एक समय की बात है. जम्बूद्वीप में सेल्फी युग का सूत्रपात हुआ. वह एक अनोखा और विचित्र युग था जिसमें हर बंदा मौक़े-बेमौक़े खुद अपनी ही फोटो उतारने को लालायित रहता था. तकनीक के विकास से सेल्फी एक संक्रामक रोग की तरह ऐसे फैली कि बंदा झाड़ू लगाए तो सेल्फी खींचे, दीया जलाए तो सेल्फी खींचे, वोट डाले तो सेल्फी खींचे, पटाखे फोड़े तो सेल्फी खींचे. उसके लिए किसी भी काम को करने का मतलब ही होता था एक अदद सेल्फी खींचना. बल्कि उसने कुछ नये काम सिर्फ सेल्फी खींचने के लिए ही ईजाद कर डाले. धीरे-धीरे ज्यादातर लोगों के लिए सेल्फी खींचना ही काम बन गया.

इस तरह सेल्फी ने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड भंग कर दिए. सेल्फी उद्योग खूब फला-फूला. लेकिन इससे हुआ यह कि उस युग में जितने काम अपेक्षित थे, उससे ज्यादा सेल्फी खिंच गईं. कामों और सेल्फियों के बीच अनुपात गड़बड़ा गया. लेकिन सेल्फी के धुरंधरों ने सेल्फी की ग्रोथ रेट को ही विकास का पैमाना मान लिया. इसी फिलॉसफी के साथ राजनीति से लेकर साहित्य और पत्रकारिता आदि में एक सेल्फीयुगीन धारा का जन्म हुआ. अलग-अलग क्षेत्रों के लोग एक के बाद एक सेल्फियां खींचकर अपने-अपने क्षेत्रों का विकास किए जा रहे थे.

उन दिनों सरकारों को आईना दिखाने का काम स्थगित था. जिन लोगों को आईना दिखाने की ड्यूटी सौंपी गई थी, वे सभी सेल्फी उतारने में बिजी थे. दो काम एक साथ संभव न थे.

सेल्फी युग में सरकारें आत्ममुग्ध थीं क्योंकि उस दौर में सरकारों से सवाल पूछने का चलन नहीं था. उस महान युग में तो परम प्रतापी संपादक, पत्रकार और अन्य बुद्धजीवी सरकार से सवाल पूछने के बजाय उनके साथ अपनी सेल्फी उतारने को ही प्राथमिकता देते थे. उन दिनों सरकारों को आईना दिखाने का काम स्थगित था. जिन लोगों को आईना दिखाने की ड्यूटी सौंपी गई थी, वे सभी सेल्फी उतारने में बिजी थे. दो काम एक साथ संभव न थे. रामराज में बाघ और बकरी के एक ही घाट पर पानी पीने की जो कहावतें सुनी थीं, वे सेल्फी युग में चरितार्थ होते देखीं. इस तरह इस कला ने उत्तरोत्तर प्रगति की. उसे सरकारी संरक्षण भी मिला. यूं भी कलाओं को राज्याश्रय मिलने का अपने यहां भरा-पूरा इतिहास रहा है. बादशाह अक़बर के दरबार के नौ रत्न इसकी मिसाल हैं.

इधर सेल्फी युग के कलमकारों ने एक और महानतम कार्य किया था. उन्होंने कलम को झाड़ू में तब्दील कर दिया. यह बड़ा क्रान्तिकारी कदम था. सब अंदर-बाहर झाड़ू लगा रहे थे. झाड़ू लगते ही कई चीजें साफ हो गईं. आत्मा की आवाज और पेशेवर नैतिकता जैसी चीजों का तिनका भी न बचा. सेल्फी युग में उन्नत तकनीक की मदद से ऐसी-ऐसी सेल्फियां खिंची कि चारणों, भाटों, दरबारियों की मक्खनमयी मुद्रायें एकदम साफ-साफ नज़र आती थीं. सेल्फी शिरोमणि बनने की चाह ने उनके बीच ऐसी प्रतिस्पर्द्धा पैदा कर दी थी कि खुद सेल्फी भी शर्म से पानी-पानी हुई जा रही थी. सेलफोन बनाने वाली कंपनियों ने अपनी मार्केटिंग के लिए फोन पर सेल्फी की सुविधा दी थी, लेकिन बंदा सेल्फी के जरिये खुद की मार्केटिंग करने लगा.

वैसे सेल्फी की उत्पत्ति कहां से हुई, इसका कोई ज्ञात इतिहास नहीं मिलता. लेकिन विद्वानों का मत है कि ‘सेल्फ’ से ‘सेल्फी’ बना और ‘सेल्फी’ ने आदमी को ‘सेल्फिश’ बना दिया. यानी वह सिर्फ अपना ही जुगाड़ देखने लगा. अपने को ही देखने लगा. अपने ही बारे में सोचने लगा. अपनी ही फोटो उतारने लगा. सेल्फी युग का एक अपना थीम सॉन्ग भी था- ‘मेरी पैंट भी सेल्फी, मेरी शर्ट भी सेल्फी....’

सेलफोन बनाने वाली कंपनियों ने अपनी मार्केटिंग के लिए फोन पर सेल्फी की सुविधा दी थी, लेकिन बंदा सेल्फी के जरिये खुद की मार्केटिंग करने लगा.

सेल्फीयुग ने इतिहास ग्रन्थों में खलबली मचा दी थी. इतिहास सीधे-सीधे दो धाराओं में विभाजित हो गया. पूर्व सेल्फीयुगीन इतिहास और उत्तर सेल्फीयुगीन इतिहास. जो लोग या जो घटनायें सेल्फी युग से पहले हुईं, उन्हें बाद में अपने होने पर बड़ा अफसोस हुआ. उन्हें इस बात का मलाल रहा कि हाय, हम सेल्फी युग में क्यों न हुए. हमारा हज़ारों साल का इतिहास इसी कॉम्पलेक्स में जी रहा है.

ऐसा होना लाजिमी भी है. अगर सेल्फी युग कुछ सदी पहले शुरू हो जाता तो हमारे इतिहास की शक्ल-सूरत ऐसी नहीं होती जैसी आज है. ताजमहल बनाने वाले कारीगर भी अगर काम करते-करते अपनी सेल्फी खींच रहे होते, तो बाद में कम से कम यह तो पता चल जाता कि बादशाह शाहजहां ने किन-किन बंदों के हाथ कटवाये. सोचो वह सेल्फी कितना बड़ा काम कर जाती. इस सबूत के साथ बादशाह के खिलाफ़ मुकदमा चल सकता था. उन बेचारे कारीगरों के आश्रितों को भी उचित मुआवजे की कानूनी लड़ाई का आधार बनता. आखिर सारी समस्याओं, सारे मसलों की दवा एक अदद सेल्फी ही तो है.