कई देशों की सरकारें अर्वे फल्सियानी से मिली जानकारियों पर कार्रवाई कर रही हैं
कई देशों की सरकारें अर्वे फल्सियानी से मिली जानकारियों पर कार्रवाई कर रही हैं
कभी एचएसबीसी में नौकरी करने वाले अर्वे फल्सियानी से मिली जानकारियां अब कालेधन तक पहुंचने में कई देशों की मदद कर रही हैं.

2006 की बात है. एचएसबीसी में काम करने वाले एक इंजीनियर का मोनाको से स्विटजरलैंड तबादला हुआ. अर्वे फल्सियानी नाम के इस इंजीनियर को बैंक के साथ काम करते हुए तब तक पांच साल का अरसा हो चुका था. थोड़े ही समय बाद फल्सियानी को महसूस होने लगा कि बैंक की जेनेवा स्थित प्राइवेट बैंकिंग इकाई में सब कुछ ठीक नहीं है. उन्हें कंपनी के डेटा मैनेजमेंट में गड़बड़ियां दिखीं. उन्हें लगा कि डेटा को जिस तरह से रखा जा रहा है उससे टैक्स चोरी का संदेह होता है. यह बात अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बताते हुए फल्सियानी ने एक नई व्यवस्था भी सुझाई थी. लेकिन उनकी बात को खारिज कर दिया गया.

धीरे-धीरे फल्सियानी को पता चला कि ये गड़बड़ियां इत्तेफाक नहीं हैं, बल्कि इनका इस्तेमाल एक बड़ी रकम को छिपाने में किया जा रहा है. उन्होंने सोचा कि यह जानकारी देश की न्याय-व्यवस्था तक पहुंचाई जाए, लेकिन वे असफल रहे. फल्सियानी ने बैंक कर्मचारियों के लिए बनाई गई इंटरनल अलार्म सिस्टम नाम की व्यवस्था जरिये स्विस बैंकर्स एसोसिएशन को आगाह करने की कोशिश भी की. लेकिन कुछ नहीं हुआ. उल्टे, दिसंबर 2008 में उन्हें ही गोपनीय जानकारियां चुराने और दूसरे बैंकों को उन्हें बेचने की कोशिश करने के आरोप में हिरासत में ले लिया गया. घंटों की पूछताछ के बाद उन्हें इस शर्त पर छोड़ा गया कि अगले दिन वे फिर पूछताछ के लिए हाजिर होंगे. बैंक के सर्वरों के जरिये तब तक फल्सियानी यह साबित करने के लिए पर्याप्त जानकारी निकाल चुके थे कि जेनेवा स्थित एचएसबीसी बैंक दुनिया भर के धनकुबेरों को कर चोरी के लिए प्रोत्साहित करता है. उन्होंने किराए की एक टैक्सी ली, अपनी पत्नी और बेटी को उसमें बिठाया और फ्रांस जा पहुंचे. वहां भी उन्हें गिरफ्तार किया गया. स्विटजरलैंड ने फ्रांस से उनके प्रत्यर्पण की मांग की. उसका आरोप था कि गोपनीय डेटा की चोरी करके फल्सियानी ने स्विस कानूनों का उल्लंघन किया है.


फल्सियानी से मिली जानकारी के आधार पर फ्रांस ने अलग-अलग देशों के खातेदारों की सूचियां बनाई और उन देशों को सौंप दी. इनमें भारत भी है.

पर फल्सियानी की किस्मत अच्छी थी. वह मंदी का दौर था और यूरोप के तमाम देशों में सरकारों के खिलाफ गुस्सा था. लोग इसलिए नाराज थे कि अमीर तो टैक्स की चोरी करके स्विस बैंकों में पैसा भर रहे हैं और आम जनता टैक्स का बोझ उठा रही है. फ्रांस को लगा कि फल्सियानी के पास मौजूद जानकारियां उसे अपने उन नागरिकों तक ले जा सकती हैं जिन्होंने टैक्स की चोरी करके स्विस खातों में अकूत पैसा छिपाकर रखा हुआ है. उसने स्विटजरलैंड को साफ इनकार कर दिया. इतना ही नहीं, फल्सियानी से मिली जानकारी के आधार पर फ्रांस ने अलग-अलग देशों के खातेदारों की सूचियां बनाई और उन देशों को सौंप दी. इनमें भारत भी है. अब ये देश इस जानकारी के आधार पर अपने-अपने हिसाब से जांच और कार्रवाई कर रहे हैं. ग्रीस, स्पेन, अमेरिका, बेल्जियम और अर्जेंटीना जैसे देशों में इस सूची के आधार पर कई गिरफ्तारियां हुई हैं. माना जा रहा है कि कई देश और आपराधिक तत्व फल्सियानी की जान के पीछे हैं और यही वजह है कि फ्रांस में उन्हें अब सुरक्षा मिली हुई है.

उधर, स्विटजरलैंड फल्सियानी को हासिल करने की हरसंभव कोशिश कर रहा है. स्विस एटॉर्नी जर्नल का आरोप है कि डेटा की इस चोरी के पीछे फल्सियानी का मकसद इसे बेचकर पैसा कमाना था. उधर, जर्मन पत्रिका डेर स्पीगेल को दिए गए एक साक्षात्कार में फल्सियानी का कहना था कि एचएसबीसी ने जो व्यवस्था बनाई है उसका मकसद किसी भी तरह अपनी जेबें भरना है, भले ही इससे समाज का कितना भी नुकसान हो रहा हो. फल्सियानी के मुताबिक बैंक द्वारा बनाई गई व्यवस्था टैक्स की चोरी में मदद करती है. कुछ समय पहले एक टीवी चैनल को दिए गए साक्षात्कार में फल्सियानी ने कहा था कि भारत को अब तक जो जानकारी मिली है वह तो सिर्फ एक फीसदी ही है.