अनीता बोस का यह भी मानना है कि अगर सुभाष चंद्र बोस जिंदा होते तो वे जवाहर लाल नेहरू का एक अहम विकल्प होते.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बोस फाफ का कहना है कि उनके पिता की 1945 में हुए प्लेन हादसे में ही मौत हो गई थी. वे इस बात से भी खफा हैं कि उनके जिंदा होने को लेकर तरह-तरह की कहानियां प्रचलित हो गई हैं. कल यानी सुभाष चंद्र बोस के जन्म दिन पर नरेंद्र मोदी सरकार उनकी मौत से जुड़े कई क्लासीफाइज दस्तावेज सार्वजनिक करने वाली है. लेकिन अनीता को लगता है कि इससे भी यह विवाद शांत नहीं होगा. अकादमिक जगत से जुड़ी रहीं और अर्थशास्त्री अनीता इन दिनों जर्मनी के आउसबर्ग शहर में रहती हैं.
हिंदुस्तान टाइम्स की एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक इस विवाद पर पूर्णविराम लगाने के लिए अनीता नेताजी के उन अवशेषों से अपना डीएनए टेस्ट करवाने के लिए भी तैयार हैं जो जापान में एक मंदिर में रखे हुए हैं. अखबार के साथ बातचीत में वे कहती हैं, 'इस प्रक्रिया में भारत और जापान, दोनों सरकारों को शामिल होना होगा, उन्हें अपनी सहमति देनी होगी क्योंकि उसके बिना मंदिर का पुजारी अवशेष देने के लिए तैयार नहीं होगा.' वे आगे कहती हैं, 'पहले तो मुझे थोड़ी हिचक थी क्योंकि मुझे लगा जापान के लोग इससे बेहद अपमानित महसूस करेंगे. लेकिन जिस अपमानजक तरीके से यह चर्चा दर्शकों से चल रही है उसे देखते हुए कम से कम तर्क पर चलने वाले लोग तो यह बात मान लेंगे.''
'तब नेहरू का एक अहम विकल्प मौजूद होता. हालांकि हमें यह भी सोचना चाहिए कि कई मुद्दों पर उनके विचार एक जैसे ही थे. वे दोनों ही एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था के पक्षधर थे जो सांप्रदायिक विवादों से मुक्त हो.'
73 साल की अनीता तब सिर्फ एक महीने की थीं जब नेताजी ने विएना में उनको आखिरी बार देखा था. उनका कहना है कि वे उन लोगों के साक्षात्कारों के दौरान वहां मौजूद थीं जो इस प्लेन हादसे में बच गए थे. उनके मुताबिक अगर नेताजी जिंदा होते तो गुमनामी में रहने के बजाय वे अपने समय की राजनीति में शामिल होते.
वे कहती हैं, 'इसके कई परिणाम हो सकते थे. तब नेहरू का एक अहम विकल्प मौजूद होता. हालांकि हमें यह भी सोचना चाहिए कि कई मुद्दों पर उनके विचार एक जैसे ही थे. वे दोनों ही एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था के पक्षधर थे जो सांप्रदायिक विवादों से मुक्त हो. वे दोनों नजरिये में आधुनिक थे और दोनों ही देश का औद्योगीकरण चाहते थे. लेकिन मुझे लगता है कि पाकिस्तान को लेकर उनका रुख अलग रहा होता.' बोस बंटवारे के पक्ष में नहीं थे और अनीता का मानना है कि अगर वे विभाजन नहीं रोक पाते तो शायद उन्होंने पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंध रखने की कोशिशें की होतीं और इसमें सफल हुए होते.
दिल्ली पुलिस ने 64 हजार और सिपाही मांगे थे, मिले सिर्फ 4227
दो साल पहले दिल्ली पुलिस ने मांग की थी कि देश की राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था ठीक से संभालने के लिए उसे स्टाफ के आंकड़े में 64 हजार की बढ़ोतरी की जरूरत है. बीते साल इसे घटाकर 50 हजार किया गया और गृहमंत्रालय को सूचित किया गया कि फिलहाल 15,528 लोगों से काम चल जाएगा. द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक अब जो फैसला हुआ है उसमें यह आंकड़ा 4227 पर जाकर अटका है. ये भर्तियां अगले दो साल के दौरान दो चरणों में होंगी.
सूत्रों के मुताबिक 64 हजार की बढ़ोतरी की मांग इसलिए की गई थी कि पिछले 10 साल से दिल्ली पुलिस में कोई नई भर्ती नहीं हुई है. लेकिन मंत्रालय का तर्क था कि फोर्स को आदमी बढ़ाने से ज्यादा तकनीक को बेहतर करने पर ध्यान देना चाहिए. लेकिन इस मोर्चे पर भी कोई खास प्रगति नहीं हो सकी इसलिए स्टाफ में इतनी थोड़ी सी बढ़ोतरी से भी समस्या जस की तस बने रहने के ही आसार हैं. इन 4227 लोगों का चयन ऑनलाइन होगा जिससे इस प्रक्रिया में लगने वाला समय और इसकी लागत, दोनों बढ़ जाएंगे.
2013 में हुए निर्भया कांड के बाद दिल्ली पुलिस की बहुत आलोचना हुई थी. इसके बाद राजधानी में सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के लिए कई उपायों की बात कही गई थी. इसके लिए स्टाफ में बढ़ोतरी जरूरी थी. लेकिन अब लगता है कि स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आने वाला है.