26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ तो इसमें देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी सहित 14 भाषाओं को आठवें शेड्यूल में आधिकारिक भाषाओं के रूप में रखा गया. संविधान के मुताबिक 26 जनवरी 1965 में हिंदी को अंग्रेजी के स्थान पर देश की आधिकारिक भाषा बनना था और उसके बाद हिंदी में ही विभिन्न राज्यों को आपस में और केंद्र के साथ संवाद करना था. ऐसा आसानी से हो सके इसके लिए संविधान में 1955 और 1960 में राजभाषा आयोगों को बनाने का प्रावधान भी रखा गया था जिन्हें हिंदी के विकास के लिए रिपोर्ट देनी थी. इन रिपोर्टों के आधार पर संसद की संयुक्त समिति को राष्ट्रपति को इस संबंध में कुछ सिफारिशें करनी थीं.

आजादी के बाद के 20 सालों में भाषा के मुद्दे ने देश को सबसे ज्यादा परेशान किया और इसकी वजह से एक समय नये-नये बने देश के बिखरने का खतरा भी आ खड़ा हुआ था. दक्षिण भारत के राज्यों में रहने वालों को लगता था कि हिंदी के लागू हो जाने से वे उत्तर भारतीयों के मुकाबले विभिन्न क्षेत्रों में कमजोर स्थिति में हो जाएंगे. हिंदी को लागू करने और न करने के आंदोलनों के बीच 1963 में राजभाषा कानून 1963 पारित किया गया जिसने 1965 के बाद अंग्रेजी को राजभाषा के तौर पर इस्तेमाल न करने की पाबंदी को खत्म कर दिया. हिंदी का विरोध करने वाले इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे. उन्हें लगता था कि पंडित नेहरू के बाद इस कानून में मौजूद कुछ अस्पष्टता फिर से उनके खिलाफ जा सकती है.

हिंदी को लागू करने और न करने के आंदोलनों के बीच 1963 में राजभाषा कानून 1963 पारित किया गया जिसने 1965 के बाद अंग्रेजी को राजभाषा के तौर पर इस्तेमाल न करने की पाबंदी को खत्म कर दिया

1965 की 26 जनवरी को हिंदी देश की राजभाषा बन गई और इसके साथ दक्षिण भारत के राज्यों - खास तौर पर तमिलनाडु (तब का मद्रास) में, आंदोलनों और हिंसा का एक जबर्दस्त दौर चला. इसमें कई छात्रों ने आत्मदाह तक कर लिया. इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मंत्री रहीं इंदिरा गांधी के प्रयासों से इस समस्या का समाधान ढूंढ़ा गया जिसकी परिणति 1967 में राजभाषा कानून में संशोधन के रूप में हुई. इसके जरिये अंग्रेजी को देश की राजभाषा के रूप में तब तक आवश्यक मान लिया गया जब तक गैर हिंदीभाषी राज्य ऐसा चाहते हों.

जाने-माने हिंदी पत्रकार राजेंद्र माथुर ने नीचे दिया लेख 26 जनवरी 1965 को, यानी अब से ठीक 51 साल पहले, हिंदी को राजभाषा बनाए जाने के तुरंत बाद, इसके हो रहे विरोध पर लिखा था. इस लेख का मूल शार्षक था - गणतंत्र (खतरे में) सप्ताह.

भारत सचमुच एक अजीब देश है. 1942 के अकाल में लाखों लोग कलकत्ता के फुटपाथों पर मर गए. इतने बड़े असंतोष की आग में ब्रिटिश साम्राज्य जलकर भस्म हो जाना चाहिए था और मुनाफाखोरी का रिवाज भी, लेकिन वह नहीं हुआ. हिंदुस्तान में आग तब लगी, जब धर्म की एक बेमतलब लड़ाई शुरू हुई. तब पंजाब और बंगाल के धर्मयुद्ध में लाखों लोगों के सिर कट गए और करोड़ों शरणार्थी बन गए.

पिछले साल-भर से देश में अन्न का संकट चल रहा है, जिससे शहरी लोग परेशान हैं, लेकिन सौभाग्य से इस मसले पर जनता ने बड़ा संयम बरता है और शास्त्री सरकार के सामने शांत और व्यवस्था की समस्या नहीं खड़ी हुई है. लेकिन 26 जनवरी को हिंदी केवल नाममात्र को राजकीय भाषा बनी और मद्रास राज्य के नगर-नगर में जुलूस, उपद्रव, आंसू गैस और बसों का जलना शुरू हो गया. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के सारे नेता जेल में हैं, लेकिन उनका आंदोलन वि्यार्थियों के जोशीले (यानी आसानी से गुमराह होने वाले) हाथों में चला गया है और मद्रास, मदुरै, कोयंबटूर और चिदंबरम में गड़बड़ शुरू हो गई है. विएतनाम के बौद्ध भिक्षुओं की तरह कुछ लोग हिंदी के विरोध में अपने बदन पर घासलेट डालकर मर रहे हैं.

और देश सोच रहा है कि इस सप्ताह हमने गणतंत्र की 15वीं वर्षगांठ मनाई या गणतंत्र की समाप्ति का अनौपचारिक जन्मदिन मनाया.

अगर सवाल यह हो कि हमें देश का टुकड़े-टुकड़े हो जाना मंजूर है या अंग्रेजी का जारी रहना मंजूर है तो जाहिर है कि हमें कौन सा हल मंजूर करना होगा. यह हल जवाहरलाल नेहरू के जीते जी हमने दो साल पहले स्वीकार कर लिया था, जब संसद ने एक कानून बनाकर कहा था कि 26 जनवरी 1965 के बाद भी अंग्रेजी राजकीय मामलों में हिंदी की सहेली बनी रहेगी.

अगर हिंदी लागू करने में जल्दबाजी की जाती है, तो एकता खतरे में पड़ती है. अगर हिंदी को रद्द किया जाता है, तो एक ही विकल्प बचता है

लेकिन लोग अक्सर असल चीज के बारे में नहीं झगड़ते, प्रतीकों के बारे में झगड़ते हैं. असल में अंग्रेजी का दर्जा वही है, जो पहले था, लेकिन प्रतीक के रूप में हिंदी का दर्जा ऊंचा हो गया है और वह राजकीय भाषा बन गई है. मद्रास में इस परिवर्तन के प्रति भी भयानक रोष है.

महारानी एलिजाबेथ को भारत की प्रतीकात्मक साम्राज्ञी मानने के लिए अगर अंग्रेज हमें मजबूर करते, तो शायद भारत में इसी किस्म का रोष पैदा होता और अगर अंग्रेज हमें लगभग पूरी आजादी दे देते, तो भी यह रोष ठंडा नहीं होता.

दिल्ली की गति इस मामले में सांप-छछूंदर जैसी हो गई है. अगर हिंदी लागू करने में जल्दबाजी की जाती है, तो एकता खतरे में पड़ती है. अगर हिंदी को रद्द किया जाता है, तो एक ही विकल्प बचता है कि एक ओर प्रादेशिक भाषाएं अपने-अपने क्षेत्रों में फलें-फूलें तथा दूसरी ओर हर ऊंचे राष्ट्रीय काम के लिए अंग्रेजी की पढ़ाई फिर से सरगर्मी से शुरू की जाए.

अंग्रेजों के जमाने में लगभग यही फार्मूला लागू होता था. तब उत्तर से दक्षिण तक यह कहा जाता था कि अंग्रेजी के कारण जनता और शासकों के बीच खाई पैदा हो गई है. अंग्रेजी सांस्कृतिक गुलामी पैदा करती है.

अंग्रेजी के माध्यम से देश अपना खोया हुआ व्यक्तित्व पुन: प्राप्त नहीं कर सकता. सौ साल की अंग्रेजी शिक्षा के बाद सिर्फ दो प्रतिशत लोग ठीक-ठाक अंग्रेजी जानते हैं. अंग्रेजी नौकरशाही ढांचे के लिए ठीक है, लेकिन प्रजातंत्र में वह किसी काम की नहीं है.

क्या इन तर्कों को ठुकराकर हमें कहना होगा कि अंग्रेजी भारत के एकीकरण की भाषा है? अंग्रेजी दुनिया के हाल जानने के लिए बना चश्मा है? अंग्रेजी से देश व्यक्तित्व प्राप्त नहीं कर सकता, तो ठीक है. देश के पास व्यक्तित्व है ही कहां? ऊजलुजूल सरकारी हिंदी लिख लेना क्या उतना ही बेमतलब नहीं है, जितना बाबू अंग्रेजी सीख लेना? अंग्रेजी सीखकर यह उम्मीद नहीं की जाती कि भारतवर्ष में शेक्सपियर पैदा हो जाएगा तो दक्षिण भारतीय भी हिंदी सीखकर क्या प्रेमचंद बन जाएंगे? जिस तरह बाबू अंग्रेजी मूलत: कारकूनों की भाषा थी वैसे बाबू हिंदी भी मूलत: कारकूनों की भाषा बनी रहेगी. हिंदी से तो दक्षिण को वह ज्ञान भी नहीं मिलेगा जो अंग्रेजी या संस्कृत से पूरे भारतवर्ष को मिला था.

अगर राजकाज किसी देवभाषा में चले, तो इससे उसे एक विचित्र-सी रहस्यवादी महत्ता प्राप्त हो जाती है जिसके सामने सब सिर झुकाना पसंद करते हैं

अंग्रेजी अगर फिर से आई, तो पांच प्रतिशत लोग (चाहे वे काबिल हों या निकम्मे हों) सिर्फ अपने अंग्रेजी ज्ञान के बूते पर ऊंचे अफसर बनेंगे, जज बनेंगे, अखिल भारतीय स्तर के बुद्धिजीवी बनेंगे. बाकी लोगों पर वे राज करेंगे, लेकिन शायद भारत में हमें इसी की आदत है. जनता की भाषा में यहां राज कभी चला ही नहीं. पहले संस्कृत थी, फिर फारसी आई और अंग्रेजी.

अगर राजकाज किसी देवभाषा में चले, तो इससे उसे एक विचित्र-सी रहस्यवादी महत्ता प्राप्त हो जाती है जिसके सामने सब सिर झुकाना पसंद करते हैं. तानाशाहों के राज में, सेनापतियों के राज में, निरंकुश राजाओं के राज में, शासन के आसपास ऐसा ही रहस्यवादी आभापुंज मंडराता रहता है, जिससे लोग डरते हैं और डर के कारण पूजा भी करते हैं.

प्रजातंत्र का एक नतीजा यह है कि सत्ता अब रहस्य, रोमांस और आतंक से भरी नहीं है, वह पहुंच के बाहर नहीं है, और जो लोग केवल डंडे को सलाम करने के आदी हैं, वे प्रजातंत्र के ढीले-ढाले माहौल में अनुशासनबद्ध रह नहीं सकते. दक्षिण के लोग जिस बात के लिए आंदोलन कर रहे हैं, वह दरअसल गिने-चुने लोगों की नौकरशाही कायम रखने का आंदोलन है. चंद्रगुप्त मौर्य और अकबर से लेकर लॉर्ड माउंटबैटन के जमाने तक नौकरशाही का भारत की एकता के लिए बड़ा योगदान रहा है.

लेकिन नौकरशाही और एकतंत्र और रहस्यवादी राज से हमने 26 जनवरी, 1950 को इनकार कर दिया. उसके बाद हमारे सामने यही चारा था कि किसी भारतीय भाषा को राजकीय भाषा का दर्जा दें. हिंदी क्योंकि तब लगभग 46 फीसदी लोगों द्वारा बोली जाती थी, इसलिए उसे यह दर्जा दिया गया. तब भी यह स्पष्ट था कि भाषा के सवाल को लेकर फूटपरस्त ताकतें उभर सकती हैं और राजनीतिज्ञ उनका फायदा उठा सकते हैं.

राजाजी (सी राजगोपालाचारी) के लिए हिंदी भी उतनी ही विदेशी भाषा है, जितनी अंग्रेजी, लेकिन उनके लिए हिंदी अंग्रेजी से भी ज्यादा विदेशी हो गई है, क्योंकि हिंदी अपने देश की है. भाषा के अस्त्र से राष्ट्रीयकरण अब सिर्फ दो परिस्थितियों में हो सकता है : या तो कोई विदेशी हमलावर उसे करे या देशी तानाशाही.

केंद्रीय सरकार का रास्ता सचमुच दुविधापूर्ण है. वह हिंदी को वापस नहीं ले सकती, क्योंकि अंग्रेजी जारी रखना कोई विकल्प नहीं है, अंग्रेजी जारी रखने से साबित होगा कि भारत एक राष्ट्र नहीं, राष्ट्रसंघ है और इस राष्ट्रसंघ के लिए हमें एक कामचलाऊ भाषा की जरूरत है. लेकिन वह हिंदी के मामले में जल्दबाजी भी नहीं कर सकती, क्योंकि उसके बाद हम राष्ट्रसंघ भी नहीं रह जाएंगे. इसलिए उसकी नीति यह है कि हिंदी का इतना आग्रह नहीं किया जाए कि विरोध खतरे के बिंदु को पार कर जाए और हिंदी का मुद्दा वापस भी नहीं लिया जाए, क्योंकि उससे भी बात नहीं बनती. उसे उम्मीद है कि विरोध करते-करते भी दक्षिण के लोग हिंदी सीखेंगे और सीख रहे हैं. भारत को एक देश मानकर अगर चला जाए तो इसके अलावा और कोई नीति अपनाना संभव नहीं है.

और संभव हो भी, तो वह प्रजातंत्र में संभव नहीं है.