मोदी राज में पिछले 20 महीनों में एक के बाद एक लगातार कई ऐसे फैसले हुए जिनसे भारतीय रेलवे की ‘कल्याणकारी संस्था’ की छवि सर के बल खड़ी नजर आ रही है
जब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने कई मौकों पर यह कहा कि भारतीय रेल देश के लोगों की जीवन रेखा है, इसलिए देश के विकास के लिए जो मॉडल उनके दिमाग में है, उसमें रेलवे का बेहद अहम स्थान है. सरकार बनने के बाद से लगातार कहा गया कि प्रधानमंत्री रेलवे में खुद दिलचस्पी ले रहे हैं.
मोदी सरकार के पहले रेल मंत्री थे कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे डीवी सदानंद गौड़ा. लेकिन अपने पहले ही मंत्रिमंडल विस्तार में नरेंद्र मोदी ने उन्हें बदल दिया. उस वक्त बताया गया था कि मोदी गौड़ा के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं. इसके बाद उन्होंने रेल मंत्री बनाया सुरेश प्रभु को.
जिस ढंग से प्रभु को रेल मंत्रालय में लाया गया, उससे भी लगा कि नरेंद्र मोदी रेलवे को लेकर बेहद गंभीर हैं. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सुरेश प्रभु शिव सेना के कोटे से बिजली मंत्री थे जिन्हें बाद में शिवसेना ने भाजपा के न चाहने के बावजूद हटा दिया था. मोदी सरकार में भी मंत्री बनाने के लिए शिव सेना उनका नाम नहीं दे रही थी. लेकिन प्रधानमंत्री उन्हें हर हाल में अपनी टीम में लाना चाह रहे थे. प्रभु को रेल मंत्री बनाने के लिए उन्हें आनन-फानन में भाजपा की सदस्यता दिलायी गई और शिव सेना के नाराज होने के बावजूद उन्हें रेलवे का कार्यभार सौंप दिया गया.
आम लोगों के लिए साल भर के अंदर यात्री किराये में यह दूसरी बढ़ोतरी थी. लेकिन उस वक्त भी लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि मोदी राज में रेलवे उन्हें ऐसे झटके लगातार देते ही रहने वाली है
सियासत और ब्यूरोक्रेसी के लोगों से बातचीत करने पर पता चलता है कि जिन उम्मीदों के साथ प्रभु को नरेंद्र मोदी लाये थे, उन उम्मीदों पर वे खरे नहीं उतरे हैं. कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि अगले मंत्रिमंडल विस्तार में प्रभु को रेलवे से हटाया भी जा सकता है. वहीं दूसरी तरफ ऐसी बातें भी सुनने में आ रही हैं कि जापान से बुलेट ट्रेन के लिए हुए समझौते ने सुरेश प्रभु को बचा लिया है और आगे भी वही रेल मंत्री बने रहेंगे.
इन सबके बीच मोदी राज में रेलवे ने एक के बाद एक लगातार ऐसे तमाम फैसले किए जिससे रेलवे की ‘कल्याणकारी संस्था’ की छवि बदलती हुई नजर आ रही है. जिस तरह से रेलवे में किराया बढ़ाने से लेकर टिकट रद्द कराने और फिर न्यूनतम किराया बढ़ाने और बच्चों का भी पूरा किराया वसूलने जैसे निर्णय हुए हैं, उनसे बहुत लोगों के लिए नरेंद्र मोदी की इस बात पर विश्वास करना मुश्किल हो गया है कि उनकी सरकार गरीबों के लिए है.
अगर शुरू से शुरू करें तो सरकार में आने के महीने भर के भीतर ही रेलवे ने यात्री किराये में 14.2 फीसदी और माल भाड़े में 6.5 फीसदी कर दी थी. उस वक्त रेल मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा थे. इस निर्णय से लोगों पर दोहरी मार पड़ी. एक तरफ तो उन्हें रेल यात्राओं के लिए सीधे-सीधे अधिक पैसा देना पड़ा. वहीं दूसरी तरफ माला भाड़ा बढ़ने से आम लोगों की रोजमर्रा की चीजें भी महंगी हुईं. जब सरकार के इस फैसले पर हो-हल्ला मचा तो यह तर्क दिया गया कि इस आशय का निर्णय तो पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने ही लिया था, मोदी सरकार तो सिर्फ उसे लागू कर रही है.
नवंबर में ही रेलवे ने टिकट रद्द कराने के नियमों में भी ऐसे बदलाव किये कि हर क्लास का टिकट रद्द कराने का प्रभार अब दुगना हो गया है
जाहिर है, यह तर्क किसी के गले उतरना नहीं था. आम लोगों के लिए साल भर के अंदर यात्री किराये में यह दूसरी बढ़ोतरी थी. लेकिन उस वक्त भी लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि मोदी राज में रेलवे उन्हें ऐसे झटके लगातार देते ही रहने वाली है. 2015-16 के बजट में सेवा कर 12.36 फीसदी से बढ़ाकर 14 फीसदी करने और फिर बाद में इस पर 0.5 फीसदी सेस यानी उपकर लगाने से भी रेलवे के एसी दर्जों का किराया 4.35 फीसदी तक बढ़ गया. सेस वाली बढ़ोत्तरी दीपावली से ठीक पहले और बिहार के मतदान के ठीक बाद पिछले साल नवंबर में हुई थी.
नवंबर में ही रेलवे ने टिकट रद्द कराने के नियमों में भी ऐसे बदलाव किये कि हर क्लास का टिकट रद्द कराने का प्रभार अब दुगना हो गया है. उदाहरण के तौर पर स्लीपर क्लास का कन्फर्म टिकट रद्द कराने पर अब 60 की जगह 120 रुपये कटते हैं. थर्ड एसी के टिकट के लिए कटने वाली रकम अब 90 की जगह 180 रुपये हो गई है और सेकंड एसी के लिए 100 की जगह 200 रुपये. बदलाव के बाद अब फर्स्ट एसी का टिकट रद्द कराने पर 120 की जगह 240 रुपये कटते हैं.
नवंबर से पहले यह सुविधा थी कि ट्रेन छूटने के दो घंटे बाद तक भी टिकट रद्द कराया जा सकता था. इसमें आधे पैसे कट जाते थे. इसका इस्तेमाल खास तौर पर वे लोग करते थे जिनकी गाड़ी दिल्ली के ट्रैफिक में फंसने जैसी वजहों से छूट जाती थी. लेकिन अब इस सुविधा को भी नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार के सुरेश प्रभु की अगुवाई वाले मंत्रालय ने खत्म कर दिया है. अब गाड़ी खुलने के दो घंटे बाद की बात तो छोड़ ही दें, गाड़ी खुलने के चार घंटे पहले से ही टिकट रद्द होना बंद हो जाता है. मतलब अगर चार घंटे पहले तक टिकट कैंसिल नहीं कराया तो रेलवे आपको आपकी टिकट का एक रुपया भी वापस नहीं देने वाली.
अब गाड़ी खुलने के दो घंटे बाद की बात तो छोड़ ही दें, गाड़ी खुलने के चार घंटे पहले से ही टिकट रद्द होना बंद हो जाता है
वेटिंग टिकट वापसी के नियमों को लेकर अभी थोड़ी भ्रम की स्थिति है. इंटरनेट से बुक कराए जाने वाले वेटिंग टिकट कन्फर्म नहीं होने पर उनके पैसे वापस आ जाते हैं लेकिन इसमें भी अच्छा-खासा पैसा कट जाता है. कुछ समय पहले राजेश कुमार ने गया से नई दिल्ली की राजधानी एक्सप्रेस के दो टिकट बुक कराये थे. थर्ड एसी के इन टिकटों को राजेश ने 3177 रुपये में बुक कराया था. उनका टिकट कंफर्म नहीं हुआ इसलिए वे दिल्ली नहीं जा सके. लेकिन उन्हें वापस मिले सिर्फ 2,990 रुपये. इसका मतलब यह हुआ कि उनके वेटिंग टिकट पर 187 रुपये रेलवे ने रख लिए थे.
काउंटर पर बुक कराये वेटिंग टिकटों पर तो अभी भी खासी भ्रम की स्थिति बनी हुई है. पिछले दिनों फेसबुक पर एक महिला द्वारा अपना टिकट पोस्ट करके कहना था कि जब उनका टिकट कन्फर्म नहीं हुआ तो वे इसे वापस करने काउंटर पर गईं. तब ट्रेन छूटने में 17 मिनट बचे थे. लेकिन काउंटर पर बैठे रेल कर्मचारी ने उन्हें कहा कि वे 13 मिनट देरी से आई हैं लिहाजा उनका टिकट कैंसिल नहीं हो सकता.
इसके कुछ ही दिनों बाद रेलवे ने यह निर्णय लिया कि 5 से 12 साल के उन बच्चों से 1 अप्रैल, 2016 से पूरा किराया वसूला जाएगा जिनके लिए बर्थ बुक करायी जाती है. पहले इसके लिए आधा किराया देना होता था. अब इस आयु वर्ग के जिन बच्चों के लिए बर्थ बुक नहीं कराया जाएगा, उनके लिए आधा किराया चुकाना होगा.
इसी कड़ी में रेलवे ने तत्काल शुल्क बढ़ाने का फैसला भी कर लिया. पहले जहां स्लीपर के लिए यह शुल्क 90 से 175 रुपये था, वहीं अब इसे 100 से 200 रुपये कर दिया गया है
इसी कड़ी में रेलवे ने तत्काल शुल्क बढ़ाने का फैसला भी कर लिया. पहले जहां स्लीपर के लिए यह शुल्क 90 से 175 रुपये था, वहीं अब इसे 100 से 200 रुपये कर दिया गया है. एसी-3 के लिए यह दायरा 250 से 350 रुपये का था जिसे बढ़ाकर 300 से 400 रुपये का कर दिया गया. इसी तरह से एसी-2 और एसी-1 के तत्काल शुल्कों को भी बढ़ा दिया गया है.
यहीं पर तत्काल से जुड़ी एक और बात का जिक्र जरूरी है. मोदी राज में ही रेलवे ने प्रीमियम तत्काल सेवा भी शुरू की है. इसमें रेल का किराया कुछ उसी अंदाज में बढ़ता है जैसे हवाई जहाज का किराया. इसे डायनेमिक फेयर कहा जाता है. इसके तहत जैसे-जैसे यात्रा का वक्त नजदीक आता है, वैसे-वैसे किराया बढ़ता जाता है. इस कोटे के लिए ट्रेनों में अलग से बोगियां नहीं लगाई गईं, बल्कि पहले से जो बर्थ उपलब्ध थे, उनमें से ही कुछ को इस कोटे में डाल दिया गया.
डायनेमिक फेयर मॉडल का नतीजा यह है कि इस कोटे की टिकटों की कीमत कई बार हवाई जहाज के टिकट से अधिक हो जाती है. लेकिन मजबूरी में लोग इतना अधिक पैसा देकर भी यात्रा करने को विवश हैं. इसके अलावा इस तरह के तत्काल कोटे ने पहले के मुकाबले जनरल कोटे की कुछ सीटों को भी कम किया ही होगा. इसमें दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आम लोगों की मजबूरी का शोषण करने वाला कोई और नहीं बल्कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई एक लोकतांत्रिक सरकार की ही एक संस्था है.
सुविधा ट्रेनों से जुड़ा एक नियम यह भी है कि इनकी कुल उपलब्ध टिकटों में से हर 20 फीसदी की बुकिंग के बाद इनका किराया बढ़ जाता है. यह किराया बढ़ता हुआ तत्काल किराये का तीन गुना तक हो जाता है
मोदी राज में ही रेलवे ने पहले प्लेटफार्म टिकट के दाम दोगुने कर दिए और बाद में न्यूनतम किराया भी दोगुना कर दिया. पहले प्लेटफॉर्म टिकट 5 रुपये का था और न्यूनतम किराया भी. रेलवे ने इन दोनों को बढ़ाकर 10 रुपये कर दिया है.
इसी सरकार के कार्यकाल में रेलवे में एडवांस बुकिंग की अवधि दो महीने से बढ़ाकर चार महीने कर दी गई. जाहिर है कि इससे भी आम लोगों का पैसा रेलवे के पास अधिक दिनों तक पड़ा रहेगा. सुविधा के मुताबिक तर्क गढ़ने का यह सबसे बड़ा उदाहरण है. पहले जब एडवांस बुकिंग की अवधि घटाकर दो महीने की गई थी तो उस वक्त रेलवे ने तर्क दिया था कि ऐसा दलालों को इस तंत्र से बाहर निकालने और वास्तविक यात्रियों की सुविधा के लिए किया जा रहा है. अब फिर से इसे चार महीना करने के लिए ऐसे ही तर्क गढ़े गये हैं.
नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आने के पहले तक त्योहारों या गर्मियों में चलाई जाने वाली अतिरिक्त रेलगाडि़यों को स्पेशल ट्रेन के नाम से जाना जाता था. इनमें किराया भी सामान्य गाडि़यों की तरह ही लगता था. मोदी राज में इनका नाम बदलकर सुविधा ट्रेन कर दिया गया. अब इनका किराया भी सामान्य नहीं रहा. इनका न्यूनतम किराया उतना ही है जितना सामान्य ट्रेनों में तत्काल का किराया होता है.
सुविधा ट्रेनों से जुड़ा एक नियम यह भी है कि इनकी कुल उपलब्ध टिकटों में से हर 20 फीसदी की बुकिंग के बाद इनका किराया बढ़ जाता है. यह किराया बढ़ता हुआ तत्काल किराये का तीन गुना तक हो जाता है. लेकिन इतना अधिक पैसा चुकाने के बाद भी यात्रियों को अब भी उन्हीं समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है, जिसके लिए स्पेशल ट्रेनें हमेशा से कुख्यात रही हैं. इनके बारे में सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि ये कभी टाइम से नहीं चलतीं और इन्हें जहां मन हो वहां रोक दिया जाता है. सुविधा ट्रेनें भले ही किराया वसूलने के मामले में स्पेशल ट्रेनों से बहुत आगे हों लेकिन देरी से चलने के मामले में ये बिलकुल पुरानी ट्रेनों जैसी ही हैं.
आज रेलवे अपने ‘कल्याणकारी’ चोले को उतारकर पूंजीवाद के जिस मॉडल को अपनाने की बेताबी में है, उसे पूंजीवाद का आवारा मॉडल कहा जा सकता है
एक ऐसे समय में जब दुनिया भर में ऊर्जा के संसाधनों की कीमत जमीन से भी नीचे जा चुकी है, रेलवे के इन निर्णयों से लगता है कि वह पूंजीवाद का अपना एक अलग ही मॉडल गढ़ने की कोशिश में है. रेलवे जब भी किराया बढ़ाने या यों कहें कि आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ाने वाले फैसले करती है तो सरकार की तरफ से दो तर्क प्रमुखता से दिए जाते हैं. पहला यह कि रेलवे बहुत घाटे में है और दूसरा यह कि ये फैसले बेहतर सेवाओं के लिए किए जा रहे हैं. इनके बारे में अगर किसी रेल यात्री से पूछें तो उसका बेहद सामान्य सा जवाब आता है कि अगर रेलवे घाटे में है तो इसके लिए वे जिम्मेदार हैं या फिर इसका प्रबंधन करने वाले?
सरकार के दूसरे तर्क की सच्चाई किसी भी ट्रेन का एक सफर करके ही जानी जा सकती है. सच्चाई यह है कि भले ही रेलवे में यात्रा करने वालों पर मोदी सरकार ने आर्थिक बोझ बढ़ा दिया हो लेकिन उसमें मिलने वाली सेवाओं की हालत जस की तस बनी हुई है. ट्रेनों का लेट चलना देश की स्थायी समस्या है. पहले ऐसा सर्दियों में ज्यादा होता था. लेकिन अब कोई भी मौसम ऐसा नहीं है, जब वे समय से चलें. वहीं रेलवे की दूसरी सेवाओं के स्तर में भी कोई खास सुधार नहीं दिखता. रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने भले ही कुछ ट्वीट्स पर तुरंत कदम उठाकर मीडिया की सुर्खियां बटोरी हों लेकिन सच्चाई यह है कि वे यह काम भी बेहद ‘सिलेक्टिव’ तरीके से करते हैं. उन्हें मिलने वाली हजारों शिकायतों में से इक्का-दुक्का पर ही उनकी और उनके मंत्रालय की तत्परता दिखती है.
दरअसल, आज रेलवे अपने ‘कल्याणकारी’ चोले को उतारकर पूंजीवाद के जिस मॉडल को अपनाने की बेताबी में है, उसे पूंजीवाद का आवारा मॉडल कहा जा सकता है. इसमें सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए आर्थिक बोझ तो उपभोक्ता पर डाला जा रहा है लेकिन सेवाओं की गुणवत्ता खराब होने पर इसकी भरपाई की कोई व्यवस्था नहीं है. ट्रेन समय से चलाने के लिए किराया बढ़ाया जा रहा है लेकिन वहीं अगर यह देर हो जाए और इससे यात्रियों को नुकसान उठाना पड़े तो इसकी भरपाई की भी तो कोई व्यवस्था होनी चाहिए थी इस कॉरपोरेट मॉडल में.