मद्रास हाई कोर्ट में जस्टिस सीएस कर्नन ने खुलेआम भारत के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर के खिलाफ एफआईआर का आदेश देने की धमकी भी दी है. मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस सीएस कर्नन ने शीर्ष न्यायपालिका को उलझन में डाल दिया है. जस्टिस कर्नन ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश पर स्टे लगा दिया. जस्टिस कर्नन का तबादला कलकत्ता हाईकोर्ट में हो चुका है. भारत के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अगुवाई वाली एक खंडपीठ ने चेन्नई में उनके अदालती काम-काज पर भी रोक लगा दी थी. लेकिन कर्नन ने सोमवार को इस आदेश पर स्थगनादेश जारी कर दिया. यही नहीं, द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की और धमकी दी कि वे स्थानांतरण आदेश जारी करने के लिए ठाकुर सहित दो जजों के खिलाफ एससीएसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने का आदेश देंगे.
चीफ जस्टिस ठाकुर के अलावा जस्टिस कर्नन ने अपने आदेश की प्रतियां राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कानून मंत्री सदानंद गौड़ा और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी भेजी हैं.
इसके कुछ घंटे बाद शीर्ष अदालत ने कर्नन का आदेश रद्द कर दिया. पीटीआई के मुताबिक अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को फिर से निर्देश दिया कि विवादित न्यायाधीश को कोई काम नहीं दिया जाना चाहिए. शीर्ष अदालत ने कहा कि तबादले के बाद भी कर्नन ने जो प्रशासनिक और न्यायिक आदेश दिए वे स्थगित किए जाते हैं.
चीफ जस्टिस ठाकुर के अलावा जस्टिस कर्नन ने अपने आदेश की प्रतियां राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कानून मंत्री सदानंद गौड़ा और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी भेजी हैं. एक प्रति राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग को भी भेजी गई है. प्रेस कॉन्फ्रेंस में कर्नन का कहना था, 'मुझे सिर्फ न्यायिक कामकाज से रोका गया है. मेरी न्यायिक शक्तियां तो मेरे पास ही हैं. मैं इस मामले का खुद संज्ञान लेकर चेन्नई शहर के पुलिस कमिश्नर को आदेश दूंगा कि वे दो जजों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करें.'
जस्टिस कर्नन ने अपने कई सहयोगी जजों पर गंभीर आरोप लगाए. उनका कहना था कि वे व्यवस्था में जातिगत भेदभाव के शिकार हुए हैं. उनका कहना था कि जब उन्होंने कुछ जजों के खिलाफ आरोप लगाए तो वे जवाब देने के बजाय उनके खिलाफ आदेश पारित कर रहे हैं. कर्नन ने यह भी धमकी दी कि अगर उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे किसी ऐसे देश चले जाएंगे जहां ऐसा भेदभाव न होता हो.
जस्टिस कर्नन ने अपने कई सहयोगी जजों पर गंभीर आरोप लगाए. उनका कहना था कि वे व्यवस्था में जातिगत भेदभाव के शिकार हुए हैं.
जब उनसे पूछा गया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने वाले अपने आदेश की प्रति उन्होंने सोनिया गांधी को क्यों भेजी तो कर्नन का जवाब था कि वे विपक्ष की नेता हैं और उनके समर्थन में आवाज उठाएंगी. रामविलास पासवान और मायावती को आदेश की प्रतियां भेजे जाने पर कर्नन ने कहा कि वे समुदाय के नेता हैं जो दूसरे सांसदों के साथ उनकी आवाज संसद में उठाएंगे. एक संवाददाता ने उनसे यह भी पूछा कि क्या उनकी इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की खबर प्रकाशित करना अदालत की अवमानना होगा. इस पर उनका कहना था कि वे एक आदेश जारी करके सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को प्रिंट और इलेक्टॉनिक मीडिया के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई न करने का निर्देश देंगे.
2011 में जस्टिस कर्नन पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आए थे. तब वे अपने सहयोगी जजों के खिलाफ उत्पीड़न और भेदभाव का आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग चले गए थे. अब उनके इस नए कदम ने शीर्ष न्यायपालिका को फिर दुविधा में डाल दिया है.