विधानसभा सत्र की शुरुआत में राज्यपाल के अभिभाषण के लिए जो नया प्रोटोकॉल राष्ट्रपति ने भेजा था उसे न मानकर उत्तर प्रदेश सरकार एक बार फिर से राज्यपाल से उलझने के साथ-साथ राष्ट्रपति से भी उलझ गई है
सदन की बैठक शुरू होने के साथ ही उत्तर प्रदेश विधानसभा में हंगामा और विवाद आरंभ होने की एक परंपरा सी बन चुकी है. लेकिन इस बार विवाद की शुरूआत 29 जनवरी को सदन की बैठक आरम्भ होने से पहले ही हो गई. विवाद राज्यपाल के नए प्रोटोकॉल को लेकर हुआ जिसे समाजवादी पार्टी सहित समूचे विपक्ष ने मानने से मना कर दिया. राष्ट्रपति द्वारा सुझाए गए इस नए प्रोटोकॉल के पक्ष में अकेली भारतीय जनता पार्टी खड़ी थी. भाजपा का कहना था कि नए प्रोटोकॉल का विरोध राष्ट्रपति की अवमानना है और इसे अस्वीकार करने से राज्य में संवेधानिक संकट की स्थिति आ गई है.
लेकिन कार्य मंत्रणा समिति में सबसे पहले नए प्रोटोकॉल का विरोध करने वाली बहुजन समाज पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, ’राज्यपाल के इस प्रोटोकाल के बहाने तानाशाही की परंपरा शुरू होगी. इसे लागू करने से पूर्व विधिक राय के लिए राज्यसभा की परामर्श समिति के पास भेजा जाना चाहिए.' लगभग ऐसी ही राय कांग्रेस की भी है. कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता प्रदीप माथुर का मानना है कि विधानसभा की अपनी परंपराएं हैं. किसी नई परंपरा को सदन की कार्यवाही का हिस्सा बनाने से पूर्व इस पर विधिक राय ली जानी चाहिए.
विपक्ष के विरोध के बाद राज्यपाल ने पुराने प्रोटोकॉल के मुताबिक ही विधानसभा के कार्यक्रम चलाने पर सहमति तो दे दी लेकिन उन्होंने इसका पूरा ब्यौरा भी राष्ट्रपति को भेज दिया है
विपक्ष के विरोध के बाद राज्यपाल ने पुराने प्रोटोकॉल के मुताबिक ही विधानसभा के कार्यक्रम चलाने पर सहमति तो दे दी लेकिन इसके साथ ही उन्होंने कार्य मंत्रणा समिति की बैठक की कार्यवाही का पूरा ब्यौरा भी राष्ट्रपति को भेज दिया है. माना जा रहा है कि आठ-नौ फरवरी को दिल्ली में होने वाले राज्यपालों के सम्मेलन में भी उत्तर प्रदेश के प्रोटोकॉल विवाद पर चर्चा हो सकती है.
दरअसल सदन शुरू होने के दिन राज्यपाल विधानसभा और विधान परिषद के संयुक्त सदन में अपना अभिभाषण प्रस्तुत करते हैं. अब तक होता यह था कि राज्यपाल का स्वागत विधानसभा अध्यक्ष, विधान परिषद के सभापति व मुख्यमंत्री औऱ संसदीय कार्यमंत्री द्वारा विधान मंडप के गेट पर किया जाता था. राज्यपाल का अभिभाषण खत्म होने पर अध्यक्ष, सभापति, मुख्यमंत्री और संसदीय कार्यमंत्री उन्हें वहीं से विदा भी करत थे.
इस बार राष्ट्रपति भवन के एक निर्देश के मुताबिक इस प्रोटोकॉल में कई बदलाव किए गए थे. नए प्रोटोकॉल में विधानभवन के लिए प्रस्थान से पूर्व राज्यपाल को राजभवन में गार्ड ऑफ ऑनर दिये जाने की व्यवस्था थी. विधान भवन पहुंचने पर अध्यक्ष, सभापति, मुख्यमंत्री व अन्य प्रमुख लोगों द्वारा उनका प्रवेश द्वार पर स्वागत किया जाना था. यहां से एक जुलूस के रूप में उन्हें विधान मंडप पहुंचना था. उनके आसन पर पहुंचने तक बिगुल बजता, वहां सभी सदस्य उनके सम्मान में खड़े होते और फिर पुलिस बैंड पर राष्ट्रगान की धुन बजती. राज्यपाल के अभिभाषण के बाद धन्यवाद प्रस्ताव और फिर राष्ट्रगान. इसके बाद जिस तरह आए थे उसी तरह वापसी.
नए प्रोटोकॉल में विधानभवन के लिए प्रस्थान से पूर्व राज्यपाल को राजभवन में गार्ड ऑफ ऑनर दिये जाने की व्यवस्था थी. विधान भवन पहुंचने पर उनका प्रवेश द्वार पर स्वागत किया जाना था
राज्यपाल के जुलूस का भी प्रोटोकॉल तय था. इसमें सबसे आगे एडीसी, उनके पीछे दोनों सदनों के प्रमुख सचिव, उनके पीछे दोनों पीठासीन अधिकारी (विधानसभा अध्यक्ष और विधानपरिषद सभापति) बीच में राज्यपाल, उनके पीछे मुख्यमंत्री व संसदीय कार्यमंत्री तथा सबसे पीछे प्रमुख सचिव राज्यपाल तथा मुख्यसचिव को होना था. विपक्ष के विरोध और उग्र तेवरों के चलते इस प्रोटोकॉल के विधान भवन वाले हिस्से को तो अमली जामा नहीं पहनाया जा सका. अलबत्ता राज्यपाल ने प्रोटोकॉल का राजभवन वाला हिस्सा अवश्य शुरू करवा दिया है. यानी इस बार विधान भवन रवाना होने से पूर्व उन्हे सशस्त्र बलों द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया.
राज्यपाल राम नाइक की नाराजगी के बावजूद सत्ताधारी समाजवादी पार्टी और विपक्ष इस नए प्रोटोकॉल के विरोध को संवैधानिक मुद्दा नहीं मानते. उनका तर्क है कि राष्ट्रपति के सचिव की ओर से भेजा गया प्रोटोकॉल संबंधी पत्र बाध्यकारी नहीं है. यह सिर्फ सुझाव है, किसी तरह का निर्देश नहीं. लेकिन इसका समर्थन कर रही भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि राष्ट्रपति के सचिव के पत्र में साफ लिखा है कि राष्ट्रपति द्वारा इस प्रोटोकॉल के सिलसिले में गठित समितियों की सिफारिशों को सदन की प्रक्रिया का हिस्सा मान लिया गया है. इसलिए इस प्रोटोकॉल को लागू करना एच्छिक या स्वैच्छिक नही है बल्कि यह एक बाध्यकारी निर्देश है.
उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी दलों द्वारा राज्यपाल को लेकर विवाद खड़े करने का इतिहास बहुत नया नहीं है. सपा-बसपा की सरकारें ऐसा अक्सर करती रही हैं. समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ मंत्री आजम खान अनेक राज्यपालों की मंशा और नीयत पर सवाल उठा चुके हैं. ऊपर से मौजूदा राज्यपाल राम नाईक के साथ तो अखिलेश सरकार का पूरा छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है. वे सरकार के कई काम, कई विधेयक और कई प्रस्तावों को अस्वीकार कर चुके हैं.
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ मंत्री आजम खान अनेक राज्यपालों की मंशा और नीयत पर सवाल उठा चुके हैं. ऊपर से मौजूदा राज्यपाल राम नाईक के साथ तो अखिलेश सरकार का पूरा छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है
उदाहरण के तौर पर विधान परिषद में मनोनयन के मामले में राज्यपाल ने सरकार की सूची को आंशिक रूप से ही स्वीकार किया था. लोकायुक्त चयन के मुद्दे पर तो राज्यपाल की आपत्तियों के कारण ही सरकार को सुप्रीम कोर्ट तक से खरी-खोटी सुननी पड़ी थी.
बहरहाल अब राज्यपाल ने इस प्रोटोकॉल के विरोध को लेकर कार्यमंत्रणा समिति की पूरी कार्यवाही राष्ट्रपति के पास भेज दी है और केन्द्र में सत्तारूढ़ बीजेपी भी इस मामले में सपा, कांग्रेस, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल के खिलाफ खड़ी हो गई है. उसने इस बारे में राष्ट्रपति से मिल कर उन्हे पूरी जानकारी देने की भी योजना बनाई है. ऊपर से यह विवाद एक प्रकार से राष्ट्रपति भवन से भी जुड़ा हुआ है. इसलिए यह तय है कि प्रोटोकॉल का यह विवाद यहीं समाप्त होने की बजाय अभी और तूल पकड़ सकता है.