंका खुद क्यों नहीं कमान संभालती? सवाल यह भी है कि क्या सोनिया गांधी इसके लिए कभी तैयार होंगी? जानकारों की मानें तो इस सवाल का जवाब ‘न’ है. वरिष्ठ पत्रकार तथा राजनीतिक विश्लेषक अजय बोस कहते हैं, ‘राहुल गांधी के तमाम मोर्चों पर बुरी तरह असफल साबित होने के बावजूद सोनिया गांधी उन्हें हर हालत में राजनीतिक मोर्चे पर टिकाए रखना चाहती हैं. यह जानते हुए भी कि प्रियंका में उनसे ज्यादा क्षमताएं हैं’ लेकिन क्या प्रियंका को राहुल के सहयोगी के रूप में ही सही थोड़ा और खुल कर मैदान में नहीं उतारा जा सकता? इस सवाल के जवाब में बोस कहते हैं कि ‘ऐसा होने की स्थिति में राहुल और प्रियंका के बीच होने वाली तुलना और भी खुले रूप में सामने आने लगेगी, जो राहुल गांधी पर भारी पड़ सकती है.’
कुल मिलाकर इस सारी कहानी का लब्बोलुआब यह हुआ कि जब तक राहुल गांधी में दशमलव के हजारवें हिस्से के बराबर भी संभावना बची रहती है तब तक अपार योग्यता होने के बावजूद प्रियंका के लिए राजनीति के दरवाजे बंद ही रहने वाले हैं. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कहानी का सार यही है कि प्रियंका का राजनीतिक भविष्य उनके खुद के नहीं बल्कि उनके भाई राहुल गांधी के भविष्य पर निर्भर करेगा. यानी फल चाहे मीठा हो या खट्टा, प्रियंका को खुद के नहीं बल्कि राहुल गांधी के कर्मों से ही मिलेगा.