तेजाब हमले की शिकार लक्ष्मी को सूरत की एक कंपनी ने अपना मॉडल बनाया है. ऐसे पीड़ितों को लेकर समाज का जो रवैय्या होता है उसे देखते हुए इस पहल के मायने काफी बड़े हैं.
हाल ही में सूरत के एक जाने माने फैशन ब्रांड ‘वीवा एन डीवा‘ ने तेजाब हमले की पीड़ित लक्ष्मी को अपना मॉडल बनाया है. 26 साल की लक्ष्मी को कंपनी ने अपने नए परिधानों की रेंज के लिए  ‘फेस ऑफ वीवा एन डीवा‘ बनाया. यह कदम इसलिए उठाया गया है कि तेजाब हमले में अपनी शारीरिक सुंदरता खो चुकी लड़कियों के प्रति जागरूकता बढ़े. भारत के इतिहास में यह पहला मौका है जब एक विकृत बना दिये गए चेहरे को सुंदरता और फैशन का चेहरा बनाया गया.
तेजाब का हमला सिर्फ लड़की के चेहरे को ही नहीं जलाता, बल्कि इसमें उसका पूरा व्यक्तित्व ही झुलस जाता है. यह एक ऐसा जख्म है जो जिंदगीभर हरा रहता है. हमारे यहां आज भी लड़कियों की सामाजिक स्वीकृति के लिए प्राथमिक शर्त सुंदरता और शुचिता यानी इज्जत ही है और इसलिए ऐसा हमला उसे जीते जी मार डालता है. इस लिहाज से यह इस पहल के मायने काफी बड़े हैं.
दुनिया में महिलाओं पर तेजाब से हमलों के सालाना 1500 मामले सामने आते हैं. इस मामले में 1000 हजार के आंकड़े के साथ भारत सब देशों से आगे है.
लड़कियों पर तेजाब से हमले की घटनाएं पूरी दुनिया में बढ़ी हैं. ऐसे हमलों के सालाना 1500 मामले सामने आते हैं. भारत में तेज़ाब फेंकने का पहला मामला 1967 में प्रकाश में आया था. आज इस मामले में भारत पूरी दुनिया में सबसे ऊपर है. हमारे देश में सालाना औसतन 1000 लड़कियां तेजाब हमलों की शिकार होती हैं.
कारण
यह मुद्दा भी असल में स्त्रियों के प्रति पुरुषों की सामंती सोच से जुड़ा हुआ है. कई कारण मिलकर पुरुषों को इस क्रूरता के लिए उकसाते हैं. एक, समाज में पुरुष के अहम (ईगो) को बहुत ज्यादा महत्व दिया गया है. पुरुष अक्सर ही यह बर्दाश्त नहीं कर पाते कि उनकी बातों को टाला या उन्हें मानने से इनकार किया जा रहा है. खासतौर से जब कोई लड़की या स्त्री किसी पुरुष की बात या इच्छा को मानने से इंकार करती है तो पुरुष अहम को गहरी ठेस पहुंचती है. अक्सर यही ठेस तेज़ाब फेंकने का अहम कारण बनती है. लड़की द्वारा लड़के के विवाह या प्रेम प्रस्ताव को ठुकराना एक प्रमुख वजह के रूप में सामने आता है.
पुरुषों का मानस इस बात के लिए तैयार नहीं होता कि वे लड़की का निर्णय मानें. यदि मानें न भी तो कम से कम उसके निर्णय को शांति से सुनें और उसका सम्मान करे.
दूसरा, समाज में आज भी लड़कियों के फैसलों को महत्व देने का चलन नहीं है. लड़कों को जन्म से सिखाया जाता है कि निर्णय उन्हें लेने हैं. दूसरी तरफ लड़कियों को सिखाया जाता है कि उन्हें पुरुषों के लिये गये फैसले मानने हैं. ऐसे में पुरुषों का मानस इस बात के लिए तैयार नहीं होता कि वे लड़की का निर्णय मानें. यदि मानें न भी तो कम से कम उसके निर्णय को शांति से सुनें और उसका सम्मान करे. लड़कियों के निर्णय अक्सर ही लड़कों को विचलित या अशांत बनाते हैं और गुस्सा दिलाते हैं. यह पुरुषों की शान के खिलाफ है कि कोई लड़की या स्त्री निर्णय करे और वे उसके फैसले को मानने के लिए बाध्य हों.
ऐसे पुरुष लड़कियों को बताना चाहते हैं कि उनके फैसले से इंकार करने की कीमत न सिर्फ एक बार, बल्कि सारी जिंदगी चुकानी पड़ती है. लड़की का चेहरा जलाकर ऐसे लोग सारे समाज को लड़की के बहिष्कार के लिए अपने साथ खड़ा कर लेते हैं. क्योंकि समाज तेजाब पीडि़त लड़कियों का न तो साथ देता है और न खुद उस लड़की का साथ चाहता है.
तीसरा, समाज में स्त्री को भोग्या समझने वाली सोच भी ऐसे हमलों के लिए जिम्मेदार है. अपनी बात न मनवा पाने की स्थिति में पुरुषों को लगता है कि ‘यदि यह चीज मेरी नहीं हो सकी, तो मैं इसे किसी दूसरे की भी नहीं होने दूंगा.‘ समाज का बड़ा हिस्सा आज भी ऐसा सोचने को तैयार नहीं है, कि स्त्री भी पुरुष की तरह हाड-मांस की एक इंसान है जिसके भीतर भावनाएं और संवेदनाएं हैं. अधिकतर पुरुष आज भी स्त्री को अपनी जायदाद समझते हैं.
आज भी लड़कियों की सामाजिक स्वीकृति के लिए प्राथमिक शर्त सुंदरता और शुचिता यानी इज्जत ही है. यह सुंदरता और इज्जत भी तेजाबी हमले और बलात्कार जैसी कू्ररताओं के लिए जिम्मेदार है.
चौथा, जैसा कि पहले भी जिक्र हुआ, हमारे समाज में आज भी लड़कियों की सामाजिक स्वीकृति के लिए प्राथमिक शर्त सुंदरता और शुचिता यानी इज्जत ही है. यह सुंदरता और इज्जत भी तेजाबी हमले और बलात्कार जैसी क्रूरताओं के लिए जिम्मेदार है. जब व्यक्ति किसी से प्रतिशोध लेना चाहता है तो अपने विरोधी को ऐसी स्थिति में छोड़ना चाहता है जहां वह समाज में जीने के लायक न बचे. तेजाब के हमले का नतीजा ऐसा ही होता है. समाज बदसूरत और तथाकथित ‘इज्जत लुटी‘ स्त्री के साथ प्रेम और संवेदना से नहीं बल्कि दुश्मन की ही तरह पेश आता है. इस तरह से प्रतिशोध लेने वाला अपने मकसद में बहुत कम मेहनत करके सफल हो जाता है. एक पुरुष के लिए किसी दूसरे पुरुष की बजाय किसी स्त्री को सामाजिक रूप से बहिष्कृत करना कहीं ज्यादा आसान और मजेदार है.
सिर्फ कानून से काम नहीं चलेगा
बलात्कार निरोधी कानून में जो नया संशोधन आया है उसमें तेजाब फेंकने वालों के लिए 10 साल की सजा का प्रावधान किया गया है. कानून बेहतर है, बशर्त है कि सजा हो ही जाए. लेकिन कानूनी सजा से परे भी कई काम हैं जो समाज, परिवार और संस्थाएं तेजाब पीडि़तों के लिए अपने स्तर पर कर सकते हैं. परिवार के स्तर पर सबसे पहला और बुनियादी काम लड़कियों को यह हौसला देना है कि सुंदर चेहरे और देह से परे भी एक दुनिया है जो सपनों से भरी है. साथ ही लड़कों को बचपन से सिखाया जाए कि वे लड़कियों के निर्णयों का सम्मान करें ताकि बड़े होकर अचानक से किसी लड़की का इंकार उनके लिए सहज-सामान्य हो, न कि उग्रता का कारण.
मुफ्त अच्छी चिकित्सा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए सरकारी सहायता ऐसी लड़कियों को जीने का हौसला देने में बहुत मदद कर सकती है.
मुफ्त अच्छी चिकित्सा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए सरकारी सहायता ऐसी लड़कियों को जीने का हौसला देने में बहुत मदद कर सकती है. निजी क्षेत्र की कंपनी वीवा एन डीवा द्वारा तेजाब पीडि़ता को अपने प्रोडक्ट के प्रमोशन के लिए मॉडल बनाना बेहद नई, सराहनीय, चुनौतीपूर्ण और साहसी पहल है. कंपनी के निदेशक मनन शाह ने लक्ष्मी की कहानी अखबारों में पढ़ी थी. उनके मुताबिक लक्ष्मी के जीवट से वे काफी प्रभावित हुए. उन्हें लगा कि लक्ष्मी को अपनी कंपनी के लिए मॉडल बनाकर वे तेजाब हमले के पीड़ितों के प्रति सामाजिक दुर्भावना खत्म करने की कोशिश कर सकते हैं. एक अखबार से बात करते हुए उनका कहना था, 'मैं लोगों को दिखाना चाहता था कि सुंदरता सिर्फ चेहरे से नहीं बल्कि इस बात से भी तय होती है कि आप भीतर से क्या हैं. लक्ष्मी के जरिये मैं तेजाब हमले की पीड़ित दूसरी लड़कियों को भी आत्मविश्वास देना चाहता था कि वे भी काम कर सकती हैं और सामान्य जिंदगी जी सकती हैं.'
साफ है कि उनका यह प्रयास न सिर्फ तेजाब हमले की शिकार हुई लड़कियों के प्रति जागरूकता बढ़ाते हुए फैशन की दुनिया में स्त्री सौंदर्य की बिल्कुल नई इबारत लिखता है, बल्कि तेजाब हमले की पीड़िताओं को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने की चुनौती को स्वीकार करके समाज को नई राह भी दिखाता है. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि ऐसी तमाम पीड़ित लड़कियों के बारे में अक्सर ही परिवार और समाज की सोच होती है कि ‘इससे बेहतर तो मर ही जातीं.‘ पर उन्हें जीना चाहिए. हर जगह उपस्थित होना चाहिए ताकि उनका विकृत चेहरा हमें दहला सके. ताकि वे हमारे सुंदर, सभ्य और आकर्षक चेहरों के भीतर छिपी क्रूर सोच पर थूक सकें. मां-बाप को लड़कियों के साथ खड़े होना चाहिए और उन्हें समझाना चाहिए कि......
लड़कियों! वे सिर्फ तुम्हारा चेहरा जला सकते हैं तुम्हारे सपनों और हौसलों को नहीं! तुम्हें जिंदा रहना चाहिए बल्कि हर जगह उपस्थित होना चाहिए मेले में, हाट में, बाजार में नौकरी में, व्यवसाय में, मंच पर दुनियाभर के कारोबारों में. तुम्हें जिंदा रहना चाहिए ताकि तुम राक्षसी मन के, सुंदर दिखने वाले चेहरों पर थूक सको! बार-बार थूक सको! तुम्हें जिंदा रहना चाहिए ताकि तुम आने वाली नस्लों को बता सको एक आर्कषक चेहरे और विकृत मन से कहीं ज्यादा सुंदर होता है एक विकृत चेहरा और सुंदर मन!