पहले कहा गया कि जेएनयू के छात्र 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे. फिर यह कि एबीवीपी के लोग उन्हें बदनाम करने के लिए ऐसा कर रहे थे. सच्चाई यह है कि बातें ये दोनों ही गलत हैं.
जवाहर लाल नेहरु विश्वद्यालय (जेएनयू) में चल रहा हालिया विवाद लगातार गरमा रहा है. इसकी शुरुआत बीती 9 फरवरी को हुई थी. इस दिन यहां एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. भारतीय संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू की फांसी के अलावा इस कार्यक्रम के एजेंडे में कश्मीर से जुड़े तमाम मसलों पर चर्चा भी शामिल थी.
9 फ़रवरी 2013 को अफज़ल गुरु को फांसी हुई थी जिसके बाद से हर साल जेएनयू में ऐसे आयोजन किये जाते रहे हैं. इस साल हुए आयोजन में कुछ छात्रों ने कथित देशविरोधी नारे भी लगाए जिसके चलते यह मामला लगातार विवादों से घिरता चला गया.
कुछ समय बाद इसी वीडियो की एक और व्याख्या सामने आई. इसमें 'जिंदाबाद-जिंदाबाद' कहते छात्रों के चेहरे चिन्हित किये गए
राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में पिछले कुछ दिनों से सबसे ऊपर बना हुआ यह मामला अब पुलिस के संज्ञान में है. लेकिन इसका एक पहलू और भी है. वह है उस 'मीडिया ट्रायल' का जो इस मामले में काफी हद तक गलत आधारों पर ही चलाया जा रहा है. जेएनयू में हुए कार्यक्रम पर आज जो भी बहस चल रही है, उसका आधार कुछ ऐसे वीडियो हैं जिनमें कुछ लोग कथित तौर पर देश विरोधी नारे लगाते नज़र आ रहे हैं. लेकिन इन्हें गौर से देखने-सुनने पर साफ़ होता है कि इनमें वह बात है ही नहीं जिसके होने का दावा कई मीडिया चैनल लगातार करते रहे हैं.
उदाहरण के तौर पर कुछ मीडिया चैनलों ने एक वीडियो(नीचे देखें) के आधार पर दावा किया था कि जेएनयू में देशविरोधी नारे लगाते हुए कई छात्र 'पाकिस्तान जिंदाबाद' चिल्ला रहे थे. इन चैनलों ने अपना दावा मजबूत करने के उद्देश्य से वीडियो में सुनाई देती आवाजों की ट्रांसक्रिप्ट भी हमारे सामने रखी थी.
टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक में छा चुके इस वीडियो को पहले तो जेएनयू के छात्रों के खिलाफ जमकर इस्तेमाल किया गया. हजारों लोगों ने इसे शेयर करते हुए जेएनयू के छात्रों पर 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगाने के आरोप लगाए. लेकिन कुछ समय बाद इसी वीडियो की एक और व्याख्या सामने आई. इसमें 'जिंदाबाद-जिंदाबाद' कहते छात्रों के चेहरे चिन्हित किये गए, उनकी पहचान की गई और बताया गया कि ये तो 'अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्' (एबीवीपी) के लोग हैं. इस व्याख्या के अनुसार एबीवीपी के छात्र जानबूझकर आयोजन में शामिल लोगों के बीच घुस कर उन्हें बदनाम करने के लिए 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे. जितनी तेजी से पहले जेएनयू के वामपंथी संगठन लोगों के निशाने पर आए थे, उतनी ही तेजी से अब एबीवीपी के छात्र भी लोगों के निशाने पर आ गए.
जब इस कार्यक्रम के आयोजक अफज़ल गुरु को हुई फांसी के चलते भारतीय न्याय व्यवस्था पर सवाल उठा रहे थे तो एबीवीपी के छात्रों ने इसका विरोध करते हुए 'भारतीय कोर्ट जिंदाबाद' के नारे लगाए
एक ही वीडियो की दो तरह से व्याख्या की गई. पहली व्याख्या के अनुसार जेएनयू के कुछ 'देशद्रोही' छात्र 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे. जबकि दूसरी व्याख्या के अनुसार एबीवीपी के लोग वामपंथी छात्रों को बदनाम करने के लिए 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे. हकीकत यह है कि यह दोनों ही व्याख्याएं गलत हैं और 'पाकिस्तान जिंदाबाद' जैसे नारे लगने के कोई भी सबूत कम से कम इस वीडियो से तो नहीं मिलते.
हुआ यह था कि जब इस कार्यक्रम के आयोजक अफज़ल गुरु को हुई फांसी के चलते भारतीय न्याय व्यवस्था पर सवाल उठा रहे थे तो एबीवीपी के छात्रों ने इसका विरोध करते हुए 'भारतीय कोर्ट जिंदाबाद' के नारे लगाए. लेकिन काफी शोर-शराबे में लगाये जा रहे इन नारों को पहले तो कुछ चैनलों ने 'पाकिस्तान जिंदाबाद' में बदल दिया और फिर कुछ लोगों ने इसे एबीवीपी की साजिश बता दिया.
जेएनयू के इस हालिया विवाद में जितने भी वीडियो सामने आए हैं, उन्हें देखते हुए इससे पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि वहां आपत्तिजनक नारे लगाए गए थे. लेकिन यह मामला उन समाचार चैनलों की लापरवाही भी उजागर करता है जिन्होंने 'भारतीय कोर्ट जिंदाबाद' जैसे नारों को भी 'पाकिस्तान जिंदाबाद' बताकर प्रसारित किया.
यह मामला उन समाचार चैनलों की लापरवाही भी दिखाता है जिन्होंने 'भारतीय कोर्ट जिंदाबाद' जैसे नारे को भी 'पाकिस्तान जिंदाबाद' बताकर प्रसारित किया.
नीचे दिया गया वीडियो मूलतः एक चैनल द्वारा दिखाया गया था और बाद में जिसके आधार पर एबीवीपी पर भी षड्यंत्र के आरोप लगाए गए. इस वीडियो को ध्यान से सुनने पर समझा जा सकता है कि 'पाकिस्तान जिंदाबाद' जैसा नारा, जो कभी लगाया ही नहीं गया, कैसे कई विवादों का कारण बन गया.

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