'द अपोजिशन' द्वारा आयोजित इस फिल्म फेस्टिवल में सिर्फ प्रतिबंधित फिल्मों को ही प्रदर्शित किया जाएगा
'सिर्फ चार-पांच लोग एक कमरे में बैठकर यह क्यों तय करें कि देश की जनता को क्या देखना चाहिए और क्या नहीं? यह फैसला जनता खुद करे. और यह भी जनता ही तय करे कि कोई फिल्म समाज के लिए अच्छी है या बुरी. सेंसर बोर्ड का यह तय करना बिलकुल गलत है.' इसी सोच पर काम करते हुए 'द अपोजिशन' नाम के एक समूह ने कुछ प्रतिबंधित फिल्मों को जनता तक पहुंचाने का फैसला किया है.
'द अपोजिशन' 11 फरवरी को 'फ्री स्पीच फिल्म फेस्टिवल' का आयोजन करने जा रहा है. यह एक ऐसा फिल्म फेस्टिवल है जिसमें सिर्फ प्रतिबंधित फिल्मों को प्रदर्शित किया जाएगा. दिल्ली के 'गांधी शांति प्रतिष्ठान' में होने जा रहे इस फिल्म फेस्टिवल में कुल तीन फ़िल्में दिखाई जानी हैं. इनमें निर्देशक नकुल सिंह साहनी द्वारा मुज़फ्फरनगर दंगों पर बनाई गई बहुचर्चित फिल्म 'मुज़फ्फरनगर बाकी है' भी शामिल है. इस फिल्म का विरोध कई हिंदूवादी संगठन लंबे समय से करते आए हैं.
इस फेस्टिवल में दिखाई जाने वाली तीसरी फिल्म 'जश्न-ए-आज़ादी' है. निर्देशक संजय काक की यह फिल्म कश्मीर पर आधारित है. इसकी रिलीज़ पर भी सेंसर बोर्ड ने प्रतिबंध लगा दिया था.
'फ्री स्पीच फिल्म फेस्टिवल' का आयोजन पहले 26 जनवरी को रखा गया था. तब यह आयोजन जनपथ स्थित शारदा उकील स्कूल ऑफ आर्ट में होना था. इस फेस्टिवल के आयोजकों में शामिल कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी बताते हैं, 'पिछली बार कार्यक्रम से ठीक एक दिन पहले स्कूल प्रबंधन ने हाथ पीछे खींच लिए थे. उन्हें पहले से बताया गया था कि कौन-कौन सी फ़िल्में हम प्रदर्शित करने जा रहे हैं. वे लोग तैयार भी थे. लेकिन शायद किसी ने उन्हें डरा दिया कि इस आयोजन में कोई विवाद हो सकता है इसलिए उन्होंने आखिरी समय पर इनकार कर दिया.' इस आयोजन के बारे में असीम कहते हैं, 'यह भी विरोध दर्ज करने का ही एक तरीका है. सेंसर बोर्ड की मनमानी के खिलाफ, उनके फैसलों के खिलाफ, उन फिल्मों को देखना-दिखाना जिन्हें वे प्रतिबंधित करना चाहते हैं.'
'विरोध दर्ज करने के अधिकतर तरीके सिर्फ प्रतीकों तक सिमट कर रह गए हैं. हम जंतर-मंतर पर जाते हैं, मोमबत्ती जलाते हैं और लौटकर अपने-अपने घर आ जाते हैं. हालांकि इस विरोध का महत्व भी विरोध न होने से तो कहीं ज्यादा ही लेकिन इससे समस्याओं का समाधान नहीं निकलता.' असीम त्रिवेदी आगे कहते हैं, 'इसीलिए हमने 'द अपोजिशन' बनाने की सोची. एक ऐसा मंच जहां विरोध सिर्फ प्रतीकात्मक न होकर उससे आगे बड़े. जहां समस्याओं के समाधान की ओर बढ़ते हुए कुछ सार्थक कदम उठाए जाएं. हमारे साथ काई कलाकार जुड़े हैं, जो अपनी-अपनी योग्यताओं और क्षमताओं का इस्तेमाल इस उद्देश्य के लिए करेंगे.'
सेंसर बोर्ड द्वारा किसी फिल्म के दृश्यों को काटना या पूरी फिल्म को ही प्रतिबंधित करने को 'द अपोजिशन से जुड़े लोग' सिर्फ फिल्मकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही हनन नहीं मानते बल्कि देश की जनता के अधिकारों का भी हनन मानते हैं. 'एक फिल्मकार को जब कभी वह कहने से रोका जाता है जो वह कहना चाहता हो, तो सिर्फ उस फिल्मकार के अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार ही नहीं मरता. हम सभी लोगों का उस विचार को सुनने, देखने, समझने और तय करने का अधिकार भी मर जाता है कि हमें उस विचार से सहमत होना चाहिए या नहीं.' 'द अपोजिशन' से जुड़े एक कलाकार कहते हैं, 'फ्री स्पीच फिल्म फेस्टिवल' फिल्मकार और दर्शक दोनों के उसी अधिकार को बरकरार रखने की पहल है.'
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इस लिंक या mailus@satyagrah.com के जरिये भेजें.'सिर्फ चार-पांच लोग एक कमरे में बैठकर यह क्यों तय करें कि देश की जनता को क्या देखना चाहिए और क्या नहीं? यह फैसला जनता खुद करे. और यह भी जनता ही तय करे कि कोई फिल्म समाज के लिए अच्छी है या बुरी. सेंसर बोर्ड का यह तय करना बिलकुल गलत है.' इसी सोच पर काम करते हुए 'द अपोजिशन' नाम के एक समूह ने कुछ प्रतिबंधित फिल्मों को जनता तक पहुंचाने का फैसला किया है.
'द अपोजिशन' 11 फरवरी को 'फ्री स्पीच फिल्म फेस्टिवल' का आयोजन करने जा रहा है. यह एक ऐसा फिल्म फेस्टिवल है जिसमें सिर्फ प्रतिबंधित फिल्मों को प्रदर्शित किया जाएगा. दिल्ली के 'गांधी शांति प्रतिष्ठान' में होने जा रहे इस फिल्म फेस्टिवल में कुल तीन फ़िल्में दिखाई जानी हैं. इनमें निर्देशक नकुल सिंह साहनी द्वारा मुज़फ्फरनगर दंगों पर बनाई गई बहुचर्चित फिल्म 'मुज़फ्फरनगर बाकी है' भी शामिल है. इस फिल्म का विरोध कई हिंदूवादी संगठन लंबे समय से करते आए हैं.
अन-फ्रीडम' भी इस कार्यक्रम में दिखाई जानी है. यह फिल्म सेंसर बोर्ड द्वारा 'प्रतिबंधित' कर दी गई थी. इसके लिए ऑस्कर विजेता साउंड डिजाइनर रेसुल पुकुट्टी प्रतिष्ठित गोल्डन रील अवार्ड्स के लिए नामांकित हुए हैंइसके अलावा समलैंगिक संबंधों और एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों पर चर्चा करती निर्देशक राज अमित कुमार की फिल्म 'अन-फ्रीडम' भी इस कार्यक्रम में दिखाई जानी है. यह फिल्म सेंसर बोर्ड द्वारा 'प्रतिबंधित' कर दी गई थी. इसके लिए ऑस्कर विजेता साउंड डिजाइनर रेसुल पुकुट्टी प्रतिष्ठित गोल्डन रील अवार्ड्स के लिए नामांकित हुए हैं.
इस फेस्टिवल में दिखाई जाने वाली तीसरी फिल्म 'जश्न-ए-आज़ादी' है. निर्देशक संजय काक की यह फिल्म कश्मीर पर आधारित है. इसकी रिलीज़ पर भी सेंसर बोर्ड ने प्रतिबंध लगा दिया था.
'फ्री स्पीच फिल्म फेस्टिवल' का आयोजन पहले 26 जनवरी को रखा गया था. तब यह आयोजन जनपथ स्थित शारदा उकील स्कूल ऑफ आर्ट में होना था. इस फेस्टिवल के आयोजकों में शामिल कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी बताते हैं, 'पिछली बार कार्यक्रम से ठीक एक दिन पहले स्कूल प्रबंधन ने हाथ पीछे खींच लिए थे. उन्हें पहले से बताया गया था कि कौन-कौन सी फ़िल्में हम प्रदर्शित करने जा रहे हैं. वे लोग तैयार भी थे. लेकिन शायद किसी ने उन्हें डरा दिया कि इस आयोजन में कोई विवाद हो सकता है इसलिए उन्होंने आखिरी समय पर इनकार कर दिया.' इस आयोजन के बारे में असीम कहते हैं, 'यह भी विरोध दर्ज करने का ही एक तरीका है. सेंसर बोर्ड की मनमानी के खिलाफ, उनके फैसलों के खिलाफ, उन फिल्मों को देखना-दिखाना जिन्हें वे प्रतिबंधित करना चाहते हैं.'
'एक फिल्मकार को जब कभी कुछ कहने से रोका जाता है तो सिर्फ उस फिल्मकार के अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार ही नहीं मरता. हम सभी लोगों का उस विचार को सुनने, देखने, समझने और कुछ तय करने का अधिकार भी मर जाता हैयह फिल्म फेस्टिवल 'द अपोजिशन' द्वारा आयोजित होने वाला पहला ही कार्यक्रम है. 'द अपोजिशन' हाल में बना एक ऐसा समूह है जिसका उद्देश्य गलत सरकारी नीतियों से लेकर उन तमाम सामाजिक प्रथाओं का विरोध करना है, जो लोगों के अधिकारों का हनन करती हैं. इस समूह में कई लेखक, कलाकार, फिल्म निर्देशक और रंगमंच से जुड़े लोग शामिल हैं. 'द अपोजिशन' का गठन मुख्यतः कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी, 'नया पता' फिल्म के निर्देशक पवन कुमार श्रीवास्तव और एक अन्य फिल्मकार मयंक ने किया है.
'विरोध दर्ज करने के अधिकतर तरीके सिर्फ प्रतीकों तक सिमट कर रह गए हैं. हम जंतर-मंतर पर जाते हैं, मोमबत्ती जलाते हैं और लौटकर अपने-अपने घर आ जाते हैं. हालांकि इस विरोध का महत्व भी विरोध न होने से तो कहीं ज्यादा ही लेकिन इससे समस्याओं का समाधान नहीं निकलता.' असीम त्रिवेदी आगे कहते हैं, 'इसीलिए हमने 'द अपोजिशन' बनाने की सोची. एक ऐसा मंच जहां विरोध सिर्फ प्रतीकात्मक न होकर उससे आगे बड़े. जहां समस्याओं के समाधान की ओर बढ़ते हुए कुछ सार्थक कदम उठाए जाएं. हमारे साथ काई कलाकार जुड़े हैं, जो अपनी-अपनी योग्यताओं और क्षमताओं का इस्तेमाल इस उद्देश्य के लिए करेंगे.'
'विरोध दर्ज करने के अधिकतर तरीके सिर्फ प्रतीकों तक सिमट कर रह गए हैं. हम जंतर-मंतर पर जाते हैं, मोमबत्ती जलाते हैं और लौटकर अपने-अपने घर आ जाते हैं''द अपोजिशन' से जुड़े अधिकतर लोग वे हैं जो लंबे समय से अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं. असीम त्रिवेदी स्वयं अन्ना आन्दोलन के दौरान अपने कार्टूनों के चलते गिरफ्तार हुए थे और उसके बाद से ही 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' के पक्ष में चल रही बहस का चेहरा बन गए. इसके बाद भी आईटी अधिनियम की विवादास्पद धारा के खिलाफ चले आंदोलन में असीम और उनके साथी सक्रिय रूप से शामिल रहे. 'द अपोजिशन' का भी मुख्य उद्देश्य ऐसी ही नीतियों और फैसलों का विरोध करना है जो 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' में बाधक हों.
सेंसर बोर्ड द्वारा किसी फिल्म के दृश्यों को काटना या पूरी फिल्म को ही प्रतिबंधित करने को 'द अपोजिशन से जुड़े लोग' सिर्फ फिल्मकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही हनन नहीं मानते बल्कि देश की जनता के अधिकारों का भी हनन मानते हैं. 'एक फिल्मकार को जब कभी वह कहने से रोका जाता है जो वह कहना चाहता हो, तो सिर्फ उस फिल्मकार के अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार ही नहीं मरता. हम सभी लोगों का उस विचार को सुनने, देखने, समझने और तय करने का अधिकार भी मर जाता है कि हमें उस विचार से सहमत होना चाहिए या नहीं.' 'द अपोजिशन' से जुड़े एक कलाकार कहते हैं, 'फ्री स्पीच फिल्म फेस्टिवल' फिल्मकार और दर्शक दोनों के उसी अधिकार को बरकरार रखने की पहल है.'
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