कहते हैं किसी भी तरह, किसी भी शर्त पर अच्छी तरह जिंदगी जीने वाले लोग बहुत सारे होते हैं पर मौत फैसला करती है कि वे क्या थे. हमारे दौर के बेहद लोकप्रिय शायर निदा फाजली को दुनिया से विदा हुए करीब दो साल हो गये हैं. इस दौरान अपनी सादगी और लिखाई के कारण लोगों के दिल में बचे और हमेशा जिंदा रह जाने की बात को उन्होंने पुख्तगी दी है.

कुछ लोग सबके जैसे होते हैं, सबके लिए होते हैं, सबकी बात कहते हैं, सबके लिए रोते हैं; सबके जख्मों से जिनका सीना छलनी होता है, ऐसा कोई कबीर होता है, कोई अमीर खुसरो या फिर इनकी परंपरा को अपनी सांसों में जीने वाला कोई निदा फाजली. वे अवाम के शायर थे इसलिए उन्होंने वह रास्ता नहीं चुना, जो उनसे पहले दाग, ग़ालिब और मीर जैसे नामचीन शायर बनाकर छोड़ गए थे. उन्हें बनी राह पर चलना मंजूर भी नहीं था - ‘मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशाई हूं / जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूं नहीं जाता’.

निदा फाजली के प्रेरणास्त्रोत तो सूर हुए, कबीर हुए, उन्होंने तुलसी और मीरा को दिल से पढ़ा था, बाबा फरीद को दिल में आत्मसात किया क्योंकि वे अपनी ही जिंदगी के कुछ मुश्किल अनुभवों से गुजरते हुए यह जान चुके थे कि शायर को जिंदा रहने के लिए लोगों के दिल में घर करना होता है. सीधे-सादे लफ्जों में अपनी बात कहने की कला को उन्होंने बहुत मुश्किल से साधा और ऐसे साधा कि फिर इसकी डोर कभी उनके हाथों से न छूटी और न कभी जरूरत से ज्यादा ढीली ही हुई.

‘मुलाकातें’ नामक अपने संस्मरणों की किताब में दिग्गज लेखकों के ऊपर संस्मरण लिखने और उसमें उनकी पोल-पट्टी खोलने के कारण लेखकों के एक बड़े वर्ग में वे हमेशा बहिष्कृत रहे

कहने-सुनने में यह भले ही आम सी बात लगती है लेकिन है नहीं. दोहा जैसी एक लोकविधा जो लगभग खत्म हो चुकी थी, उसे उन्होंने नए शब्द दिए, नई आत्मा दी और नए अर्थ भी. आम से शब्दों में इतने सारे अर्थ भरना, इतने सारे भाव पिरोना, उन्हें इतने सलीके से कहना कोई ‘निदा फाजली’ ही कर सकता था. ‘हरेक बात पे चुप रहके क्यूं सुना जाए / कभी तो हौसला करके कुछ कहा जाए’ जैसे जिंदगी के फलसफे उनकी कलम से निकल पाए तो शायद इसीलिए. वे ही थे जो लिख सकते थे, ‘सपना झरना नींद का / जागी आंखें प्यास / पाना खोना-खोजना, जीवन का इतिहास.’

निदा फाजली बशीर बद्र नहीं हैं, न ही गुलजार. रूमानियत भरे शेर, गजलें, नज्म और भोले-भले अर्थों वाले प्रेम भरे शब्द भी उनके यहां उस तरह नहीं हैं. प्रेम यहां है भी तो कुछ बड़े और व्यापक अर्थों में. जग और जगत से खुद को जोड़ते हुए. सब में ही कहीं वे भी हैं थोड़े से, इसीलिए उनका अंदाज सूफी संतों वाला है. निदा लोक और जिंदगी के रंगों के शायर थे या यूं कहें कि बाजीगर. अपने शब्दों में दुनिया के अफसानों को पिरोनेवाले, जिंदगी के फलसफों को जीते हुए लिखने वाले - ‘अच्छा सा कोई मौसम, तन्हा सा कोई आलम / हर बात का रोना तो किस बात का रोना है / गम हो कि खुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं / फिर रस्ता ही रस्ता है, हंसना है न रोना है / आवारा मिजाजी ने फैला ही दिया दामन / आकाश की चादर है, धरती का बिछौना है.’ या फिर –‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’ जैसे न जाने कितने गीत इसका उदाहरण हैं.

‘निदा’ का मतलब होता है ‘आवाज’ और ‘फाजली’ शब्द उनके कश्मीर के गांव (फाजिला) के नाम से उनके नाम में आया. यहां से उनका परिवार विस्थापित होकर दिल्ली आया था. अन्य मशहूर शायरों की तरह उन्होंने इस नाम को अपने तखल्लुस में जोड़ लिया. हालांकि पिता और भाई के नाम की तर्ज पर उनका पहला नाम ‘मुक्तदा हसन’ था. निदा ने यूं ही अपना नाम ‘निदा’ नहीं चुना था. उस नाम को मायने भी दिए थे, लोगों के भीतर के दर्द और उनके दिल की आवाज को शब्द देते हुए - ‘नील गगन पर बैठ के कब-तक, चांद सितारों से झांकोगे / पर्वत की ऊंची चोटी से कबतक दुनिया को देखोगे... मेरा छप्पर टपक रहा है, बनकर सूरज इसे सुखाओ / खाली है आटे का कनस्तर, बनकर गेहूं इसमें आओ / चुप-चुप है आंगन के बच्चे, बनकर गेंद इन्हें बहलाओ / काम बहुत है हाथ बंटाओ, अल्ला मियां मेरे घर भी आ आओ.’

सीधे-सादे लफ्जों में अपनी बात कहने की कला को उन्होंने बहुत मुश्किल से साधा और ऐसे साधा कि फिर इसकी डोर कभी उनके हाथों से न छूटी और न कभी जरूरत से ज्यादा ढीली ही हुई

जिंदगी सीधी-सच्ची बात कहते हुए हर बार आसान और सरल नहीं होती. ‘मुलाकातें’ नामक अपने संस्मरणों की किताब में दिग्गज लेखकों के ऊपर संस्मरण लिखने और उसमें उनकी पोल-पट्टी खोलने के कारण लेखकों के एक बड़े वर्ग में वे हमेशा बहिष्कृत रहे. पाकिस्तान जाने पर उनका विरोध यह कहकर किया गया कि वे अल्लाह से भी ऊपर बच्चों को मानते हैं और यह एक तरह का कुफ्र है (घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें / किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए). यह वाकया उन्होंने अपनी आत्मकथाओं ‘दीवारों के भीतर’ और ‘दीवारों के बाहर’ में दर्ज किया है.

हालांकि इन अनुभवों के बाद भी उनकी सच कहने की आदत कभी नहीं गई. लेखकों की पुरस्कार वापसी का मामला हो, गुलाम अली को भारत न आने देने की बात हो या फिर आमिर खान को देशद्रोही कहा जाना, वे अपना विरोध हर जरूरी बात पर जताते रहे. आज के माहौल पर उनका कहना था, ‘आज जो कुर्सी पर हैं उन्हें साहित्य से डर लगता है, क्योंकि साहित्य गालिब की तरह सवाल करता है... मुशायरों और कवि सम्मेलनों में भी अब सांप्रदायिकता हावी हो रही है, सच बोलने वालों का हश्र दाभोलकर, कलबुर्गी और असलम ताहिर जैसा होता है.’

यह अजीब इत्तेफाक की बात है कि निदा फाजली उस दिन गुजरे जो जगजीत सिंह का जन्मदिन है. जगजीत सिंह को गए अभी कुछ बरस ही बीते हैं. निदा फाजली ने जगजीत सिंह की मौत पर वही कहा था जो कभी राज कपूर ने मुकेश की मौत के बाद कहा था. भारतीय गजल सम्राट की मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए उनका कहना था, ‘मुझे लगता है जैसे मेरी आवाज ही खो गई.’ हालांकि इस बात में कोई दोराय नहीं कि अगर जगजीत सिंह ने निदा फाजली की गजलों को आवाज देकर एक खास वर्ग में प्रसिद्धि दिलाई तो निदा ने भी अपने शब्दों से उन्हें अमरता के उस मुकाम पर लाकर खड़ा किया जहां होना सबके बस की बात तो नहीं होती. यहां वे ही जगह बना पाते हैं जो सबके लिए होते हैं. सबके हिस्से में होते हैं. जिनके पास सबके मन का कुछ न कुछ होता है. हिंदी के जानेमाने लेखक धीरेंद्र अस्थाना ने जब मुंबई के अनुभवों पर अपना पहला उपन्यास लिखा, तो निदा जी ने अपनी प्रसिद्ध पंक्तियों के आधार पर उसका नाम सुझाया था - ‘गुजर क्यूं नहीं जाता’.

उन्होंने नए-पुरानों में भेद किए बिना सबको खूब पढ़ा भी है. ताज्जुब की बात है कि इसके बाद भी वे कभी किसी के लिए ‘व्यस्त’ नहीं रहे

निदा अपने से छोटों का उत्साह बढ़ाने के लिए हमेशा ही इतने उदार रहे. इनमें से एक वाकया तो मेरे साथ भी घटा है. यह उस समय की बात है जब एक अखबार में उनके संस्मरणों का नियमित स्तंभ आया करता था. मुझे कमाल अमरोही वाले उनके खंड से जुड़े संस्मरण पर कहानी लिखनी थी और इसके लिए उनसे अनुमति लेनी थी. मैंने जब उन्हें फोन किया तो उनका कहना था कि कहानी में वह हिस्सा किस तरह लिया गया है वह उन्हें देखने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि अव्वल तो यह कहानी है और उन्होंने जो लिखा वह संस्मरण था और वैसे भी हम शोध के क्रम में न जाने कितनी चीजों को कहीं-न-कहीं से लेते ही हैं.

निदा फाजली का लेखन सिर्फ शायरी, कविता या दोहों या गजलों तक सीमित नहीं था. उन्होंने वरिष्ठ शायरों की जीवनियां लिखी हैं. अखबारों-पत्रिकाओं में संस्मरणों के स्तंभ भी लिखे हैं. इसके साथ ही उन्होंने नए-पुरानों में भेद किए बिना सबको खूब पढ़ा भी है. ताज्जुब की बात है कि इसके बाद भी वे कभी किसी के लिए ‘व्यस्त’ नहीं रहे. वे मायानगरी का हिस्सा थे जहां अदने से लोग भी सेक्रेटरी रखा करते थे और यहां सीधे-सीधे बात करने का कोई चलन नहीं था.

आखिर में जाते-जाते ऐसे अजीम शायर को उन्हीं के शब्दों में याद करें तो - ‘जिस्म का क्या, पानी का बुलबुला ठहरा....उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था, सारा घर ले गया, घर छोड़ के जानेवाला.’