फिल्म : फितूर
निर्देशक : अभिषेक कपूर
लेखक : अभिषेक कपूर, सुप्रतीक सेन
कलाकार : तब्बू, आदित्य राय कपूर, कैटरीना कैफ, मोहम्मद अबरार, तुनीषा शर्मा, राहुल भट्ट, अजय देवगन, लारा दत्ता, तलत अजीज
रेटिंग : 2 / 5
फिल्म के नायक का नाम नूर है लेकिन ‘फितूर’ बेनूर है. फिल्म की नायिका का नाम फिरदौस है जिसके निर्देशक से हमारी एक अरदास है. जिन्हें हिंदी नहीं आती (पढ़ें: कैटरीना) उनसे उर्दू न बुलवाया करें. क्योंकि फिर एक प्यारी भाषा छाती पीट-पीटकर रोने लगती है और हमसे ये देखा नहीं जाता.
हमसे काठ-सा अभिनय भी नहीं देखा जाता जो ‘फितूर’ में आदित्य राय कपूर और कैटरीना कैफ मन लगाकर करते हैं. खूबसूरती आखिर कब तक हमारी फिल्म इंडस्ट्री में अभिनय की कमजोरी को छिपाती रहेगी? इस फिल्म में कैटरीना कैफ लाल बाल और एक खास लाल पोशाक में गजब की खूबसूरत लगती हैं लेकिन एक राई के वजन बराबर भी खूबसूरत अभिनय नहीं करतीं. जो अभिनय वे करती भी हैं वो विज्ञापनों में मुस्कुरा कर दो मिनिट के लिए किया जाने वाला अभिनय ज्यादा लगता है. खराब तलफ्फुज में लिपटा ऐसा सतही और अर्थहीन अभिनय फिर कैसे किसी इंटेंस प्रेम-कहानी में गरमी पैदा कर सकता है, हमें समझ नहीं आता.
यह एक क्लासिक और महान उपन्यास की कमी नहीं है कि उसपर बॉलीवुड बेहतर फिल्म नहीं बना पाया. यह निर्देशन, स्क्रिप्ट और मुख्य नायक-नायिका के अभिनय की कमी ज्यादा है
आदित्य राय कपूर भी फिल्म के लिए गजब का ही कसा हुआ बदन बनाते हैं और आधे-नंगे बदन को दिखाते हुए खूब फबते भी हैं. लेकिन अभिनय इतना सतही करते हैं कि किसी कश्मीरी लड़के की जगह मुंबई के उपनगर बांद्रा के ही आरामपसंद युवा लगते हैं. उनका एक कश्मीरी लड़के से दिल्ली वाला हो जाने का ट्रांस्फॉर्मेशन भी सतही है और वे किरदार में उतरने की जगह उचकते और बिदकते ज्यादा हैं. उच्चारण उनका भी फीका रहता है और उनसे ज्यादा अच्छी कश्मीरी तो फिल्म में उनका बचपन निभाने वाला प्यारा-सा मोहम्मद अबरार ही बोल लेता है.
जाहिर है ऐसा काठ-सा अभिनय करने वाले नायक और नायिका किसी अच्छी फिल्म को भी कबाड़ बना सकते हैं. ‘फितूर’ तो खुद ही एक बढ़िया उपन्यास पर कंडम प्रेम-कहानी कहने के अपराध में सर झुकाए खड़ी फिल्म है.
यह फिल्म हमेशा से दिलचस्पी जगाने वाले एक सवाल का भी जवाब देती है - ‘जो पढ़ने में अच्छा लगता है वो परदे पर देखने में भी अच्छा लगेगा क्या’? ‘फितूर’ शायद इसी सवाल का जवाब ना में देने के लिए बनी फिल्म है. वो चार्ल्स डिकेंस के बढ़िया उपन्यास ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स’ को आमूलचूल परिवर्तन के साथ लगभग हूबहू ही परदे पर उतार देने के उतावलेपन में कहानी को रोचक बनाना भूल जाती है. फिल्म भले ही उपन्यास की कहानी को आज का जामा पहनाने के लिए उसे कश्मीर और दिल्ली की पृष्ठभूमि देती है लेकिन वर्तमान समय के मसले-मसाइलों (खासकर कश्मीर समस्या) पर कभी भी गहरे नहीं उतरती. इसी से समझ भी आता है कि कहानी का कश्मीर में बसा होना सिर्फ फिल्म को सुंदरता का आवरण देने वाला टूल है, कहानी की जरूरत नहीं.
फिल्म उन्हें भी बाकियों की तरह जरूर कुछ सतही संवाद देती है लेकिन त्रासदी की वजह से शातिर हो गई महिला का किरदार कर रहीं तब्बू ऐसी छोटी-मोटी कमियों को कभी भी शिकायत का रूप नहीं धरने देतीं
यह एक क्लासिक और महान उपन्यास की कमी नहीं है कि उसपर बॉलीवुड बेहतर फिल्म नहीं बना पाया (1946 में एक बढ़िया इंग्लिश फिल्म इसी नाम से ब्रिटेन में बनी थी), यह निर्देशन, स्क्रिप्ट और मुख्य नायक-नायिका के अभिनय की कमी ज्यादा है. हालांकि फिल्म खुद को सुखांत बनाने के लिए वह अंत चुनती है जिसका चुनाव डिकेंस साहब ने कहानी लिखते वक्त सबसे पहले किया था लेकिन बाद में उसे हटाकर त्रासदी से सने अंत को उपन्यास के लिए अपनाया था. फिल्म को इससे भी कोई फायदा नहीं मिलता क्योंकि उसकी प्रेम-कहानी ही बर्फ-सी मरी हुई है. एक वक्त बाद नायक आर्टिस्ट नहीं मानसिक रोगी ज्यादा लगता है और नायिका अपनी मां और प्रेमी के बीच फंसे होने वाले उस अंतरद्वंद को परदे पर उतार पाने में असफल नजर आती है जो डिकेंस साहब के उपन्यास की एक प्रमुख थीम थी.
इन सारी कमियों के बीच तब्बू कमाल करती हैं. अगर वे नहीं होतीं तो ‘फितूर’ हमारे लिए पूरी तरह से खाली एक फिल्म होती. फिल्म उन्हें भी बाकियों की तरह जरूर कुछ सतही संवाद देती है लेकिन त्रासदी की वजह से शातिर हो गई महिला का किरदार कर रहीं तब्बू ऐसी छोटी-मोटी कमियों को कभी भी शिकायत का रूप नहीं धरने देतीं. सिर्फ उन्ही की वजह से यह फिल्म खालिस सोना है. भले ही कुछ देर के लिए ही सही!
‘फितूर’ के पास एक अच्छा दर्शनीय हिस्सा भी है. नायक-नायिका के बचपन को दिखाता फिल्म का शुरुआती हिस्सा जिसमें दो प्यारे बच्चे मिलकर इतनी रूमानियत भर देते हैं कि उसके बोझ तले आदित्य और कैट पूरी फिल्म में दबे रहते हैं
‘फितूर’ की सिनेमेटोग्राफी भी काबिले-तारीफ है. अनय गोस्वामी का कैमरा कश्मीर की अद्भुत खूबसूरती पकड़ता है और धुंध सने अंधेरों को भी उतनी ही निर्ममता से दिखाता है जितनी निर्ममता से तब्बू के अवसाद को. प्रोडक्शन डिजाइन भी उम्दा है और फिल्म अपना परिवेश चाहे दिल्ली हो या कश्मीर, हमेशा सही और सच्चा रखती है. अमित त्रिवेदी के ‘पश्मीना’ जैसे कुछ गीतों का फिल्म बेहतरीन उपयोग करती है, हालांकि कई गीतों को वह बिना छुए ही निकल जाती है. फिल्म में गजल गायक तलत अजीज भी छोटी-सी भूमिका में हैं. काश कि वे गजल गायक की भूमिका में ही होते औऱ बढ़िया सी एक गजल फिल्म में सुना देते तो मजा ही आ जाता.
‘फितूर’ के पास एक अच्छा दर्शनीय हिस्सा भी है. नायक-नायिका के बचपन को दिखाता फिल्म का शुरुआती हिस्सा जिसमें दो प्यारे बच्चे मिलकर इतनी रूमानियत भर देते हैं कि उसके बोझ तले आदित्य और कैट बाकी की पूरी फिल्म में दबे रहते हैं. मोहम्मद अबरार और तुनिषा शर्मा के बचपन वाले प्यार की बराबरी आदित्य और कैट अपने जवानी वाले प्यार से पूरी फिल्म में कहीं नहीं कर पाते. अफसोस!  फिल्म के लिए भी और एक क्लासिक उपन्यास के बालीवुड में यूं फना हो जाने पर भी.