यह किताब लोकप्रिय उदाहरणों और मनोरंजक तौर-तरीकों से कॉलेज के छात्रों में लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए तैयार की गई है
फिल्म अभिनेता धनुष के ‘वाय दिस कोलावरी डी’ से यहां जाति-वर्ग के संबंध को समझाया गया है. कुछ बातें दीपिका पादुकोण, कंगना रनौट और मैरी कॉम के माध्यम से कही गई हैं तो ‘जेंडर टेस्ट’ की वजह से चर्चा में आईं पिंकी प्रमाणिक और दुती चंद की चर्चा भी यहां है. देश में प्रचलित सरकारी पाठ्यपुस्तकों में शायद ही कोई ऐसी किताब होगी जो इतने सारे लोकप्रिय और चर्चित चेहरों के जरिए शिक्षा दे रही हो लेकिन तेलंगाना में ऐसा हो गया है. लैंगिक समानता और संवेदनशीलता को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने हाल ही में एक किताब कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल की है.
‘टुवार्ड्स ए वर्ल्ड ऑफ इक्वल्स : ए बाइलिंग्वल टेक्स्टबुक ऑन जेंडर’ किताब ने हाल ही में काफी सुर्खियां बटोरी थीं. तेलंगाना अपने पाठ्यक्रम में यह किताब शामिल करके लैंगिक समानता विषय पर इस तरह की कोशिश करने वाला पहला राज्य बन गया है. इस किताब की खासबात है कि यहां विषय के हिसाब से पाठ्य सामग्री प्रचलित उबाऊ संदर्भों से अलग बिल्कुल आज के लोगों और उदाहरणों को शामिल करके लिखी गई है.
यह किताब जवाहरलाल नेहरू तकनीकी विश्वविद्यालय हैदराबाद से संबद्ध इंजीनियरिंग और फार्मेसी के 350 कॉलेजों में दूसरे सत्र में शामिल की गई है और यह पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है
हमारे समाज में गृहणियां ऐसे कई काम करती हैं जिनके जरूरी होने का एहसास पुरुषों को तब ही हो पाता है जब ये काम किसी वजह से न हो पाएं, किताब इन अदृश्य कामों को दिलचस्प अंदाज में बताती है और साथ ही लैंगिक भेद से जुड़े कई बुनियादी मुद्दों पर चर्चा करती है. यहां ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति लोगों के दुराग्रह बदलने से जुड़े पाठ भी हैं.
यह किताब जवाहरलाल नेहरू तकनीकी विश्वविद्यालय हैदराबाद से संबद्ध इंजीनियरिंग और फार्मेसी के 350 कॉलेजों में दूसरे सत्र में शामिल की गई है और यह पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है. मानविकी, प्रबंधन और अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसरों को यह विषय पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई है. पिछले दिनों उनके लिए दो दिन का प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाया गया था.
लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ाने की पहल के रूप में इस किताब का हर वर्ग ने स्वागत किया है. हालांकि छात्रों का एक तबका सवाल उठा रहा है कि परीक्षा में इस किताब के क्रेडिट (क्लास में उपस्थिति के अंक) जोड़ना ठीक नहीं है. इंजीनियरिंग के एक छात्र निखिल जॉर्ज कहते हैं, ‘यह अच्छी पहल है लेकिन मुझे लगता है इसके साथ अनिवार्य रूप से क्रेडिट असाइन करना ठीक नहीं है. इस विषय की मैंने बहुत कम क्लास अटैंड की हैं.’
नए नियम के अनुसार किसी भी छात्र को इस विषय में उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम 40 फीसदी अंक लाना होगा. संबंधित शिक्षक क्रेडिट की व्यवस्था को सही मानते हैं. उनके मुताबिक कक्षा में छात्रों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए फिलहाल इसका कोई विकल्प नहीं हैं.
घरों में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले काम के महत्व को यह किताब दिलचस्प अंदाज में बताती है और साथ ही यहां ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति लोगों के दुराग्रह बदलने से जुड़े पाठ भी हैं
क्या तेलंगाना का शिक्षातंत्र बदलाव के लिए तैयार है?
टुवार्ड्स ए वर्ल्ड ऑफ इक्वल्स
टुवार्ड्स ए वर्ल्ड ऑफ इक्वल्स
कुछ छात्र यह सवाल भी उठाते हैं कि इस समय उनके कैंपस समानता और अधिकारों से जुड़े अभियानों के लिए तैयार नहीं हैं. किताब में एक चैप्टर है जो बताता है कि कैसे महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध में उनकी वेशभूषा की कोई भूमिका नहीं होती. छात्रों का कहना है कि यह सीख तभी पूरी तरह कारगर हो सकती है जब कैंपस प्रशासन खुद अपने कुछ बेसिर-पैर के नियमों में बदलाव करे. दरअसल तेलंगाना के कई कॉलेजों ने छात्र-छात्राओं के ड्रेस कोड (सिर्फ शालीन कपड़े ही पहने जा सकते हैं) के नियम बनाए हैं.
इसके अलावा देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां भी एक अलिखित नियम चलता है कि लड़के-लड़कियां आपस में ज्यादा घुलमिल नहीं सकते. उनके लिए अलग कैंटीन हैं और अलग बसें हैं. इन नियमों के हिमायती लोगों का कहना है कि ये नियम सिर्फ कैंपस तक सीमित हैं और बाहर छात्र-छात्राओं पर कोई पाबंदी नहीं है. हालांकि वे यह भूल जाते हैं कि इन्हीं नियमों के माध्यम से वे कहीं न कहीं छात्रों को यह भी सिखा रहे हैं कि ‘अशालीन या भद्दे’ कपड़े क्या होते हैं.
पद्मजा मित्याला सेंट पीटर्स इंजीनियरिंग कॉलेज की छात्रा हैं. वे इन नियमों का विरोध करते हुए कहती हैं, ‘हमारी कक्षा के कई लड़के-लड़की ऐसे हैं जिन्होंने 11-12वीं पढ़ते हुए कभी विपरीत लिंग के विद्यार्थी से बात नहीं की. यदि कक्षा के दौरान उन्हें आपस में बात करने दी जाए वे खुलकर और पूरे आत्मविश्वास के साथ खुद को अभिव्यक्त कर पाएंगे’
‘कॉलेज का प्रशासन महिला और पुरुष के अलावा कुछ नहीं देखता. अब यदि वह चाहता है कि विद्यार्थियों में लैंगिक संवेदनशीलता आए तो क्या उसे पहले खुद को नहीं बदलना चाहिए?’
छात्रों के अलावा दूसरे वर्गों के लोगों को भी लगता है कि इन मुद्दों पर सबसे पहले शिक्षकों और प्रशासन को संवेदनशील होने की जरूरत है. ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रही विजयंती वासंता मोग्ली कहती हैं, ‘किताब भविष्य के लिए बस एक छोटी सी शुरुआत है लेकिन यह सिर्फ किताब ही है. जब तक ट्रांसजेंडरों के अधिकारों को सुनिश्चित करने वाले पुख्ता कानून नहीं बनते तब तक हम जैसे लोगों के लिए जमीनी स्तर पर बदलाव कैसे आ पाएगा?’ इस बात का समर्थन करते हुए एक प्रोफेसर कहते हैं, ‘कॉलेज का प्रशासन महिला और पुरुष के अलावा कुछ नहीं देखता. अब यदि वह चाहता है कि विद्यार्थियों में लैंगिक संवेदनशीलता आए तो क्या उसे पहले खुद को नहीं बदलना चाहिए?’
किताब की विषय-वस्तु तैयार करने वाला संपादक मंडल इस तरह के सवालों और आशंकाओं से अनजान नहीं है. किताब की संयुक्त संपादक सुसाई थारू बताती हैं, ‘जब हमसे किताब तैयार करने के बारे में कहा गया तो हमारा ध्यान इसबात पर था कि बिना किसी विवाद के विषयवस्तु में मुख्य मुद्दों को शामिल किया जाए और ऐसी किताब तैयार की जाए जिसे पढ़ने लिए आपको पहले से कोई विशेष तैयारी करने की जरूरत न हो. हम इसके लिए इंतजार नहीं कर सकते कि स्टाफ को बहुत अच्छा प्रशिक्षण दिया जाए क्योंकि इसमें लंबा समय लगेगा. यह पढ़ाई के साथ-साथ हो सकता है. हमें उम्मीद है कि एक या दो साल में पाठ्यक्रम का शिक्षण-प्रशिक्षण और पुख्ता हो जाएगा और इसे दूसरे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लागू किया जा सकता है.’
हैदराबाद की फॉरेन लैंग्वेजेस यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफेसर रह चुकीं थारू लेखक होने के साथ-साथ महिला अधिकार कार्यकर्ता भी हैं. उनकी टीम इस किताब को और बेहतर से बेहतर बनाना चाहती है और इसके लिए किताब की एक वेबसाइट है जहां कोई भी विषय-वस्तु पर सुझाव दे सकता है या अपने अनुभव बता सकता है. थारू के मुताबिक किताब का लक्ष्य लोगों को संवेदनशील बनाना है न कि लैंगिक अध्ययन का विशेषज्ञ.
(यह हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन पर प्रकाशित आलेख का संपादित स्वरूप है)