लोकायुक्त की नियुक्ति खुद करने और फिर उस पर रोक लगाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार पर खुद को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए इस मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया है
लोकायुक्त जैसी संस्था के साथ छेड़छाड़ उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार को बहुत भारी पड़ रही है. लोकायुक्त की नियुक्ति के मामले में अपनी मनमानी करने की जिद उत्तर प्रदेश सरकार की पहले ही बहुत किरकिरी करवा चुकी थी. अब बुधवार को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि राज्य सरकार द्वारा दिसंबर में लोकायुक्तों की संभावित सूची देकर उसे गुमराह किया गया है. कोर्ट के मुताबिक सच्चाई यह है कि मुख्यमंत्री किसी भी नाम पर नेता विपक्ष और मुख्य न्यायाधीश के साथ सहमति नहीं बना पाए थे. पिछले साल दिसंबर में उत्तर प्रदेश सरकार से सूची मिलने के बाद ही सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस वीरेंद्र सिंह को खुद ही उत्तर प्रदेश का लोकायुक्त नियुक्त कर दिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यूपी में एक लोकायुक्त का नाम तय करने में सरकार को 18 महीने से ज्यादा का वक्त लगा और इस दौरान कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं किया गया. राज्य के ऐसे हालातों के कारण ही पुराना लोकायुक्त दस साल तक काम करता रहा. अदालत ने इस मामले में सच्चिदानन्द गुप्ता द्वारा दायर की गई याचिका पर अपना निर्णय शुक्रवार तक के लिए सुरक्षित रख लिया है.
राज्य सरकार की ओर से इस मामले में हुई सारी गड़बड़ी के लिए नेता विपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य और इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की गई और कहा गया कि इस मामले में राज्यपाल भी राजनीति कर रहे हैं
उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त का मामला 2012 से ही विवादों के केंद्र में है. उस समय तब के लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद लोकायुक्त का कार्यकाल छह साल से बढ़ाकर आठ साल कर दिया गया था. लेकिन उनके आठ साल पूरा कर लेने के बाद भी जब नया लोकायुक्त नियुक्त नहीं हुआ तो सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने में उत्तर प्रदेश सरकार को नया लोकायुक्त नियुक्त करने का निर्देश दिया था. लेकिन यह समय पूरा होने के एक साल बाद तक भी इसलिए लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हो सकी थी कि नियुक्ति करने वाली मुख्यमंत्री, नेता विपक्ष और इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की समिति में इस पर एकराय नहीं थी. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और नेता विपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य जिन जस्टिस रवींद्र सिंह के नाम पर सहमत थे उनपर इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को ऐतराज था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन में सरकार को नियुक्ति का आदेश देने के बाद ऐसा न होने पर खुद ही 16 दिसंबर को सरकार द्वारा दी गई नामों की सूची में से जस्टिस वीरेंद्र सिंह को लोकायुक्त नियुक्त कर दिया था.
अदालत में राज्य सरकार की ओर से इस मामले में हुई सारी गड़बड़ी के लिए नेता विपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य और इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की गई और कहा गया कि इस मामले में राज्यपाल भी राजनीति कर रहे हैं. 19 जनवरी को भी राज्य सरकार ने कहा था कि शुरूआत से ही स्वामी प्रसाद मौर्य लोकायुक्त चयन के मामले में सरकार के साथ थे लेकिन बाद में वे पलट गए (पढ़ें - स्वामी प्रसाद मौर्य : जिन्हें लोकायुक्त मामले ने बसपा में नंबर दो नहीं बनने दिया). सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिए गये हलफनामे में यह भी कहा था कि उसने सुप्रीम कोर्ट को गुमराह नहीं किया और जो सूची अदालत को सौंपी थी उसमें कहीं यह नहीं कहा था कि इन नामों की सूची पर आम सहमति है. मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से नियुक्त वकील कपिल सिब्बल के अदालत में समय पर न पहुंचने पर भी मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने नाराजगी जता कर कहा था कि अगर उनके पास समय नहीं है तो राज्य सरकार कोई वैकल्पिक इन्तजाम करे.
याची के वकील ने अदालत से वीरेन्द्र सिंह की लोकायुक्त पद पर नियुक्ति का आदेश वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि किसी भ्रष्ट और बेईमान व्यक्ति को लोकायुक्त नहीं बनाया जाना चाहिए
बुधवार की सुनवाई में अदालत ने लोकायुक्त की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के 16 दिसम्बर के आदेश में बदलाव की मांग करने वाले याची सच्चिदानन्द गुप्ता से भी पूछा कि लोकायुक्त नियुक्ति से आपका क्या लेना-देना है. इस पर याची द्वारा इसे जनहित का मामला बताया गया और उन्होंने हलफनामा देकर बताया कि आरटीआई द्वारा प्राप्त जानकारी के मुताबिक जस्टिस वीरेन्द्र सिंह पर राज्य उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए गए हैं.
याची के वकील ने अदालत से वीरेन्द्र सिंह की लोकायुक्त पद पर नियुक्ति का आदेश वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि किसी भ्रष्ट और बेईमान व्यक्ति को लोकायुक्त नहीं बनाया जाना चाहिए. अदालत ने तो सुनवाई पूरी करने के बाद निर्णय शुक्रवार तक के लिए सुरक्षित कर लिया है. मगर अदालत की तल्ख टिप्पणियों से राजधानी लखनऊ में कई तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है. इन चर्चाओं में एक चर्चा तो यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इस मामले की पैरवी के लिए कपिल सिब्बल को राज्यसभा भेजने की पेशकश की गई थी और दूसरी चर्चा यह है कि मामले की ठीक से पैरवी न कर पाने और राज्य सरकार पर कड़ी टिप्पणियों के कारण राज्य के एडवोकेट जनरल विजय बहादुर सिंह पर गाज भी गिर सकती है.
यह समझा जा रहा है कि राज्य सरकार इस मामले में अब बचाव की मुद्रा अपनाने जा रही है. क्योंकि अदालत ने यह कहकर कि राज्य सरकार ने हमें गुमराह किया है, हम इस मुद्दे को अलग से देखेंगे, राज्य सरकार की परेशानी और बढ़ा दी है.
लोकायुक्त जैसी संवैधानिक संस्था पर ‘अपना आदमी’ थोपने की अखिलेश सरकार की कोशिशों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से लेकर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल, नेता विपक्ष और सर्वोच्च न्यायालय तक को असहज स्थिति में पहुंचा दिया है
वैसे इस मामले में अदालत की एक और टिप्पणी भी सरकार के लिए परेशानी की वजह बन सकती है जिसमें अदालत ने यह कहा है कि अगर जस्टिस वीरेन्द्र सिंह का नाम वापस लिया जाता है तो भी सुप्रीम कोर्ट ही नए लोकायुक्त की नियुक्ति करेगा. चयन समिति का इसमें कोई रोल नहीं होगा.
इस मामले में अदालत का फैसला तो शुक्रवार को आना है लेकिन एक बात अभी भी साफ ही है कि लोकायुक्त जैसी संवैधानिक संस्था में ‘अपना आदमी’ थोपने की अखिलेश सरकार की कोशिशों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चन्द्रचूड से लेकर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक नेता विपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य और सर्वोच्च न्यायालय तक को असहज स्थिति में पहुंचा दिया है.
और जानकारी
वीरेंद्र सिंह की नियुक्ति रद्द हुई तो यह अखिलेश सरकार के काम पर असफलता की एक और मोहर होगी
लोकायुक्त चुनने के लिए अखिलेश सरकार ने जिस सूची पर विचार किया उसमें 30 जज ऐसे भी थे जिनकी मौत हो चुकी है