हाल ही में लाए गए उस अध्यादेश का इतिहास क्या है जो पाकिस्तान गए लोगों की संपत्ति के हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाता है
भारत विभाजन के 70 साल और पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध के 50 साल बाद ‘शत्रु संपत्ति’ का मुद्दा एक बार फिर देश में बहस का मुद्दा बन रहा है. यह बहस डेढ़ हफ्ते पहले केंद्र सरकार द्वारा शत्रु संपत्ति के मामले पर अध्यादेश लाने के बाद शुरू हुई है.
अध्यादेश से फिलहाल सीधे-सीधे महमूदाबाद रियासत से जुड़ी परिसंपत्तियों का भविष्य तय होना है. यह 2005 के सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को अप्रभावी बना देगा जिसके जरिए राजा महमूदाबाद के वारिसों को उनकी संपत्ति, जिसे एक समय ‘शत्रु संपत्ति’ घोषित किया गया था, का मालिकाना हक मिल गया था. लेकिन मुद्दा सिर्फ यही नहीं है. अध्यादेश बताता है कि देश अभी तक बंटवारे की कुछ राजनीतिक विरासतों के विवाद से जूझ रहा है.
शत्रु संपत्ति कानून 1968 में बनाया गया था. यह कानून पाकिस्तान जा चुके लोगों की संपत्ति को ‘शत्रु संपत्ति’ घोषित करके सरकार को अधिकार देता है कि वह उसपर संरक्षक या कस्टोडियन नियुक्त करे
आजादी के पहले महमूदाबाद के राजा की उत्तर प्रदेश में कई परिसंपत्तियां थीं. इस समय लखनऊ के हजरतगंज और उत्तराखंड में ये परिसंपत्तियां मौजूद हैं. 1920 और 30 के दशक में राजा महमूदाबाद की पाकिस्तान आंदोलन में काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. शत्रु संपत्ति कानून का निर्माण, हाल ही में आए अध्यादेश और इससे जुड़ी बहस इस तथ्य से भी प्रभावित होती रही है. बंटवारे के बाद राजा ईराक चले गए. वहां कुछ साल रहने के बाद उन्होंने लंदन को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया. हालांकि उनकी पत्नी और बेटा भारत में ही रहे. उनका परिवार उत्तर प्रदेश की राजनाति में भी सक्रिय रहा.
पाकिस्तान के साथ युद्ध के तीन साल बाद 1968 में शत्रु संपत्ति कानून बनाया गया था. यह कानून पाकिस्तान जा चुके लोगों की संपत्ति को ‘शत्रु संपत्ति’ घोषित करके सरकार को अधिकार देता था कि वह उसपर संरक्षक या कस्टोडियन नियुक्त करे. जब महमूदाबाद के राजा की संपत्ति को शत्रु संपत्ति घोषित किया गया तो उनके परिवार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल कर दी. 2005 में इस विवाद का फैसला आया जो राजा के परिवार के पक्ष में रहा.
यह अंदाजा किसी को नहीं था लेकिन इस एक फैसले ने विवादों का पिटारों खोल दिया. अदालतों में ऐसे केसों का अंबार लग गया. पाकिस्तान जा चुके लोगों के असली-फर्जी रिश्तेदारों ने उस संपत्ति पर दावा जताने के लिए अदालत में ‘दान पत्र’ पेश कर दिए (यह दिखाने के लिए उनके रिश्तेदारों ने पाकिस्तान जाते वक्त उन्हें इसका वारिस बना दिया था). इन लोगों का कहना था कि वे संपत्ति के असली वारिस हैं.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार (यूपीए) का इस मामले में ढुलमुल रवैया रहा है. लेकिन एनडीए सरकार के नए अध्यादेश से अब रियासत की परिसंपत्तियां फिर से शत्रु संपत्ति घोषित हो गई हैं और सरकार इनकी संरक्षक या कस्टोडियन बन गई है.
शत्रु संपत्ति शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल ब्रिटेन में हुआ. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वहां जर्मन सरकार या नागरिकों की जो भी परिसंपत्तियां थीं उनको ‘शत्रु संपत्ति’ घोषित किया गया था
शत्रु संपत्ति का विचार भारतीय प्रायद्वीप में कहां से आया
शत्रु संपत्ति शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल ब्रिटेन में हुआ. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वहां जर्मन सरकार या नागरिकों की जो भी परिसंपत्तियां थीं उनको ‘शत्रु संपत्ति’ घोषित किया गया था. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपने यहां जापानी सरकार या नागरिकों की परिसंपत्तियों को शत्रु संपत्ति घोषित किया था. ज्यादातर मामलों में परिसंपत्तियों के जो कस्टोडियन (सरकार या संस्थान) होते थे उन्होंने इससे होने वाली आमदनी या जब्त की हुई संपत्तियां आखिरकार मूल मालिकों को लौटाई थीं.
दक्षिण एशिया में इसकी शुरुआत कुछ अलग ढंग से हुई. भारत के बंटवारे के बाद विस्थापितों की संपत्ति से संबंधित कानूनों ने इसकी बुनियाद रखी है. 1947 में जब भारत और पाकिस्तान में सरहद पार करके लाखों विस्थापितों की भीड़ आने लगी तो इनके पुनर्वास के लिए सबसे पहले इस तरह के कानून बनाए गए. यह तय किया गया कि जो लोग एक देश में अपना घरबार-संपत्ति छोड़कर दूसरे में गए हैं उनके पुनर्वास के लिए इस छोड़ी गई संपत्ति का इस्तेमाल किया जाए. भारत में शत्रु संपत्ति के संरक्षण और देखभाल के लिए ‘ऑफिस ऑफ द कस्टोडियन ऑफ एनेमी प्रॉपर्टी’ विभाग बनाया गया. हालांकि विस्थापतों के लिए आवास और जमीन मुहैया कराने की इसकी प्रक्रियाएं या इनके इस्तेमाल को लेकर काफी विवाद भी हुए. विस्थापित लोगों के लिए यह विभाग और उसका प्रशासन एक अलग मुसीबत थे.
पाकिस्तान में भी कुछ इसी तर्ज पर व्यवस्था की गई थी. इसके साथ ही दोनों देशों के उच्चायोगों में ‘चल संपत्ति शाखा’ और संपत्ति दावों के लिए विभाग बने. यहां विस्थापतों के मुआवजे और दावों को सुलझाने की शुरुआत हुई.
इन सालों में पाकिस्तानी सरकार ने जो भी शत्रु संपत्ति कब्जे में ली थी वह उसने तुरंत ही बेच दीं. जबकि भारत में ऐसा नहीं हुआ और बंटवारे की यह विरासत भारत की लिए मुसीबत का सबब बन गई
ये कानून सैद्धांतिक रूप से विस्थापितों को अधिकार देते थे कि वे नए देश में अपनी मूल संपत्ति के बराबर कीमत की संपत्ति का दावा कर सकें. अपनी संपत्ति से बेदखल लाखों परिवार सरहद पार करके एक दूसरे देश में आते रहेंगे, इस आशंका की वजह से दोनों देश छोड़ी हुई परिसंपत्तियों पर कड़े कानून बनाने और एकतरफा अधिकार की किसी भी कोशिश से बचते रहे. उनके बीच आपसी सहयोग भी बना रहा. उस समय दोनों सरकारें किसी दूसरे की संपत्ति पर जबर्दस्ती कब्जा करने में सहज नहीं थीं. लेकिन बाद में स्थितियां बदल गईं. इन सालों में पाकिस्तानी सरकार ने जो भी शत्रु संपत्ति कब्जे में ली थी वह उसने तुरंत ही बेच दीं. जबकि भारत में ऐसा नहीं हुआ और बंटवारे की यह विरासत भारत की लिए मुसीबत का सबब बन गई.
1965 के बाद विस्थापित संपत्ति से जुड़े कानूनों की जगह शत्रु संपत्ति कानून बने तो दोनों सरकारों का रवैया इस मसले पर सख्त हो गया था. भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने 1969 में सभी राज्य सरकारों को एक पत्र लिखकर साफ-साफ हिदायत दी थी कि भारत में किसी भी नागरिक के पास यदि पाकिस्तानी नागरिक की कोई भी संपत्ति है तो वह कस्टोडियन के अधिकार में होगी.
दोनों सरकारों ने यह व्यवस्था भी बना दी कि एक दूसरे के यहां स्थित परिसंपत्तियों की बिक्री से हुई आमदनी सरहद के दूसरी तरफ नहीं भेजी जा सकती. इस व्यवस्था सबसे ज्यादा मार उन लाखों विस्थापितों को झेलनी पड़ी जिनके पास विस्थापन के पहले ठीक-ठाक संपत्ति हुआ करती थी.
बंटवारे की कई विरासतें भारतीय उपमहाद्वीप के लिए मुश्किल बनी हुई हैं और शत्रु संपत्ति विवाद भी उन्हीं में से है. महमूदाबाद रियासत के अलावा मुंबई में मोहम्मद अली जिन्ना के घर का मामला और लंदन की एक बैंक में जमा ‘हैदराबाद फंड’ का मुद्दा अभी अनसुलझा ही है और साथ में इस सवाल का जवाब भी कि भारत सरकार कब इन विवादों से फारिग होती है.
(यह हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन पर प्रकाशित आलेख का संपादित स्वरूप है)