जेएनयू से जुड़ा विवाद लगातार तूल पकड़ता जा रहा है. देश भर के हजारों छात्र और शिक्षक जेएनयू के समर्थन में सड़कों पर उतर रहे हैं. लेकिन इनमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) के छात्र शामिल नहीं हैं. इस पूरे मामले पर उनकी क्या राय है, जेएनयू छात्र संघ के जॉइंट सेक्रेटरी और 14 साल बाद जेएनयू की अकादमिक काउंसिल में एबीवीपी की वापसी करवाने वाले सौरभ शर्मा बता रहे हैं
जेएनयू को निशाना बनाए जाने के खिलाफ हजारो छात्र, शिक्षक और देश-विदेश के कई संस्थान प्रदर्शन कर रहे हैं. सिर्फ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) ही इसमें शामिल नहीं है. क्या आपको नहीं लगता कि जेएनयू का बचाव करना सही है?
हम लोग बिलकुल जेएनयू के साथ खड़े हैं. हम सबसे अपील भी करना चाहते हैं कि पूरे जेएनयू को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का गढ़ न कहा जाए. चंद मुट्ठी भर लोग, जिन्होंने देशविरोधी नारे लगाए, हम उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग करते हैं. लेकिन उनके कारण पूरे संस्थान को बदनाम करना सरासर गलत है. जेएनयू हमेशा से एक बेहतरीन संस्थान रहा है और आज भी है.
जेएनयू को बचाने के बहाने उन दोषियों को बचाने की भी बात हो रही जिन्होंने देश को तोड़ने वाले नारे लगाए. हम इसके खिलाफ हैं.
तो आप लोग जेएनयू के तमाम छात्रों-शिक्षकों के साथ क्यों नहीं हैं?
क्योंकि जेएनयू को बचाने के बहाने उन दोषियों को बचाने की भी बात हो रही जिन्होंने देश को तोड़ने वाले नारे लगाए. हम इसके खिलाफ हैं. हम जेएनयू के साथ हैं, लेकिन उनके नहीं जो देशविरोधी नारे लगाते हैं.
सौरभ शर्मा
सौरभ शर्मा
यह पहला मौका नहीं है जब इस तरह के कार्यक्रम जेएनयू में आयोजित किये गए हों. पिछले साल भी नौ फरवरी को ऐसा ही एक कार्यक्रम हुआ था. क्या आपने तब भी पुलिस में इसकी शिकायत की थी.
ऐसे कार्यक्रम पहले भी हुए हैं और हमने तब भी इसका विरोध किया था. लेकिन पिछले साल तक ऐसे कार्यक्रम बहुत छोटे स्तर पर होते थे. कुछ लोग मिलकर किसी मेस में या किसी हॉल में ऐसे आयोजन करते थे. पिछले साल भी हमने इन लोगों का विरोध किया था. हमने शिकायत भी की थी जिस पर एक जांच टीम का गठन भी किया गया था. इसके बावजूद कार्रवाई नहीं हुई. एफआईआर की जहां तक बात है, पिछले साल मैंने नहीं की थी. तब मैं छात्रसंघ प्रतिनिधि भी नहीं था. इस बार जब इन्होंने इस तरह खुलेआम नारे लगाए और विरोध के बावजूद भी ये नहीं माने तो हमने पुलिस में इनकी रिपोर्ट दर्ज की.
यहां वैसे भी राष्ट्रवादी विचार रखने वाले छात्रों से भेदभाव होता रहा है. मुझे लगता है कि इन तीनों छात्रों ने इसी डर से इस्तीफा दिया है कि कहीं ये लोग उनका भविष्य न खराब कर दें.
जेएनयू विवाद के चलते एबीवीपी आपस में ही टूटने लगी है. कल ही तीन पदाधिकारियों ने संगठन से इस्तीफा दे दिया है. उनका कहना है कि सरकार जिस तरह से इस मामले से निपट रही है, उससे वे सहमत नहीं हैं. उनका यह भी कहना था कि कुछ लोग राष्ट्रवाद के नाम पर गुंडागर्दी पर उतर आए हैं. आप इस पर क्या कहेंगे?
वे तीनों लोग हमारे युवा कार्यकर्ता हैं और स्कूल ऑफ़ सोशल साइंस के छात्र हैं. यह जो आंदोलन आज जेएनयू में चल रहा है उसे मुख्यतः इस स्कूल के छात्र और शिक्षक चला रहे हैं. इस स्कूल में वैसे भी राष्ट्रवादी विचार रखने वाले छात्रों से भेदभाव होता रहा है. मुझे लगता है कि इन तीनों छात्रों ने इसी डर से इस्तीफा दिया है कि कहीं ये लोग उनका भविष्य न खराब कर दें. ये इन लोगों की दादागिरी का एक और प्रमाण है.
लेकिन उन छात्रों ने अपनी इच्छा से इस्तीफ़ा दिया है. उन्होंने साफ़ कहा है कि हम ऐसी सरकार का मुखपत्र बकर नहीं रह सकते. उनकी नाराजगी का कारण स्मृति इरानी का छात्रों के प्रति रवैय्या और रोहित वेमुला मामले में सरकार की लापरवाही भी रहा है. फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि उन्होंने दबाव में फैसला लिया है?
अभी तक हमारे संगठन के पास उनका कोई पत्र नहीं आया है. हम लोग उन छात्रों से बात करेंगे.
इस पूरे मामले में जितने भी वीडियो सामने आए हैं उनमें कहीं भी कन्हैया किसी भी तरह के आपत्तिजनक नारे लगाते नहीं दिख रहे. इसीलिए पूरा जेएनयू ही नहीं बल्कि देश-विदेश के कई छात्र और शिक्षक उनकी रिहाई की मांग को लेकर सडकों पर हैं. आपको नहीं लगता कि कन्हैया को गलत फंसाया जा रहा है.
यह कहना सही नहीं है कि कन्हैया को गलत फंसाया जा रहा है. जिन लोगों ने नारे लगाए उनके बीच कन्हैया भी मौजूद थे. कन्हैया ने उन्हें नहीं रोका. वे चाहते तो हमारे साथ मिलकर उन लोगों का पूरा विरोध करते.
यह कहना सही नहीं है कि कन्हैया को गलत फंसाया जा रहा है. जिन लोगों ने नारे लगाए उनके बीच कन्हैया भी मौजूद थे. कन्हैया ने उन्हें नहीं रोका.
विरोध न करना अलग बात है और स्वयं भी विवादास्पद नारे लगाना अलग. हाल में आई आईबी की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि कन्हैया नारे लगाने वालों में शामिल नहीं थे. न ही उनका नाम उन आयोजकों में शामिल हैं जिन्होंने यह कार्यक्रम आयोजित किया था. ऐसे में आपको नहीं लगता कि उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाना गलत है.
बिलकुल गलत नहीं है. मैं नहीं जानता कि आईबी ने किस आधार पर ऐसा कहा है. लेकिन मैं अपने पूरे होश में कहता हूं कि कन्हैया ने भी भारत-विरोधी नारे लगाए थे. उसका वीडियो भले ही हम नहीं बना सके लेकिन मैंने कन्हैया को नारे लगाते देखा भी और सुना भी.न्यायालय में गवाही के लिए यदि मुझे बुलाया जाएगा तो भी मैं कहूंगा कि उन्होंने नारे लगाए थे.
हजारों छात्र और शिक्षक आज जेएनयू को बचाने के लिए सड़कों पर हैं. एबीवीपी उनके साथ है या नहीं?
एबीवीपी उनके साथ नहीं है जो नारे लगाने वालों को बचाना चाहते हैं. एबीवीपी सिर्फ उनके साथ है जो देश को बचाने के लिए खड़े हैं.