लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार फिर से एक हो सकते हैं तो नीतीश कुमार और जीतनराम मांझी का झगड़ा क्यों नहीं मिट सकता, ऐसा भी कुछ सोचने वाले रहे होंगे पिछले दिनों. जब दोनों की सात फरवरी को मीटिंग हुई तो ऐसा लगा भी कि अब मामला सुलटने ही वाला है. लेकिन भारतीय राजनीति में बड़ी-बड़ी दोस्तियां टूटने के उदाहरण भी तो हैं. सो मामला जमा नहीं बल्कि और बिखर गया. या जमने से तुक मिलाएं तो फट गया. वह भाजपा जो मांझी के पूरे मुख्यमंत्रित्वकाल में जेडीयू सरकार की जमकर बुराई करती रही अब मांझी को मंझधार में थामे हुए है, उन नीतीश कुमार को पानी पी-पी कर कोसते हुए जिनके साथ उसने आठ साल खुद सरकार चलाई है.

मांझी की कहानी शुरू होती है उनके मुख्यमंत्री बनने से कुछ दिन पहले तब से, जब नरेंद्र मोदी को भाजपा की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद नीतीश कुमार ने भाजपा से किनारा कर लिया था. इसका नुकसान नीतीश को भी हुआ और देश को भी. नीतीश लोकसभा चुनाव बुरी से भी बुरी तरह से हार गए और आज इस दशा में हैं कि उन पार्टियों और लोगों से तरह-तरह के समझौते करने पड़ रहे हैं जिनसे कभी उन्हें छड़क पड़ती थी या फिर जिनके लिए वे कभी साक्षात तारणहार थे.

नीतीश के भाजपा से किनारा करने का देश को नुकसान यह हुआ कि अगर नीतीश भाजपा में बने रहते तो शायद आज की केंद्र सरकार और उसे चलाने वालों की प्रकृति थोड़ी कम निरंकुश, थोड़ी ज्यादा उदार होती.

नीतीश के भाजपा से किनारा करने का देश को नुकसान यह हुआ कि अगर नीतीश भाजपा में बने रहते तो शायद आज की केंद्र सरकार और उसे चलाने वालों की प्रकृति थोड़ी कम निरंकुश, थोड़ी ज्यादा उदार होती. लोकसभा चुनाव से पहले मोदी को खुद अंदाजा नहीं था कि वे इतने प्रचंड बहुमत की सरकार के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं. इसलिए वे नीतीश की शर्तों पर उनके साथ लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए राजी होते ही. अगर वे रामविलास पासवान की लोजपा को सात सीटें दे सकते थे तो नीतीश तो नीतीश थे. ऐसी हालत में केंद्र सरकार में नीतीश का भी कुछ तो दखल रहता ही और भाजपा की इससे कुछ कम सीटें भी होतीं.

खैर, मोदी के मुद्दे पर भाजपा से किनारा करने के पीछे नीतीश के दिमाग में शायद दो बातें रही होंगी: एक उन्हें अपने द्वारा किए गए कामों की सकारात्मकता का भरोसा रहा होगा और दूसरा मुस्लिम वोट आरजेडी को चले जाने का डर भी उनके इस निर्णय के पीछ रहा होगा. हालांकि लोकसभा चुनाव ने उनके ये दोनों ही भ्रम तोड़ दिए.

मांझी को मुख्यमंत्री बनाते समय नीतीश के दिमाग में शायद तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह रहे होंगे. या फिर हो सकता है अब के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम

तो लोकसभा चुनाव बुरी से भी बुरी तरह हारने के बाद अपनी इज्जत और उससे भी ज्यादा अपने कुनबे में होने वाली फूट को बचाने के लिए नीतीश को मुख्यमंत्री का पद छोड़कर जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा. यहां एक बार फिर से विडंबना यह है कि नीतीश अगर भाजपा का साथ नहीं छोड़ते तो मांझी मुख्यमंत्री न बनते लेकिन आज मांझी जो कर रहे हैं या करना चाह रहे हैं वह नरेंद्र मोदी की भाजपा के दम पर ही है.

मांझी को मुख्यमंत्री बनाते समय नीतीश के दिमाग में शायद तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह रहे होंगे. या फिर हो सकता है अब के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम जिन्हे 2001 में मजबूरी में जयललिता ने कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बनाया था. गैरजरूरी लेकिन एक मजेदार बात यहां यह भी कही जा सकती है कि लालू प्रसाद यादव ने किसी और की बजाय जब राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया था तब उनके सामने मनमोहन सिंह और पनीरसेल्वम सरीखे उदाहरण नहीं थे.

पिछले कुछ महीनों में उनके और नीतीश के बीच बात यहां तक बिगड़ गई कि दोनों के बीच बात तक होनी बंद हो गई थी. इसका भी फायदा मांझी ने अपने मुताबिक काम करने में उठाया.

तो मांझी को अपने महादलित वोटबैंक को साधने की नीयत के साथ ही नीतीश ने उनकी ‘मनमोहनी’ प्रकृति की वजह से भी मुख्यमंत्री बनाया था. उन्हें कुछ बोलना नहीं था, कुछ करना नहीं था, एक प्रकार की राज्यपाली मुद्रा में सत्ता का बैठकर-लेटकर सुख भोगना था. काम करवाने-करने के लिए नीतीश और उनके विश्वासी अफसर थे ही.

लेकिन मांझी और कुछ भी हुए हों सोनिया वाले मनमोहन सिंह साबित नहीं हुए. उन्होंने अपनी अकल लगानी शुरू कर दी. अपने वफादार अफसरों की गोटियां बिठानी शुरू कर दीं. इसके चलते पिछले कुछ महीनों में उनके और नीतीश के बीच बात यहां तक बिगड़ गई कि दोनों के बीच बात तक होनी बंद हो गई थी. इसका भी फायदा मांझी ने अपने मुताबिक काम करने में उठाया.

इस दौरान चूंकि सत्ता मांझी के हाथ में थी इसलिए आरजेडी भी नीतीश कुमार की बजाय सीधे उनसे ही अपने काम और मतलब साधने के लिए संपर्क करने लगी थी. उधर नीतीश हर तरह से अपनी इज्जत दांव पर लगाकर भी, एक मिले-जुले समाजवादी जनता दल का अपना सपना पूरा नहीं कर पा रहे थे. ऐसे में वे, जो पिछले कुछ दिनों से जो हो रहा है वह नहीं करते तो क्या करते?

गलती मांझी की है. उन्हें महादलित जीतनराम मांझी की बजाय मनमोहन सिंह बने रहना चाहिए था.