मालदा में हुई हिंसा पर दादरी जैसी प्रतिक्रिया क्यों नहीं हुई? क्यों टीवी चैनलों ने इस घटना को उतना समय नहीं दिया जितना दादरी को दिया गया था? असहिष्णुता' पर बोलने वाले मालदा की घटना पर शांत क्यों हैं? क्यों इस घटना पर बुद्धिजीवी अपने अवार्ड नहीं लौटा रहे? क्यों एक समुदाय विशेष द्वारा की गई इस हिंसा को सांप्रदायिक हिंसा नहीं कहा जा रहा?... बीती 3 जनवरी को पश्चिम बंगाल के मालदा में हुई हिंसा पर ऐसे कई सवाल आज भी देश भर में उठाए जा रहे हैं.

मालदा से जुड़े सवालों पर विचार करने के लिए जिस सवाल का जवाब जानना जरूरी है, वह है - क्या मालदा में हुई हिंसा सांप्रदायिक थी? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हाल ही में 'जन जागरण शक्ति संगठन' (जेजेएसएस) नाम के संगठन की ओर से एक तीन सदस्यीय जांच दल मालदा गया था. इस जांच दल ने अपनी प्राथमिक रिपोर्ट में मालदा से जुड़े कई तथ्य सामने रखे हैं और बताया है कि क्यों मालदा की घटना को सांप्रदायिक हिंसा नहीं कहा जा सकता. लेकिन इस रिपोर्ट में कई तथ्यों को पूरी तरह से नज़रंदाज़ भी किया गया है जिसके कारण यह जवाब देने की बजाय खुद भी कई सवाल पैदा कर देती है. चूंकि जेजेएसएस की इस रिपोर्ट को कई लोग अपने तर्कों का आधार बना रहे हैं और कुछ आगे भी बना सकते हैं, इसलिए सत्याग्रह ने इन सवालों पर विचार करना भी जरूरी समझा.

इस हिंसा में दो दर्जन से भी ज्यादा गाड़ियों को जलाए जाने की की पुष्टि विभिन्न माध्यमों से हो चुकी है. लेकिन इसके बावजूद भी इस रिपोर्ट में उनका कोई जिक्र नहीं किया गया है.

जेजेएसएस 'जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय' (एनएपीएम) से सम्बद्ध एक संस्था है. अपनी रिपोर्ट में जेजेएसएस ने बताया है कि मालदा की घटना के दस दिन बाद भी जब इसकी व्याख्या सांप्रदायिक शब्दावली में हो रही थी तो उनकी टीम ने फैसला किया कि आखिर वहीं जाकर पूरे घटनाक्रम को समझा जाए. रिपोर्ट में इस घटना की शुरूआती जानकारी देते हुए बताया गया है कि 'हिन्दू महासभा के कथित नेता कमलेश तिवारी के पैगम्बर हजरत मोहम्मद के बारे में दिए गए विवादास्पद बयान का विरोध देश के कई कोने में हो रहा है. इसी सिलसिले में मालदा के कालियाचक में 3 जनवरी को कई इस्लामी संगठनों ने मिलकर एक विरोध सभा का आयोजन किया. इसी सभा के दौरान कालियाचक में हिंसा हुई.'

विरोध सभा में आए लोगों के बीच हिंसा की शुरुआत कैसे हुई? इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब रिपोर्ट में नहीं है. रिपोर्ट सिर्फ इतना बताती है कि इस बारे में अलग-अलग राय सुनने को मिलीं. लेकिन उनमें से किसी राय का जिक्र रिपोर्ट में नहीं किया गया है. हिंसा का जिक्र करते हुए रिपोर्ट बताती है कि 'थाने में आग लगाईं गई, दस्तावेज जलाए गए, वहां खड़ी पुलिस की गाड़ियों को जलाया गया. हमें एक गाड़ी जली दिखाई दी.' इस हिंसा में दो दर्जन से भी ज्यादा गाड़ियों को जलाए जाने की की पुष्टि विभिन्न माध्यमों से हो चुकी है. लेकिन इसके बावजूद भी इस रिपोर्ट में उनका कोई जिक्र नहीं किया गया है.

रिपोर्ट बताती है कि थाने के ठीक पीछे एक मोहल्ला है जिसे बालियाडांगा हिन्दू पाड़ा कहा जाता है. इस मोहल्ले के कुछ घरों और दुकानों में भी तोड़-फोड़ और आगजनी हुई थी. रिपोर्ट के अनुसार, 'हिन्दू पाड़ा के कुछ लोगों का कहना है कि जब थाने में हिंसा हुई और कुछ उपद्रवी मोहल्ले की तरफ आए और मंदिर की तरफ बढ़े तो इधर से भी प्रतिवाद हुआ. इसके बाद मोहल्ले में पथराव या आगजनी हुई.' इसके तुरंत बाद ही रिपोर्ट में लिखा है - 'यानी हिंसा का दायरा काफी सीमित था. उसका लक्ष्य थाना ही था.' ये दोनों बातें स्वयं में ही विरोधाभासी हैं.

एक अंग्रेजी अखबार में छपे इस लड़के के बयान के अनुसार उसे तब गोली लगी थी जब वह मंदिर में उपद्रव करने वालों को रोकने की कोशिश में असमर्थ रहा और बढ़ती भीड़ देखते हुए भागने लगा था.

मंदिर पर हुए हमले के बारे में रिपोर्ट कहती है, 'मंदिर के बाहर जाली की बैरिकेडिंग टूटी दिखाई दी. पड़ोसियों का कहना है कि इसे उपद्रवियों ने ही तोड़ा है. मंदिर का भवन और मूर्ति पूरी तरह सुरक्षित दिखी.' इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी जिक्र है कि इस हिंसा में एक व्यक्ति गोली लगने के चलते घायल हो गया था जो कई दिन अस्पताल में भर्ती रहने के बाद अब अपने घर लौट चुका है. लेकिन रिपोर्ट यह नहीं बताती कि वह व्यक्ति इसी मंदिर में पूजा करवाने वाला एक 19-20 साल का लड़का था. एक अंग्रेजी अखबार में छपे इस लड़के के बयान के अनुसार उसे तब गोली लगी थी जब वह मंदिर में उपद्रव करने वालों को रोकने की कोशिश में असमर्थ रहा और बढ़ती भीड़ देखते हुए भागने लगा था.

एक व्यक्ति को गोली लगने की बात से यह भी साफ़ है कि इस भीड़ में शामिल लोगों के पास बंदूकों, तमंचों या कट्टों जैसे हथियार भी थे. लेकिन इस तथ्य का जिक्र भी रिपोर्ट में कहीं नहीं किया गया है. क्षेत्र की जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार रिपोर्ट बताती है कि '2011 की जनगणना के अनुसार कालियाचक की कुल आबादी 3,92,517 है. इसमें सिर्फ 10.6 प्रतिशत हिंदू हैं और 89.3 प्रतिशत मुलसमान हैं.' इन आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट कहती है, 'हमारा मानना है कि अगर यह सांप्रदायिक घटना होती या हिंसा का मकसद हिन्दुओं पर हमला करना होता तो हिन्दू पाड़ा या आसपास के इलाके की शक्ल आज अलग होती.'

इस बात को कुछ हद तक सही भी माना जा सकता है. लेकिन एक तथ्य यह भी है कि जितनी भी दुकानें जलाई गई, घरों में तोड़-फोड़ की गई वे सभी दूसरे समुदाय के ही थे. इसलिए यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि यदि हिंसा किसी को निशाना बनाकर नहीं की गई थी तो फिर हिंसा की चपेट में 90 प्रतिशत बहुसंख्यकों के घर छोड़कर सिर्फ दस प्रतिशत अल्पसंख्यकों के ही घर या दुकानें क्यों आई?

यदि हिंसा किसी को निशाना बनाकर नहीं की गई थी तो फिर हिंसा की चपेट में 90 प्रतिशत बहुसंख्यकों के घर छोड़कर सिर्फ दस प्रतिशत अल्पसंख्यकों के ही घर या दुकानें क्यों आई?

इस रिपोर्ट में यह जरूर लिखा गया है कि 'यह पूरी घटना शमर्नाक और निंदनीय है' लेकिन इसके साथ ही रिपोर्ट में कई तथ्यों को छिपाकर यह बताने की कोशिश की गई है कि इस घटना का सांप्रदायिकता से कोई लेना-देना नहीं है. ऐसा करना भी एक तरह से सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना ही है. मालदा में विरोध कर रहे लोगों का मुख्य विरोध कमलेश तिवारी नाम के व्यक्ति से था. जबकि विरोध के दिन से लगभग एक महीना पहले ही उसको गिरफ्तार किया जा चुका था.

इसके साथ ही यह विरोध शांतिपूर्ण भी नहीं था. विरोध में शामिल हुए लोग हथियार लेकर वहां पहुंचे थे, सरकारी संपत्ति के साथ ही एक ही समुदाय के घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया और मंदिर में तोड़फोड़ की कोशिश के साथ ही वहां पूजा करने वाले व्यक्ति को गोली मारी गई. इन तमाम तथ्यों के बावजूद भी यदि इस घटना के सांप्रदायिक होने की संभावना को सिरे से ख़ारिज किया जाता है तो यह भी एक दिशा में सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना ही होगा.

हालांकि इस घटना की तुलना दादरी की घटना से करना भी सही नहीं कहा जा सकता जहां भीड़ का निशाना ही दूसरे समुदाय का एक परिवार था. लेकिन मालदा में भी जो उन्माद हुआ वह धर्म के नाम पर ही था और उसकी चपेट में सरकारी संपत्तियों के अलावा जो लोग थे वे उस इलाके के अल्पसंख्यक यानी हिंदू थे. इसलिए इस तरह की घटनाओं में यदि तथ्यों को छिपाकर इनसे मुंह फेर लेने की कोशिश होती है तो क्या वह भी उस बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देना नहीं है जिसका माहौल आज देश भर में बनाने का आरोप मौजूदा केंद्र सरकार पर लगता रहा है.

रिपोर्ट के इस पक्ष को इसलिए भी गंभीरता से लिया जा सकता है क्योंकि उन्मादियों ने सबसे पहले थाने में रखे दस्तावेजों को ही नष्ट किया था और फिर वहां आग लगा दी थी

जेजेएसएस की इस रिपोर्ट के आखिरी हिस्से में यह जानकारी भी शामिल है कि मालदा के इस क्षेत्र में तस्करी, अफीम की खेती, जाली नोटों के धंधे और बम एवं कट्टे बनाने का काम भी किया जाता है. इस तथ्य के आधार पर रिपोर्ट कहती है कि इस हिंसा में मुख्य भूमिका उन लोगों की भी हो सकती है जो इस तरह के अवैध धधों में शामिल रहे हैं.

रिपोर्ट के इस पक्ष को इसलिए भी गंभीरता से लिया जा सकता है क्योंकि उन्मादियों ने सबसे पहले थाने में रखे दस्तावेजों को ही नष्ट किया था और फिर वहां आग लगा दी थी. लेकिन यदि यह मान भी लिया जाए कि यह हिंसा उन अपराधियों की ही साजिश थी तो भी यह तो साफ़ ही है कि ये उन्मादी अपने मंसूबों में इसीलिए कामयाब हुए क्योंकि लाखों लोग धर्म के नाम पर उन्माद करने को उतर आए थे.