बाबूलाल मरांडी
बाबूलाल मरांडी
इस बार के विधानसभा चुनाव के बाद लगा था कि अपने जन्म से ही आयाराम-गयाराम वाली राजनीति देखते रहे झारखंड में राजनीतिक स्थिरता आ गई है. लेकिन अब ये उम्मीदें हवा होती दिख रही हैं.
झारखंड में फिर वही हो रहा है जो नहीं होना चाहिए था. साम-दाम-दंड भेद. जोड़ो नहीं तो तोड़ो. फिर एक बार झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा टूटने वाली है. आठ विधायक वाली पार्टी अब दो विधायकों की रह जाएगी और बाकी छह विधायक पलायन कर भाजपा का दामन थाम लेंगे. पार्टी में टूट की आशंका से परेशान मरांडी ने आज पार्टी विधायकों और पदाधिकारियों की बैठक बुलायी थी. लेकिन प्रदीप यादव और प्रकाश राम को छोड़कर शेष छह विधायक गायब रहे. घर बदलने के लिए उन्होंने चुपके-चुपके दिल्ली की उड़ान पकड़ ली.
लगता है यह अमित शाह का अगला ऑपरेशन है. ऑपरेशन झारखंड. जो माने नहीं, उसे मानने के लिए मजबूर कर दो. जो झुके नहीं. उसे कमजोर कर दो. झारखंड विधानसभा में भाजपा के पास विधानसभा में बहुमत से चार सीटें कम थीं. अब तक सुदेश महतो की पार्टी आजसू के सहारे सरकार चला रही भाजपा अब आज़ाद होना चाहती है. गठबंधन के फंदे से निकलकर शासन चलाना चाहती है. जब बाबूलाल मरांडी खुद पार्टी विलय करने के लिए तैयार नहीं हुए तो उनकी पार्टी के विधायकों को ही तोड़ लिया गया. छह विधायक भाजपा में शामिल हो जाएंगे तो बाबूलाल के पास बचेंगे सिर्फ दो. एक तीर से दो शिकार हो गए. तीर दिल्ली से चला और रांची की सरकार मजबूत हो गई और बाबूलाल मरांडी ज़मीन पर आ गए.
एक तीर से दो शिकार हो गए. तीर दिल्ली से चला और रांची की सरकार मजबूत हो गई और बाबूलाल मरांडी ज़मीन पर आ गए.
वैसे यह मरांडी की हिम्मत है कि अब भी कहते हैं, 'बाकी बिक गए. मैं नहीं बिकूंगा.' सच भी है. अगर उन्हें बिकना या कुर्सी पर बैठना होता तो आज केंद्र सरकार में मंत्री होते. लेकिन उनकी एक कमजोरी है. वे हर बार आदमी को पहचानने में गलती करते हैं. इस बार भी उन्होंने ऐसे ही लोगों को टिकट दिया जो सिद्धांतों से ज्यादा अवसर में यकीन रखते हैं.
इनमें से एक हैं हटिया के विधायक नवीन जायसवाल. जायसवाल पांच विधायकों के साथ भाजपा में जाने वाले हैं. इसके बदले उन्हें मंत्री बनाया जा सकता है. वे पहले आजसू में थे. आजसू छोड़कर झाविमों में आ गए. चुनाव जीते और अब भाजपा की तरफ रुख कर लिया. दूसरे हैं गणेश गंझू. चतरा के सिमरिया के विधायक. ये भी पहले भाजपा के टिकट से चुनाव लड़ना चाहते थे. जब भाजपा ने टिकट नहीं दिया तो बाबूलाल मरांडी की पार्टी में चले गए. अब फिर भाजपा के दरवाजे पर खड़े हैं. आलोक चौरसिया, रणधीर सिंह, जानकी प्रसाद यादव और अमर कुमार बाउरी भी बाबूलाल मरांडी को छोड़ कर भाजपा में जाने वाले हैं.
भाजपा फिर कहेगी यह तो असली घर वापसी है. जो कार्यकर्ता घर छोड़कर चला गया था, उसे घर बुला लिया. लेकिन क्या दूसरे के घर को जलाकर यह घर वापसी शोभा देती है? खासकर उस पार्टी को जिसके सबसे बड़े नेता देश के प्रधानमंत्री हों?
झारखंड में पहली बार किसी पार्टी को ऐसा जनादेश मिला था. माना जा रहा था कि अपने जन्म से ही आयाराम-गयाराम वाली राजनीति देखते रहे इस राज्य में राजनीतिक स्थिरता आ गई है. लेकिन ये उम्मीदें हवा होती दिख रही हैं. ऐसे में लगता है कि राज्य का वही हाल होगा जो आजतक होता आया है. झारखंड देश का ऐसा राज्य है जहां धन की कमी नहीं, लेकिन नेताओं में ईमानदारी की बेतहाशा कमी है. और दुनिया में विधायक खरीदे जा सकते हैं. ईमानदारी तो कहीं से खरीदी नहीं जा सकती.