कोलकता का पुस्तक मेला शायद भारत का सबसे बड़ा पुस्तक-मेला है. बरसों पहले, जब यह मैदान में लगता था, मैं अपनी कविताओं के बांग्ला अनुवाद - आकाशतृणेलीन - के लोकार्पण के अवसर पर पहली बार वहां गया था. इतनी भीड़ थी कि सीधे चलना दूभर था. कुछ बरसों से उसका स्थानांतर शहर के अधिक खुले मिलन मेला परिसर में हो गया है. यह काफ़ी खुली जगह है और अब इसके अंतर्गत एक कोलकता साहित्य समारोह भी आयोजित होता है. गांधीवादी चिंतक त्रिदीप सुहृद और रंगकर्मी अमोल पालेकर के साथ उसका उद्घाटन करने का सुयोग मिला.कुछ विलंबित लेकिन अतिसंक्षिप्त उद्घाटन की औपचारिकता के बाद बांग्ला कथाकार संजीव चट्टोपाध्याय और प्रोफसर सुहृद् के साथ ‘सहिष्णु भारत में असहिष्णुता’ विषय पर एक संवाद में हिस्सा लिया. इधर प्रायः हरेक साहित्य समारोह में असहिष्णुता पर चर्चा हो रही है जिससे स्पष्ट है कि यह मुद्दा लगातार प्रासंगिक और उत्तेजक बना हुआ है. लेकिन प्रो. सुहृद् ने इस ओर ध्यान दिलाया कि इस सारी बहस ने कुछ अधिक महत्वपूर्ण मुद्दों को कहीं हाशिए पर न ढकेल दिया हो. उन्होंने स्पष्ट कहा कि ऐसे दो मुद्दे हैं गरीबी और असमानता तथा दिन-प्रतिदिन होती हिंसा के प्रति हमारी बढ़ती असंवेदनशीलता.
बरसों पहले जब ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा बहुत चालू था तो हमारे एक व्यंग्यकार ने तमककर पूछा था कि 'हटाएं तो पर कहां ले जाएं?' उत्तर था - 'पिछवाड़े ताकि कम से कम सामने दिखाई न दे'
मुझे लगता है कि यह एक अच्छी चेतावनी है. बरसों पहले जब ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा बहुत चालू था तो हमारे एक व्यंग्यकार ने तमककर पूछा था कि 'हटाएं तो पर कहां ले जाएं?' उत्तर था - 'पिछवाड़े ताकि कम से कम सामने दिखाई न दे.' इस समय ग़रीबी एक तरह से बहस और ध्यान के हाशिए पर फिंक गई है. सामाजिक असमानता तेज़ी से बढ़ रही है फिर भी हम दौलत बढ़ाने के सभी प्रयत्नों को रीझे हुए देख रहे हैं. इसको ध्यान में लिए बगैर कि बहुत सारी दौलत इस समय ग़रीबों को उनके हक़-ज़मीन-जंगल आदि से वंचित करने से पैदा हो रही है. भारत में दौलत, ज्यादातर, कठोर हृदय है और वह अपनी सामाजिक और नैतिक ज़िम्मेदारी से तब तक बचती है जब तक कि उसे क़ानून या हालात की भयावहता और हिंसा विवश न कर दें. क़ानून भी, इस मामले में, मंदगति और प्रायः अपनी पेचीगियों की गिरफ़्त में होने के कारण अनुदार ही है.
अन्य समारोहों की तरह इस समारोह में भी अंग्रेज़ी का वर्चस्व था. कोलकता में हिंदी भाषी कई लाखों में हैं लेकिन एक भी सत्र हिंदी में नहीं था. कोलकता का एक भी हिंदी लेखक समारोह में कहीं नज़र नहीं आया. कुछ बांग्ला लेखकों से चर्चा हुई और यह इरादा बना कि एक ऐसा समारोह कहीं करना चाहिए जो अंग्रेज़ी को छोड़कर भारतीय भाषाओं पर ही एकाग्र हो. अंग्रेज़ी अगर हमें साथ नहीं लेती तो हम ही उदारतावश उसे साथ क्यों लें, इस तर्क में कुछ बल तो है!


केरल साहित्य समारोह : समकालीनता को समय और भारतीयता को इकहरेपन में नहीं समेटा जा सकता
कोलकता से एक लंबी उड़ान, जो कि दो चरणों की ऊब में पूरी हो पायी, भरकर केरल की साहित्यिक राजधानी माने जानेवाले शहर कोषिकोड़ पहुंचा. वहां डीसी बुक्स द्वारा आयोजित पहले केरल साहित्य समारोह में शिरकत करने का अवसर मिला. समुद्रतट पर एक परिसर में आयोजित इस समारोह में कई पुराने मित्रों फिल्मकार अडूर गोपालकृष्णन्, मलयालम कवि के सच्चिदानंदन आदि से मुलाक़ात हुई.
एक सत्र में समकालीन भारतीय कविता पर विचार हुआ. वाग्मी (अच्छे वक्ता) सच्चिदानंद संवाद का नियोजन कर रहे थे और इसमें ‘समकालीनता’ और ‘भारतीयता’ दोनों को ही प्रश्नांकित किया गया.
समकालीनता के संदर्भ में यह विचार सामने आया कि अलग-अलग जगहों का समय अलग-अलग होता है, भले पंचांग में वह एक हो. दिल्ली का समय और उसका अहसास इलाहाबाद के समय और अहसास से अलग होता है. हम अकसर इस अंतर की अनदेखी करते हैं जबकि यह गति, लय आदि की भिन्नता बन जाता है. हम सामान्यीकृत समय में कम, सजीव समय में अधिक रहते हैं जो भिन्नताओं से भरेपूरे हैं.
यह अवधारणा भी सामने आई कि यदि कोई पुराना कवि या कृति हमें आज भी उद्वेलित और अभिभूत करती है तो वह हमारी समकालीन हो जाती है. इसलिए हमें समकालीनता को निरे समय की अवधारणा से मुक्त कर देना चाहिए.
भारतीयता एक जटिल मामला है और उसे किसी इकहरे ढंग से बरतने-समझने से हमारी बहुलता खंडित या विकृत हो सकती है. समानताओं पर बल देने के साथ-साथ भिन्नताओं पर आग्रह करना चाहिए. अनेक भिन्नताओं के समावेश से ही तथाकथित भारतीयता अधिक प्रामाणिक होती है.
भारतीयता एक जटिल मामला है और उसे किसी इकहरे ढंग से बरतने-समझने से हमारी बहुलता खंडित या विकृत हो सकती है. समानताओं पर बल देने के साथ-साथ भिन्नताओं पर आग्रह करना चाहिए
केरल साहित्य समारोह
केरल साहित्य समारोह
तमिल से आईं दो लेखिकाओं में अप्रत्याशित वैचारिक उग्रता थी. उनके वक्तव्यों से लगा कि वहां भाषा और साहित्य दोनों में जातिप्रथा का कड़ा शिकंजा है और उससे मुक्ति समकालीन कविता का केंद्रीय संघर्ष और सरोकार है. भाषा में जाति वर्चस्व और वर्जनाएं इस क़दर घुसी हुई हैं कि व्याकरण के कई प्राचीन ग्रंथ तक जातीय वर्चस्व की संहिताओं के रूप में देखे जा रहे हैं. पड़ोसी राज्य कर्नाटक में तो पिछले दिनों अदालत के कहने पर यह जानने के लिए एक समिति बनाई गई है कि रामायण के रचयिता वाल्मीकि की जाति क्या है?
एक वक्ता ने अंग्रेज़ी में लिखने का एक औचित्य यह बताया कि उसमें लिखने से जातीय वर्चस्व से सहज ही मुक्त रहा जा सकता है. मलयालम के एक कवि ने, दूसरी तरफ़, इशारा किया कि उनके समकालीन साहित्य में जातिगत पूर्वाग्रह और वर्चस्व के प्रयत्न क़तई नहीं हैं. जाति और धर्म के आधार पर सृजन और विचार दोनों ही पूरी तरह से ग़ायब हैं. यों तो सामान्यीकरण से साहित्य को हमेशा ही बचना होता है लेकिन हमारे समय में विभिन्न भाषाओं में स्थितियां एक-दूसरे से खासी अलग हैं और उन्हें एक साथ एकीकृत ढंग से देखना उचित और प्रामाणिक नहीं होता.
सभी सत्रों में श्रोताओं की संख्या अच्छी-खासी थी और बहुत सारे सत्र पूरी तरह से मलयालम में ही थे. श्रोताओं और प्रश्नकर्ताओं में युवाओं की भारी शिरकत उत्साहवर्द्धक थी. एक बड़े प्रकाशक की पहल पर किए गए इस समारोह से यह सबक सीखा जा सकता है कि हमारे कई प्रकाशक मिलाकर ऐसा ही साहित्य समारोह हिंदी में कर सकते हैं. अगर वे चाहें और हिम्मत जुटाएं!
यों तो सामान्यीकरण से साहित्य को हमेशा ही बचना होता है लेकिन हमारे समय में विभिन्न भाषाओं में स्थितियां एक-दूसरे से खासी अलग हैं और उन्हें एक साथ एकीकृत ढंग से देखना उचित और प्रामाणिक नहीं होता



प्रकाश साव : एक युवा आत्महत्या, जिसके बचे हुए को सहेजना हमारी जिम्मेदारी है
हिंदी के प्रतिभाशाली कवि और कुशाग्र आलोचक प्रकाश साव ने कुछ दिनों पहले, अब तक अज्ञात कारणों से, आत्महत्या कर ली. वे केंद्रीय हिंदी संस्थान में कार्य करते थे और वहां का लगातार अन्याय और बौद्धिक शोषण अरसे से उन्हें संत्रस्त करता था. वहां के अधिकारी अपने व्याख्यान, संपादकीय आदि उनसे लिखवाते और अपने नाम से प्रकाशित-प्रसारित करते थे. वे प्रकाश का बेवजह सार्वजनिक मज़ाक भी जब-जब बनाते थे.
प्रकाश कभी-कभार मुझसे मिलते थे और यह सब बातें बताते थे. उन्हें संस्थान छोड़कर दिल्ली रज़ा फ़ाउंडेशन में आने का प्रस्ताव भी मैंने किया था. वे श्रीकान्त वर्मा पर एक पुस्तक लिखने का प्रयत्न कर रहे थे और उन्हें फ़ाउंडेशन की ओर से इस काम के लिए फ़ैलोशिप देने का निश्चय भी हो गया था. वे इस बारे में सारा पत्राचार अपने आगरा के पते पर नहीं, घर के पते पर कोलकता भेजने का आग्रह करते थे क्योंकि संस्थान को पता चल गया तो वह और नाराज़ हो सकता था.
पिछली बार जब वे मिले थे तो अपनी कविताओं की एक पांडुलिपि, भूमिका लिखने के लिए मुझे दे गए थे. उनका काव्यस्वर युवा कवियों में बहुत अलग था हालांकि उनका बौद्धिक संस्कार वामपंथी था. वे साहित्य का पाठ तन्मयता और खुले दिमाग़ से करते थे. मैं बहुत कृतज्ञ हूं कि उन्होंने एक पूरी पुस्तक मेरे साहित्य पर लिखी, जिसमें उन सभी आरोपों और आपत्तियों का साक्ष्य के साथ विश्लेषण और कई बार निराकरण किया गया है जो मुझ पर बरसों से लगते रहे हैं.
दुर्भाग्य से वे अब नहीं हैं और उनका छोटा सा परिवार बचा है जिसमें पत्नी और छह बरस का एक बच्चा है. अनेक युवा बन्धुओं को चिंता है कि इस परिवार के लिए कुछ स्थायी किया जाए. उनके बचे हुए लिखे को सहेजना ज़रूरी है. उसे जल्दी ही ठीक से प्रकाशित करने की ज़िम्मेदारी हम नैतिक कर्तव्य की तरह निभाएंगे. रज़ा फ़ाउंडेशन ने युवा कवियों और युवा आलोचकों की महत्वपूर्ण कृतियों को प्रकाशित किए जाने के लिए ‘प्रकाश वृत्ति’ नाम से एक सहायतानुदान योजना शुरू करने का निश्चय भी किया है.
उनकी पांडुलिपि ‘आवाज में झरकर’ से कुछ कवितांश:
प्रार्थना थोड़ी ज़्यादा थी करने वाला थोड़ा कम
करने वाला और भी कम-कम होता जाता था
...
आकाश के जल में दूर से फूल-पत्ते और टहनियां बहती आती थीं एक जलता हुआ दिया और समय बहता आता था
बहते हुए आकाश में प्रकाश की निश्चिंत बहता था
अचानक जल का रेला आता था आकाश को बहा ले जाता था
आकाश के अनुपस्थित होते ही नीचे विस्मय में ठहरी नदी फिर बहने लगती थी!