किसी किताब को हम अगर पढ़ें और वह खोपड़ी पर पड़े हथौड़े की तरह हमें जगा न दे तो हमें उसे क्यों पढना चाहिए? किताब तो बर्फ तोड़ने के हथौड़े की तरह होनी चाहिए जो हमारे भीतर जम गए दरिया को तोड़ सके. मशहूर साहित्यकार फ्रेंज काफ्का के इस कथन को थोड़ा सा हेर-फेर के साथ यूं भी पढ़ा जा सकता है कि कोई लेखक अगर खोपड़ी पर पड़े हथौड़े की तरह हमें जगा न दे तो हम उसे क्यों पढ़ें. यह अलग बात है कि कितने ऐसे होते हैं या हुए कि जिनको इस कसौटी पर लेखक कहा जा सके.

दम लगाकर ढूंढें और कहें तो कह सकते हैं कि एक था - सआदत हसन मंटो

‘था’ लिखने से कइयों को एतराज हो सकता है. लेखक और वह भी मंटो जैसा लेखक ‘था’ कैसे हो सकता है? लेकिन यहां था का मतलब उसकी भौतिक अनुपस्थिति भर से है. वह दोस्तों का हद दर्जे तक दोस्त था (मंटो मेरा दोस्त - मोहम्मद असदुल्लाह), और दुश्मनों का दुश्मन भी (मंटो, मेरा दुश्मन - उपेंद्र नाथ अश्क) पर दोस्तों से बेहतर दुश्मन. संस्मरणों की जान था वह तभी तो कितने सारे संस्मरण लिखे मिल जायेंगे उस पर, अमृता प्रीतम के ’रसीदी टिकट’ से झांक–झांक जाएगा वह. कृष्णा सोबती के ’हम हशमत’ में तो पूरा का पूरा मिलेगा जैसे सशरीर. इस्मत चुगताई का तो जैसा प्राण पियारा दोस्त.

इस्मत आपा का तो यह कहना था कि ‘सारे लेखक खासकर मर्द लेखक मेरे मित्र थे सिर्फ एक मंटो को छोड़कर. मैं लड़कियों जैसी लड़की तो कभी रही नहीं, पुरुषों (लेखकों) से ही मेरी दोस्ती हुई. उनसे दोस्ती गांठने से पहले मैं उनकी पत्नियों को दोस्त बनाती, ताकि दोस्ती का मामला बिना किसी हील-हुज्जत एकसार चलता रहे और मंटो से मेरी दोस्ती की ख्वाहिश तो जैसे दिल से मांगी गई मुराद जैसी थी, पर दिल से मांगी गई मुरादें इतनी आसानी से पूरी भी कहां हुई हैं. उनकी पत्नी से मैं लाख दोस्ती गांठने की कोशिश करती वह घास ही नहीं डालती. (बाद में जाकर यह पता चला कि घास तो वह मंटो साहब को भी न डालती थी).’

इस दोस्ती के अफ़साने भी बड़े दिलचस्प और अजीबोगरीब ठहरे. इन पर साथ-साथ मुकदमे चलते, कहानियों पर अश्लीलता के आरोप भी साथ-साथ लगते, कोर्ट की पेशियों में में भी ये साथ जाते और कई बार साथ-साथ बरी भी हो जाते. दोनों आला दर्जे के लेखक, दोनों की कलम मुर्दें में भी जान फूंक देने की ताकत रखने वाली, दोनों परले दर्जे के हिम्मती और यारबाश. उस वक़्त के पाकिस्तान के पाठक बार-बार सोचते और कहते भी कि क्या ही बेहतर होता कि मंटो और इस्मत का निकाह हो जाता.

इस्मत कभी खीजतीं, कभी लड़तीं, कभी चीखतीं इस बात पर. लेकिन मंटो का जवाब इतना सादा, सुंदर और दिलचस्प आया कि फिर किसी ने पलटकर यह पूछने-कहने की हिम्मत नहीं की. मंटो ने इस सवाल के जवाब में कहीं लिखा था – ‘मंटो और इस्मत की शादी अगर हो जाती तो वह हादसा वर्तमान कथा साहित्य पर एटमी असर रखता. अफसाने अ-फ़साने बन जाते, कहानियां मुड़-तुड़ के पहेली बन जातीं...और ये भी मुमकिन था कि निकाहनामे पर इनके दस्तखत इनके कलम की आखिरी तहरीर होते...निकाहनामे पर ये दोनों कहानियां लिखते और काजी साहब की पेशानी पर दस्तखत कर देते...’

‘मंटो और इस्मत की शादी अगर हो जाती तो वह हादसा वर्तमान कथा साहित्य पर एटमी असर रखता. अफसाने अ-फ़साने बन जाते, कहानियां मुड़-तुड़ के पहेली बन जातीं...’

हैरत करने वाली बात यह है कि ऐसे आला दर्जे के लिक्खाड़ मंटो ने कोई उपन्यास नहीं लिखा (जैसे विश्वास हो कहीं उन्हें अपनी कहानियों की अमरता और दीर्घजीविता पर). जबकि माना यह जाता रहा है लेखकों के बीच कि ‘साहित्य-इतिहास’ में अमर होने के लिए उपन्यास लिखना बहुत जरूरी है, कि वह तो लिखना ही लिखना होगा. पर मंटो ने अपनी कहानियों से इस बात को खारिज किया और आगे की पीढ़ी में उदयप्रकाश ने. राजेंद्र यादव कहते थे चेखव के बाद मंटो ही थे जिन्होंने अपनी कहानियों के दम पर अपनी जगह बना ली, बिना कोई उपन्यास लिखे. और साथ-साथ यह भी कि मंटो की कहानियों की जितनी चर्चा हिंदुस्तान में हुई और होती है, उतनी पाकिस्तान में कभी नहीं हुई.

मंटो हिंदी और उर्दू के मोपांसा (मशहूर फ्रेंच साहित्यकार) हैं. उसी तरह सच-गुसार, उसी तरह की सच-बयानी और उसी तरह से बदनाम भी. वे जानते थे शायद कि नेकनामी की तरफ जाने वाले रास्ते की पहली सीढ़ी बदनामी ही है. उनके प्रिय दोस्त और शायर साहिर लुधियानवी के शब्दों में कहें तो मंटो यह मानते थे - बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं हूं मैं.

इसीलिए शायद ‘कमलेश्वर’ ने उनके लिए कहा था, ‘अपनी कहानियों में विभाजन, दंगों और सांप्रदायिकता पर जितने तीखे कटाक्ष मंटो ने किये उसे देखकर एक ओर तो यकीन नहीं होता है कि कोई कहानीकार इतना साहसी और सच्चा हो सकता है, इतना निर्मम हो सकता है; लेकिन दूसरी ओर यह तथ्य भी चकित करता है कि वे अपनी इस कोशिश से मानवीय संवेदनाओं को कभी चोट नहीं पहुंचाते थे, उसे आहत नहीं करते थे.’ टोबा टेक सिंह, खोल दो, ठंढा गोश्त जैसी उनकी कहानियां इसी बात की तस्दीक करती हैं. हाशिये पर जीने वाले लोग, उनकी मुड़ी-निचुड़ी जिंदगियां, उनके अनाम से दर्द जैसे मंटो को पाकर जिंदा हो गए थे, रूह मिल गई थी जैसे उनके मुर्दा-बेजान जिस्मों को.

होता भी क्यों नहीं ऐसा! देखने वाले देखते उन्हें और सोचते रहते कि मंटो कैसे जी या फिर रह लेता है ऐसे लोगों के साथ. छोटे-बड़े, नीचे-ऊंचे का विभाजन था ही नहीं मंटो की जिंदगी में, चूंकि जिंदगी में नहीं था इसलिए लेखन में भी नहीं था. इस मामले में मंटो एक लोकतांत्रिक लेखक थे और उससे भी पहले एक लोकतांत्रिक इंसान.’

वे जानते थे शायद नेकनामी की तरफ जाने वाले रास्ते की पहली सीढ़ी बदनामी ही है. उनके प्रिय दोस्त और शायर साहिर लुधियानवी के शब्दों में कहें तो मंटो मानते थे-‘बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं हूं मैं.’

आलोचक मोहम्मद हसन असगरी ने मंटो के लिए कहा है, ‘मंटो की दृष्टि में कोई भी मनुष्य मूल्यहीन नहीं था. वह हर मनुष्य के साथ इस आशा से मिलता था कि उसके अस्तित्व में जरुर कोई न कोई अर्थ छिपा होगा जो एक न एक दिन प्रकट हो जाएगा..अच्छे-बुरे, बुद्धिमान-मूर्ख, सभ्य-असभ्य का प्रश्न मंटो के यहां जरा भी न था. उसमें तो इंसानों को क़ुबूल करने की क्षमता इतनी अजीब थी कि जैसा-जैसा आदमी उसके साथ हो वह वैसा ही हो लेता था.’

शायद इसीलिए मंटो के पात्र इतने जीवंत, इतने सहज और इतने बेधड़क भी थे. एक अर्थ में सबसे तुच्छ, निकृष्ट, ऊपर से घिनौने, असहज लेकिन उस खोल के नीचे हद दर्जे तक मानवीय और संवेदनशील. शायद इसलिए भी कि लेखक की सहजता कहीं उसके चरित्रों पर भी हावी हो जाती थी. अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में जो उन्होंने लिखा-कहा वह अद्भुत होने के साथ-साथ उनकी उनकी साफदिली भी दिखाता है.

खुद को बड़ा लेखक या फिर महान ज्ञाता और चिंतक साबित करने की खातिर मंंटो कभी कोई बहुत बड़ा और गूढ़ सा जवाब नहीं देते थे. बस कहते तो वही जो सही था और सहज - ‘मैं अफसाना नहीं लिखता,अफ़साना मुझे लिखता है...कभी-कभी हैरत होती है कि यह कौन है जिसने इतने अच्छे अफसाने लिखे हैं? मैं ऐसे ही लिखता हूं जैसे खाना खाता हूं, गुसल करता हूं. कि मुझे अफसाना लिखने की शराब की तरह लत पड़ी हुई है. तो मैं कागज लेता हूं बिस्मिल्लाह करके, अफसाना शुरू कर देता हूं, मेरी तीन बच्चियां शोर मचा रही होती हैं, मैं उनसे बातें भी करता हूं. उनकी आपसी लड़ाइयों का फैसला भी करता हूं, अगर कोई मिलने आया तो उसकी खातिरदारी भी करता हूं...और अफसाना भी लिखे जाता हूं.’

एक लिहाज से यह बात उन लोगों के लिए भी है जो लेखन को दुष्कर और दुरूह बनाकर, उसका महिमा-मंडन करते हुए लेखक होने के कारण खुद को कुछ खास सहूलियत, ख़ास तरह के व्यवहार का हकदार समझते हैं. जैसे लेखक होना किसी अजायबघर का बाशिंदा होना हो; जिसे दीन-दुनिया की कोई फ़िक्र नहीं, जो एक बंद कमरे में अकेला और चुपचाप बैठकर काग़जी महल बनाता और मिटाता रहे.

छोटे-बड़े, नीचे-ऊंचे का विभाजन था ही नहीं मंटो की जिंदगी में, चूंकि जिंदगी में नहीं था इसलिए लेखन में भी नहीं. इस मामले में मंटो एक लोकतांत्रिक लेखक थे और उससे भी पहले एक लोकतांत्रिक इंसान.’

जब कहानियां पास नहीं फटकतीं तो मंटो भी गुसलखाने में जाते थे, क्योंकि उन्होंने भी सुन रखा था कि बड़े-बड़े लोग वहीं बैठकर सब सोचते और तय करते हैं. पर उनके दिमाग में वहां कोई कहानी नहीं आती थी तो उन्होंने यह तय कर लिया कि वे उस तरह के बड़े लोगों और लेखकों में से बिलकुल नहीं. मंटो ने साफ़-साफ़ कहा, ‘मैं एक जेबकतरा हूं जो अपनी जेब खुद काटता है. जब कहानियां तलाश-तलाशकर मैं थक जाता हूं, बीबी कहती है ज्यादा सोचो मत, लिखने बैठ जाओ. मैं उसकी बात मानकर लिखने बैठ जाता हूं और सचमुच लिखने लगता हूं, दिमाग मेरा खाली होती है सचमुच और जेब भरी. कोई अफसाना मेरी जेब से कूदकर बाहर आ जाता है. मैं खुद को इस दृष्टि से कहानीकार नहीं जेबकतरा मानता हूं जो अपनी जेब खुद काटता है और आपके हवाले कर देता है.

एक सदी से पहले पैदा हुए मंटो के लिए कहा जाता है कि वे अपने समय से पहले पैदा हुए लेखक थे, जिसका खामियाजा उन्होंने कोर्ट के और पागलखाने के चक्कर लगाकर भुगता. मात्र 42 साल की उम्र में इस महान रचनाकार ने 18 जनवरी 1955 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन आधी सदी से भी ज्यादा गुजरने के बाद भी उसकी प्रासंगिकता और लोकप्रियता कायम है.