मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने कभी एक शेर में सवाल किया था - ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू का ही शायर था, उर्दू पे सितम ढाकर ग़ालिब पे करम क्यों है. सितम तो खैर आज हर हिंदुस्तानी भाषा पर हो रहा है लेकिन 18वीं सदी में पैदा हुए मिर्ज़ा असदउल्ला बेग ख़ान यानी मिर्जा गालिब 21वीं सदी में भी उतने ही मौजूं हैं .

मिर्जा ग़ालिब सिर्फ कहने को उर्दू के शायर हैं. असल में ग़ालिब हिंदी के भी शायर हैं और इस लिहाज से वे सबके शायर हैं. वे इश्क की भी बात करते हैं और खुदा की भी. जो भी कहते थे सबके दिल पर घर करता था, असर करता था. इसीलिए उर्दू के चर्चे भले ख़ास मौके पर हों मगर ग़ालिब सदाबहार हैं. ख्यात व्यंगकार शरद जोशी ने कभी अपने लेख में चुनौती दी थी कि आज का कोई भी युवा ग़ालिब के किसी भी शेर को आउटडेटेड बता दे. ग़ालिब अपने कहे में हमेशा के लिए अप-टू-डेट हैं. आज होते तो सोशल मीडिया के जमाने में भी पूरे चांस हैं कि ट्रेंडिंग लिस्ट में टॉप पर होते.

हालांकि फिलवक़्त जब सोशल मीडिया पर पोस्ट किया हुआ आधे से ज्यादा माल कॉपी राईट के जख्मों का मारा हुआ होता है तो चचा ग़ालिब का यहां सर्वाइव कर पाना थोड़ा मुश्किल भी नजर आता है. फिर अगर यह मान लें कि चचा ग़ालिब आज के दौर में पैदा हुए होते तो अव्वल तो उन्हें फेसबुक रास ही न आता. अगर हमारी मिन्नतें मानकर वो फेसबुक पर आ भी जाते तो लाइक्स कमेंट के भंवर में ऐसे उलझते कि जितना हम चांदनी चौक की गलियों में न उलझें. दूसरा यह, ग़ालिब की साफगोई उन्हें लोगों की फ्रेंडलिस्ट से ज्यादा ब्लॉकलिस्ट में जगह दिलवा रखती.

ऐसा भी कोई है जो ग़ालिब को न जाने, शायर तो वो अच्छा है पर ब्लू टिक नहीं है. चचा माफ़ करें उनके शेर को बिगाड़ने के लिए लेकिन, वे फेसबुक पर होते तो पहली समस्या यही आ सकती थी कि जब उनका प्रोफाइल ही वेरीफाइड नहीं है तो हम उन्हें गालिब कैसे मानें. उन्नीसवीं सदी में भले संचार के साधन इतने पुर-रफ़्तार न थे फिर भी गालिब के लिए मशहूर होना इतना मुश्किल न था जितना अब है. तब हुनर से लोग मकबूल होते थे. अब मार्केटिंग और पीआर से होते हैं. अब जब अकाउंट ही वेरीफाइड न हो पाता तो उनको कोई ग़ालिब क्यों मानता? कैसे मानता?

गालिब के सेलेब्रिटी बनने में दूसरी समस्या ये आ जाती कि कोई कूल मोनू या रॉकर रॉकी उनके अशआर उठाकर गर्लफ्रेंड के इनबॉक्स में चिपका रहा होता.

गालिब के सेलेब्रिटी बनने में दूसरी समस्या यह आ जाती कि कोई कूल मोनू या रॉकर रॉकी उनके अशआर उठाकर गर्लफ्रेंड के इनबॉक्स में चिपका रहा होता. इससे भी बच जाते तो किसी अदने से फेसबुक पेज का एडमिन उनके शेर को जेपीजी फॉर्मेट में बदल कर अपना बना चुका होता. जाने कितने फेसबुक पेज, रेडियो प्रोग्राम और न्यूज वेबसाइट के कॉलम ग़ालिब के शेरों पर पल रहे होते कि खुद ग़ालिब न जान पाते. जब जान ही न पाते कि उनका लिखा कहां तक पहुच गया है तो कुछ कर पाने की तो बात ही दूर है. 

ग़ालिब के आने से सिर्फ ग़ालिब को तकलीफ नहीं उठानी पड़ती. ‘मेरी कलम से’ टाइप के पेजों के लिए सबसे ज्यादा समस्या हो जाती. सबको पता चल जाता कि दिलफरेब कवितायें लिखने वाले ये पेज एडमिन कच्चा माल कहां से उठा रहे हैं.ग़ालिब के बारे में ये भी कहा जाता है कि हर रात हाथ में एक कपड़े का टुकड़ा थामे अपने ख्यालों से खेलते रहते थे. जैसे ही किसी शेर का खाका उनके मन में तैयार हो जाता था तो वे उस कपडे में एक गांठ लगा देते थे. सुबह उस गांठ को खोलते-खोलते एक नया शेर तैयार होता था. अपनी इतनी तेज याददाश्त पे इतराते ग़ालिब सुबह उसे कागज़ पर उकेर देते. अब सोचिये आज के दौर के ग़ालिब के दिल में जैसे ही ख़याल आता वे फेसबुक लॉग इन करते और धाड़ से स्टेटस अपडेट कर देते. सुबह को उठते तो भूल चुके होते कि रात गए कुछ लिखा भी था. लाइक्स के नोटिफिकेशन देखकर याद आ भी जाता तो इतरा न पाते. वैसे भी 13 घंटों बाद 13 लाइक्स देखकर किसे ख़ुशी होती है भला?

ग़ालिब के आने से सिर्फ ग़ालिब को तकलीफ नहीं उठानी पड़ती. ‘मेरी कलम से’ टाइप के पेजों के लिए सबसे ज्यादा समस्या हो जाती.

एक मुश्किल गालिब को लिखने में भी आती कि जब वो कलम-कागज़ लिए अपने स्टडी टेबल पर बैठे होते तभी कहीं से कोई न्यूज चैनल वाला उनका मोबाइल घुनघुना देता. कहता, चचा ग़ालिब फलां डिबेट में पैनलिस्ट बनकर आ जाइए या असहिष्णुता पर बाइट दे दीजिये. फिर भी उम्मीद है कि ग़ालिब उन लोगों का मुंह जरूर बंद कर देते जो ये पूछते रहते हैं कि ये बताओ चौरासी में कहां थे? ग़ालिब उनसे उल्टा सवाल कर सकते थे कि तुम ही बताओ 1857 में कहां थे.

ग़ालिब के खतों में वे शिकायत करते हुए मिलते हैं, ‘अक्सर ऐसा होता है कि मेरे नाम पर किसी और का कलाम लोग पढ़ देते हैं.’ ग़ालिब की ये समस्या आज की तारीख भी हल न होती. आज फेसबुक फॉलोअर उनके शेर उठाते और उनके मीम्ज बनाकर वायरल कर चुके होते और वे अपने डाइनिंग रूम में बैठे कुढ़ते रह जाते. लोगों को ये समझाने में ग़ालिब को दांतों पसीने आ जाते कि हर वो शेर जिसमें ऐ ग़ालिब लिखा हो वो उनका नहीं है.

एक बार ग़ालिब से पूछा गया कि इंसान को मोहब्बत शादी के पहले करनी चाहिए या शादी के बाद करनी चाहिए. तो चचा ग़ालिब ने कहा कि मियां मोहब्बत चाहो तो शादी के पहले करो या चाहो तो शादी के बाद, ये बात उतनी जरूरी नहीं है जितनी जरूरी ये बात है कि जब भी करो बीवी को पता नहीं लगना चाहिए. ये किस्सा बताता है कि ग़ालिब हास्य यानी ह्यूमर के मामले में लाजवाब थे. यह किस्सा इसलिए सुनाया जा रहा है कि ग़ालिब अगर शायरी में फ्लॉप हो जाते तो भी उनके पास एक विकल्प था कि वे किसी वन लाइनर वाले पेज के एडमिन बन सकते थे.