पीडीएस का फायदा लेने वाले गरीबों की सूची कम करने कोशिश में राजस्थान सरकार ने 1.4 करोड़ लोगों का नाम बीपीएल श्रेणी से हटा दिया है
दोपहर का सूरज सिर चढ़ आया है लेकिन नौजीबाई भील के लिए इंतजार खत्म नहीं हुआ है. वे राजसमंद जिले के जन शिकायत-निवारण प्रकोष्ठ के बाहर अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं. ‘सरपंच ने मेरा लाल राशन कार्ड रद्द कर दिया और उसके बदले नीला कार्ड दे दिया है’ डांग के वास गांव की नौजीबाई बताती हैं, ‘अब मुझे राशन में गेहूं नहीं मिल सकता सिर्फ केरोसीन ही मिलेगा.’
अपनी उम्र का साठवां दशक देख रहीं नौजीबाई आदिवासी समुदाय से आती हैं. इस उम्र में खेतिहर मजदूरी उनके बस की नहीं इसलिए इस विधवा महिला को फिलहाल हर महीने मिलने वाली 500 रुपये वृद्धावस्था पेंशन से ही गुजारा करना पड़ रहा है. हालांकि पहले वे मनरेगा में काम कर चुकी हैं लेकिन बीते कुछ महीनों के दौरान उनके क्षेत्र में सूखे जैसे हालात होने के बावजूद मनरेगा का कोई काम शुरू नहीं हुआ.
‘हमें ऊपर से आदेश थे कि 30 फीसदी बीपीएल परिवारों को सूची से हटा दिया जाए. हमें आदेश थे कि सभी नए कार्ड सिर्फ एपीएल (गरीबी रेखा से ऊपर) ही हो सकते हैं’
नौजीबाई के साथ-साथ भीलवाड़ी टोला की दो और महिलाओं ने जिला स्तर पर यही शिकायत दर्ज करवाई है कि जिस राशन कार्ड के मार्फत उन्हें पिछले 15 सालों से रियायती दर पर राशन मिल रहा था, वह बदल दिया गया है. यह सिर्फ रंग का बदलाव नहीं है. इन भूमिहीन महिलाओं के जीवन में इस बदलाव ने डर और चिंता भर दी है.
राजसमंद मध्य राजस्थान में स्थित है. यहां डर और चिंता से भरी कहानियों से कई बार आपका वास्ता पड़ता है. शायद इसकी एक वजह ये भी है कि राजसमंद राज्य का सबसे गरीब और बंजर भूमि वाला जिला है. पिछले मॉनसून में नाममात्र हुई बारिश ने इस जिले के लोगों के लिए यह संकट और बढ़ा दिया है. दूसरा संकट अभी कुछ हफ्ते पहले आया जब जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत गरीबी रेखा से नीचे के लाभार्थियों वाली सूची से इन हजारों लोगों का नाम हटा दिया गया. अब उनके लाल राशन कार्ड, नीले राशन कार्ड से बदल दिए गए हैं.
सरकार की पहचान प्रक्रिया में गड़बड़झाला है
राजस्थान सबसे पहले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने वाले राज्यों में से था. अगस्त, 2013 में कानून पास हुआ था और राज्यों को यह लागू करने के लिए एक साल का वक्त दिया गया था. राजस्थान में दिसंबर के आसपास चुनाव होने थे. यह देखते हुए अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने योजना को जल्दी से जल्दी लागू करने की तैयारी शुरू कर दी. इतनी जल्दी योजना को लागू करने का मतलब था कि जरूरी तैयारियां पीछे छूट गईं.
उस समय गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों की जनसंख्या का पुराना आंकड़ा उपलब्ध था. सरकार को योजना लागू करने के पहले इस आंकड़े की जगह 2013 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के आंकड़ों के आधार पर नए लाभार्थियों का नाम जोड़ना था. लेकिन ये आंकड़े पूरी नहीं थे. योजना लागू करने के लिए सरकार ने 2002 की जनगणना को आधार बनाया और नए राशन कार्ड बांट दिए. चुनाव के कारण सरकार किसी तबके को नाराज नहीं करनी चाहती थी इसलिए नए लाभार्थियों के नाम तो जोड़े गए लेकिन पुरानी सूची में से कोई नाम हटाया नहीं गया.
भाजपा सरकार का कहना है कि पुरानी सूची में राज्य की तकरीबन 90 फीसदी ग्रामीण आबादी खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में आ गई थी जबकि कानून के मुताबिक राजस्थान में यह सीमा 69 फीसदी है
यह गलती तब और बड़ी हो गई जब भाजपा सरकार ने ताजा सूची में से कई नाम यह कहकर हटा दिए कि पूर्ववर्ती सरकार ने अनुचित रूप से कुछ ज्यादा ही नाम सूची में शामिल कर दिए थे. भाजपा सरकार का कहना है कि पुरानी सूची में राज्य की तकरीबन 90 फीसदी ग्रामीण आबादी खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में आ गई थी जबकि कानून के मुताबिक राजस्थान में यह सीमा 69 फीसदी है. अब 2013 के सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के आंकड़े भी मौजूद हैं लेकिन वसुंधरा राजे सरकार 2002 के आंकड़ों के आधार पर ही लाभार्थियों के नाम इस सूची से हटा रही है. इससे एक तरह की दुविधा की स्थिति पैदा बन रही है और राजसमंद की जिन आदिवासी महिलाओं का हमने शुरू में जिक्र किया, उनके लिए मुसीबत बड़ी हो गई है क्योंकि इन्हें ही रियायती दर पर राशन की सबसे ज्यादा जरूरत है और इनका नाम ही सूची से गायब है.
सबसे ताज्जुब की बात है कि अंत्योदय योजना के लाभार्थी, जो गरीबी रेखा के नीचे के लोगों में भी सबसे निचले स्तर पर हैं, सूची में उनकी संख्या राजस्थान सरकार ने तकरीबन आधी कर दी है. जबकि खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत इन सभी लोगों का नाम नई सूची में शामिल होना चाहिए. अंत्योदय योजना के तहत हर महीने 35 किलो अनाज (तीन रुपये किलो चावल और दो रुपये किलो गेहूं) मिलता है. इन हितग्राहियों में ज्यादातर आदिवासी, बुजुर्ग दंपति, विधवा या परित्यक्ता महिलाएं शामिल हैं जो बाजार की दर से अनाज नहीं खरीद सकते. राजस्थान में पहले 9.3 लाख लोग अंत्योदय योजना में शामिल थे लेकिन अब उनकी संख्या तकरीबन 4.9 लाख कर दी गई है.
सबसे बुरा असर आदिवासी जिलों पर पड़ा है
राजस्थान में खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग के मुख्य सचिव सुबोध अग्रवाल सरकार के इस फैसले का यह कहकर बचाव करते हैं कि सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून के हिसाब से लाभार्थियों की संख्या कम की गई है. ‘पिछले साल तक रियायती राशन के लाभार्थियों की संख्या प्रावधानों के लिहाज से काफी ज्यादा थी और हम इन लोगों को अनाज की पूरी मात्रा उपलब्ध नहीं करा पाते थे.’ अग्रवाल कहते हैं, ‘हमने ग्राम समितियां बनाई हैं जो निर्धारित करेंगी कि कौन लोग लाभार्थी हैं कौन लोग नहीं. यदि कोई अनुचित रूप से इस सूची से बाहर हो गया है तो वह जिला प्रशासन के सामने अपील कर सकता है.’
सबसे ताज्जुब की बात है कि अंत्योदय योजना के लाभार्थी, जो गरीबी रेखा के नीचे के लोगों में भी सबसे निचले स्तर पर हैं, सूची में उनकी संख्या राजस्थान सरकार ने तकरीबन आधी कर दी है
हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता इस तर्क से सहमत नहीं हैं. वे इशारा करते हैं कि काफी अधिक संख्या में अंत्योदय योजना के लाभार्थियों को सूची से हटाया गया है. खासकर उन जिलों जहां आधी से ज्यादा आबादी आदिवासी वर्ग में आती है और यहीं गरीबों में भी सबसे गरीब लोग रहते हैं. ‘उदयपुर में 48 फीसदी आबादी आदिवासियों की है, यहां अंत्योदय श्रेणी में शामिल परिवारों की संख्या 85,000 से कम करके 28,000 कर दी गई है.’ भोजन का अधिकार अभियान से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘अब यदि कोई आदिवासी या गरीब परिवार इसके खिलाफ अपील करे तो क्या पंचायत सदस्य विधायक या सरपंच के खिलाफ जाएंगे?’ अग्रवाल साथ में यह भी कहते हैं कि सरकार को नए आंकड़ों के आधार पर सूची में बदलाव करने चाहिए थे.
अब सिर्फ गरीबी रेखा से ऊपर का कार्ड धारक (एपील) ही बनेगा!
पंचायत स्तर पर जिस समिति को नई सूची बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी उसमें ग्राम सेवक, पटवारी और राशन दुकान का डीलर शामिल थे. जिन भील महिलाओं का जिक्र हमने इस रिपोर्ट में किया है उनका परिवार समीचा पंचायत के अंतर्गत आता है. यहां के ग्राम सेवक सुभाष मीना कहते हैं कि समिति ने उन लोगों के घर-परिवार का जायजा लिया था जिनका नाम 2002 के हिसाब से बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) सूची में शामिल था. ‘हमें ऊपर से आदेश थे कि 30 फीसदी बीपीएल परिवारों को सूची से हटा दिया जाए.’ मीना जानकारी देते हैं, ‘हमने किसी का  भी नाम गलत तरीके नहीं हटाया. लेकिन हमें आदेश थे कि सभी नए कार्ड सिर्फ एपीएल (गरीबी रेखा से ऊपर) ही हो सकते हैं.’ इसका मतलब है कि यदि बीपीएल परिवार का कोई वयस्क सदस्यों (शादीशुदा) यदि अपने एकल परिवार के लिए नया कार्ड बनवाना चाहे तो उसे एपीएल कार्ड ही मिलेगा चाहे वह कितना भी गरीब क्यों न हो. उर्स पंचायत के अटलउम्बा गांव के ग्रामीण इस तर्क पर सवाल उठाते हैं. भैरू लाल भील कहते हैं कि उन्हें अब भी बीपीएल कार्ड के आधार पर रियायती राशन मिलता है लेकिन उनका बेटा जो अब परिवार से अलग हो गया है उसे बीपीएल कार्ड देने से मना कर दिया गया है. वे बताते हैं, ‘मेरे बेटे जीवन लाल के पास कोई लगा-लगाया काम नहीं है, उसके नाम कोई जमीन नहीं है. मेरा पास ढाई बीघा जमीन है लेकिन वो बंजर है, जहां अनाज का एक दाना भी नहीं उगता. तो उन्होंने किस आधार पर मेरे बेटे का गरीबी रेखा से ऊपर का कार्ड बना दिया?’
मजदूर किसान शक्ति संगठन के कार्यकर्ता निखिल डे कहते हैं कि राजस्थान सरकार ने 1.4 करोड़ लाभार्थियों के नाम सूची से हटाए हैं. अपने जनअभियान के तहत संगठन के सदस्यों ने राज्य में कई यात्राएं की हैं. इस दौरान उन्हें जन योजनाओं से जुड़ी 4,100 शिकायतें मिलीं. इसमें से आधी राशन न मिलने के बारे में हैं. ‘हमने अभी तक 13 जिलों की यात्रा की है और हमें लगातार यही शिकायतें सुनने को मिल रही हैं कि गलत तरीके से लोगों का नाम बीपीएल सूची हटा दिया गया है.’ निखिल कहते हैं, ‘सरकार को गांव की सार्वजनिक दीवारों पर लाभार्थियों की सूची लगानी चाहिए और सार्वजनिकरूप से यह भी बताना चाहिए कि उनका चयन किस आधार पर किया गया है.’
फिलहाल राजसमंद की तरह राजस्थान के सबसे गरीब लोगों की कतारें जिलों के शिकायत निवारण प्रकोष्ठों में बढ़ती जा रही हैं. राशन की दुकानों से जुड़ी व्यवस्था पहले भी खामियों से भरी थी लेकिन, तब कम से कम लोग इनके भरोसे जिंदगी जी रहे थे. अब उनके इस सहारे पर भी सवालिया लग गया है.