शिंगणापुर स्थित शनि मंदिर और हाजी अली दरगाह में प्रवेश को लेकर पिछले दिनों महिलाओं ने प्रदर्शन किए थे. इन घटनाओं ने देश के कुछ धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी से जुड़ी बहस को तेज कर दिया है. इसी बीच बीते हफ्ते मुस्लिम महिलाओं के एक समूह ने मस्जिदों में उनके प्रवेश पर लगी पाबंदी के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल की है.

कुछ विद्वानों का मानना है कि धार्मिक किताबें दरगाह के उस स्थान तक महिलाओं के जाने पर पाबंदी लगाती हैं जहां संबंधित दरवेश की कब्र है. हालांकि मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी का कोई धार्मिक आधार नहीं है. सैद्धांतिकतौर पर कहें तो इस्लाम मस्जिदों में महिलाओं को इबादत करने से नहीं रोकता. यही वजह है कि जब हम भारत का इतिहास खंगालते हैं तो पता चलता है यहां मस्जिदों में महिलाओं का इबादत करना बेहद आम बात थी. मस्जिदों में जहां इसके लिए अलग से हिस्सा होता था जिसे जनाना इबातखाना कहा जाता था. सबसे दिलचस्प बात है कि देश में कुछ मस्जिदें सिर्फ महिलाओं के लिए ही बनी थीं.

धार्मिक किताबें दरगाह के उस स्थान तक महिलाओं के जाने पर पाबंदी लगाती हैं जहां संबंधित दरवेश की कब्र है. हालांकि मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी का कोई धार्मिक आधार नहीं है

यह हैरानी की बात हो सकती है लेकिन कर्नाटक के बीजापुर में ऐसी दो मस्जिदें हैं. इनमें से एक – मक्का मस्जिद शहर के पुराने इलाके में स्थित है. कहा जाता है कि इसे 14वीं शताब्दी में बीजापुर के बहमनी शासकों ने बनवाया था. आदिलशाह के दौर के भव्य स्मारकों के बीच यह मस्जिद बेहद सादगी भरी है. ब्रिटिश सर्वेयर हेनरी कोउसेन्स ने बीजापुर पर अपनी सर्वे रिपोर्ट में इस मस्जिद की सबसे दिलचस्प खूबी, मिंबर ना होना, की तरफ इशारा किया है. मिंबर मस्जिद के भीतर ऐसा ऊंचा मंच सरीखा स्थान होता है जहां इमाम खड़े होकर धर्मोपदेश देते हैं. इस मस्जिद में मिंबर का न होना ही इसे महिलाओं की मस्जिद बनाता है क्योंकि तब इसमें इमाम की जरूरत नहीं है. इसके अलावा मस्जिद के चारों तरफ बनी दीवारें भी पर्याप्त ऊंची हैं ताकि महिलाओं को यहां परेशानी न हो.

हालांकि अब बीजापुर की मुस्लिम महिलाएं मक्का मस्जिद में इबादत नहीं करतीं. मस्जिद की देखभाल करने वाली एक बुजुर्ग महिला हमें बताती हैं, ‘औरतें घर में ही नमाज पढ़ती हैं.’ हफ्ते के बाकी दिन सुनसान पड़ी रहने वाली इस मस्जिद में जुम्मे की नमाज के लिए ही कुछ महिलाएं दिखाई पड़ती हैं.

अंडा मस्जिद बीजापुर की दूसरी मस्जिद है जो सिर्फ महिलाओं के लिए बनाई गई थी. यह मस्जिद सन 1608 में इब्राहिम आदिल शाह-2 के शासन काल में उसके सिपहसालार एतबार खान ने बनवाई थी. मस्जिद दो मंजिला इमारत है जहां ऊपरी मंजिल पर इबातगाह है और नीचे विश्रामघर या सराय बनाई गई थी. अंडा मस्जिद में भी मिंबर नहीं है और इसका मतलब है कि इसका निर्माण भी महिला मस्जिद के तौर पर हुआ था. लेकिन विडंबना यह है कि अंडा मस्जिद में अब महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी लग चुकी है. इसके निचले तले पर मदरसा चलता है तो ऊपरी तले की इबातगाह में सिर्फ आदमी ही आ सकते हैं.

अंडा मस्जिद बीजापुर की दूसरी ऐसी मस्जिद है जो सिर्फ महिलाओं के लिए बनाई गई थी. यह मस्जिद सन 1608 में इब्राहिम आदिल शाह-2 के शासन काल में उसके सिपहसालार एतबार खान ने बनवाई थी

मस्जिद में जनाना इबातखाना

इतिहास की तरफ नजर दौड़ाएं तो सिर्फ महिलाओं के लिए मस्जिदें बहुत कम हैं लेकिन ऐसी प्रसिद्ध मस्जिदों की तादाद पर्याप्त है जिनमें उनके लिए अलग हिस्सा होता था. दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम से लेकर भोपाल की ताजुल मसाजिद तक में एक अलग जनाना इबातखाना है. यह साबित करता है कि एक दौर में मस्जिदों के भीतर महिलाओं का इबादत के लिए आना आम बात थी.

जनाना इबातखाना आमतौर पर पहले तल्ले पर होता था और कभी-कभार यह पूरा का पूरा उन्हीं के लिए सुरक्षित होता था (बीजापुर की अफजल खान मस्जिद में ऐसा ही है).

दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद की छत उत्तर की तरफ बढ़ाई गई है और जहां जनाना इबातखाना है. यहां दीवार से निकलती संकरी सीढ़ियों के जरिए पहुंचा जा सकता है. बीजापुर की अंडा मस्जिद भी ऐसी है. जौनपुर की अटाला मस्जिद 1308 में बनी थी और इसका ऊपरी तल्ला पूरी तरह महिलाओं के लिए सुरक्षित था.

शारकी सल्तनत के दौरान जौनपुर में सन 1447 में लाल दरवाजा मस्जिद बनवाई गई थी और इसका जनाना इबातखाना बेहद भव्य है. यहां गुंबद के नीचे इबातखाने के उत्तर और दक्षिण की तरफ दो तल्ले बने हैं जहां पहला तल्ला औरतों के लिए बनाया गया है. प्रवेश द्वार के बाहर मीनार में जो सीढ़ियां बनी हैं उनके जरिए यहां तक पहुंचा जाता था. फिलहाल जौनपुर की इन दोनों मस्जिदों में महिलाएं इबादत के लिए नहीं आ सकतीं.

बीसवीं शताब्दी तक भारत की (भोपाल की ताजुल मसाजिद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है) बड़ी मस्जिदों में महिलाओं की सहूलियत के लिए जनाना इबातखाना बनाने की परंपरा थी

इन मस्जिदों के अलावा बड़ौदा के नजदीक चंपानेर की जामा मस्जिद (निर्माण वर्ष - 1523), पश्चिम बंगाल के पंडुआ में बनी अदीना मस्जिद (निर्माण वर्ष – 1374-75), और बीसवीं शताब्दी में बनी भोपाल की ताजुल मसाजिद भी अपने जनाना इबातखानों के लिए प्रसिद्ध रही हैं.

मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी पिछली शताब्दी की देन है

इस्लाम धर्म और उसका इतिहास बताता है कि महिलाओं को मस्जिदों में इबादत के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया है लेकिन आज ज्यादातर मस्जिदों में इसकी इजाजत नहीं है. बीसवीं शताब्दी तक भारत की (भोपाल की ताजुल मसाजिद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है) बड़ी मस्जिदों में महिलाओं की सहूलियत के लिए जनाना इबातखाना बनाने की परंपरा थी.

ठीक-ठीक यह बता पाना मुश्किल है कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी कब लगी लेकिन ताजुल मसाजिद के आधार पर कहा जा सकता है कि यह कोई पुरानी परंपरा नहीं है. देश में हाल के दशकों में बनी ज्यादातर मस्जिदों में महिलाओं के लिए अलग से इबादतखाना नहीं है. मुख्य इबादतखाने का एक हिस्सा आड़ लगाकर महिलाओं के लिए आसानी से सुरक्षित किया जा सकता था लेकिन ऐसा नहीं किया गया. हालांकि पूरे भारत के लिए यह बात नहीं कही जा सकती. कश्मीर की मस्जिदों के जनाना इबातखानों में आज भी महिलाएं इबादत करने पहुंचती हैं. इससे यह बात तो कम से कम कही ही जा सकती है कि मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी एक मनमाना नियम है.

(यह हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन पर प्रकाशित आलेख का संपादित स्वरूप है)