जलवायु परिवर्तन के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े कई खतरे सामने आए हैं. लेकिन इस बात पर लोगों का ध्यान नहीं है कि हमारी संस्कृति भी इसका बदलाव का शिकार बन सकती है. यह कैसे मुमकिन है? यह पूरी तरह मुमकिन है यदि आप इस तथ्य को मान लें कि भोजन किसी संस्कृति का एक अहम हिस्सा होता है. यह कई समाजों में रीति-रिवाजों को भी तय करता है और ऐसे में यदि किसी भौगोलिक क्षेत्र के मूल खाद्य पदार्थ संकट में पड़ते हैं तो वहां संस्कृति भी जरूर प्रभावित होगी. फिलहाल असम में यही हो रहा है.

बीते कुछ दशकों के दौरान असम के स्थानीय भोज्य पदार्थों, कई किस्म की साग और चावल की स्थानीय किस्में जलवायु परिवर्तन की भेंट चढ़ चुकी हैं. राज्य की संस्कृति पर भले ही इसका तुरंत कुछ असर दिखाई न दे लेकिन कुछ सालों बाद यह साफ हो जाएगा कि इसे खास बनाने वाला इसका मूल भोजन ही अब इसका हिस्सा नहीं है.

असम में कुछ विशेष पत्तेदार सब्जियां (शाक) मूल आबादी के भोजन का अभिन्न हिस्सा रही हैं. तेजपुर विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर कुशल बरुआ बताते हैं कि अनियमित बारिश और तापमान में बढ़ोतरी के चलते ये तेजी से खत्म हो रही हैं. बरुआ कहते हैं, ‘एक समय था जब कोसू (एक प्रकार की साग) पूरे असम में मिलती थी. अब इसकी कई प्रजातियां गायब हो चुकी हैं, जो बची हैं वे भी विलुप्ति की कगार पर हैं. ऐसे ही यहां पर ढेकिया शाक होती थी. असमिया खानपान का ये बड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा थी. इसकी भी ढेरों किस्में विलुप्त हो चुकी हैं या होने वाली हैं. मछली पकाने के दौरान उपयोग आने वाली लाई शाक की भी यही कहानी है.’

असर साफ-साफ देखा जा सकता है

जलवायु परिवर्तन का एक सीधा असर औसत तापमान में बढोतरी के रूप में देखा जाता है. इसकी वजह से फल-सब्जियों के फलने-फूलने पर बुरा असर पड़ता है. कुछ की गुणवत्ता खराब होने लगती है तो ज्यादा संवेदनशील किस्में विलुप्त हो जाती है. इससे फसलें भी प्रभावित हो रही हैं. बरुआ बताते हैं, ‘जोहा असमिया चावल की एक मूल किस्म है और काफी लोकप्रिय है. बीते सालों में इसकी गुणवत्ता में काफी गिरावट आई है. एक समय यहां स्थानीय फल जैसे पोनियाल जहां-तहां मिल जाते थे लेकिन आज ये दुर्लभ हो चले हैं. यहां तक कि मौसमी सब्जियों में अब पहले वाला स्वाद नहीं रह गया.’

जलवायु परिवर्तन का असर फल, अनाज और साग-सब्जियों की किस्में विलुप्त होने तक सीमित नहीं है. इसकी वजह से खरपतवार तेजी से बढ़ रहे हैं. जैसे गाजर घास अब खूब फैल रही है. इसने दूसरी वनस्पतियों की जगह लेनी शुरू कर दी है. जोरहाट स्थित असम कृषि विश्वविद्यालय (एएयू) के वैज्ञानिक ईश्वर बरुआ कहते हैं, ‘गाजरघास विदेशी खरपतवार है जो स्थानीय वनस्पतियों के लिए खतरा बन रही है. जहां-जहां इसका फैलाव हुआ है वहां कोला, कोसू, ढेकिया शाक और मैमुनि जैसी साग गायब हो गई हैं.’

गाजर घास स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालती है. इससे सांस की बीमारी या एलर्जी हो सकती है. ईश्वर बताते हैं, ‘इसे पहचानना मुश्किल नहीं है. यह सड़कों के किनारे आपको मिल सकती है. गुवाहाटी, जोरहाट, गोलाघाट, कार्बी आंग्लॉन्ग और राज्य के कई इलाकों में यह खतरा बन गई है. हम अपनी तरफ से लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि वे इस जहां भी इसे देखें, नष्ट कर दें क्योंकि यह उनकी फसलों को भी उगने नहीं देती और स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक तो है ही.’

विदेशी खरपतवारों में डिकेंथियम (वैज्ञानिक नाम) ने भी असम की फसलों पर बुरा असर डाला है. इसके असर से चाय बागान भी अछूते नहीं हैं और जो राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार हैं. एएयू के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक जयंता डेका बताते हैं, ‘डिकेंथियम पर खरपतवार नाशकों का भी असर नहीं होता और बागान मालिक इसकी वजह से चिंतित हैं.’

डिकेंथियम एक आक्रामक खरपतवार है. यह दूसरे खरपतवारों नष्ट करके उनकी जगह ले लेता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह चाय बागान में पाए जाने वाले तकरीबन 165 प्रकार के खरपतवारों की जगह ले सकता है. डिंकेथियम मूल रूप से कैरेबियन द्वीपसमूह पर पाया जाता है और प्रवासी पक्षियों के जरिए भारत तक फैला है. यह सबसे पहले मिजोरम में पाया गया था और पिछले साल असम के हैलाकांडी जिले में इसकी उपस्थिति पाई गई थी. अब यह तेजी से दूसरे स्थानों पर फैल रहा है.

मूल आबादी के भोजन में बदलाव आने शुरू हो गए हैं

असम की मूल आबादी का मुख्य भोजन चावल है और जलवायु परिवर्तन से चावल की स्थानीय किस्मों पर भी बुरा असर पड़ा है. एक सामाजिक कार्यकर्ता तपन वैश्य बताते हैं कि अनियमित बारिश और लगातार आनेवाली बाढ़ ने जनजाति समुदाय के लोगों को अपनी खानापान की आदतें बदलने के लिए मजबूर कर दिया है. तपन नलबाड़ी जिले में किसानों के बीच काम कर रहे एनजीओ लोटस प्रोग्रेसिव सेंटर जुड़े हैं. वे बताते हैं, ‘मॉनसून के दौरान आमतौर पर लोग खली धान के चावल को खाते थे लेकिन हरबार बाढ़ की वजह से फसलें तबाह होने लगीं तो किसानों ने धान की ऐसी फसलें लगानी शुरू कर दीं जो बाढ़ में खराब नहीं होती थीं. अब खली धान की जगह अहु और बाओ धान ने ले ली है.’

बाओ धान का तना लंबा और जड़ें मजबूत होती हैं इसलिए इसके बाढ़ में खत्म होने का खतरा कम होता है. लेकिन यह भी दिलचस्प है कि जिस धान को असम के किसान बाओ धान के नाम से लगा रहे हैं वह बाओ धान की असली किस्म नहीं हैं. ईश्वर बरुआ जानकारी देते हैं, ‘यह असम की बाओ धान नहीं है. तराई वाले असम में नलबाड़ी और मोरीगांव जैसी जगहों पर कुछ लोग बाओ धान उगा रहे हैं लेकिन वह मूल किस्म नहीं है. असली किस्म शिवसागर से लेकर धीमाजी तक उगाई जाती थी जो अब विलुप्त हो चुकी है. पहले इसका रकबा 4,00,000 हेक्टेयर हुआ करता था लेकिन अब यह 70,000 हेक्टेयर तक घट गया है.’

असम के बीच से होकर ब्रह्मपुत्र नदी बहती है. यहां मॉनसून के समय बाढ़ नई बात नहीं है लेकिन जलवायु परिवर्तन के चलते तापमान में बढ़ोतरी से यहां हालात और बिगड़ गए हैं. असम के टोकलाई स्थित चाय अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक आरएन भगत द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़े बताते हैं कि पिछले सौ साल में यहां औसत तापमान तकरीबन डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है और सालाना बारिश में तकरीबन 22 सेंटीमीटर की कमी आई है.