उपचुनाव की 3 में से 2 सीटें जोरदार तरीके से जीतने के समाजवादी पार्टी के पास असंख्य कारण थे. इसके बावजूद वह बुरी तरह से हारी है तो यह उसकी बहुत बड़ी नाकामी और आने वाले चुनाव के लिए साफ संकेत भी हैं.
12 फरवरी को उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 2015-16 का बजट पेश करते हुये मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बहुत विश्वासपूर्वक कहा था कि अगला बजट भी मैं ही पेश करूंगा. मुख्यमंत्री के इस बयान का मतलब था कि अखिलेश यादव को इस बात का पूरा भरासा है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भी उन्हीं की पार्टी की जीत होनी है. लेकिन इसके सिर्फ तीन दिन बाद ही आए विधानसभा चुनाव के नतीजों के संकेत कुछ और ही कह रहे हैं. समाजवादी पार्टी ने उपचुनाव की तीन में से दो सीटें गंवा दी हैं. उससे एक सीट बीजेपी ने तथा एक सीट कांग्रेस ने छीनी है.
उत्तर प्रदेश में आम तौर पर विधानसभा उपचुनावों को सत्ताधारी पार्टी का चुनाव माना जाता है. यहां समाजवादी पार्टी की सरकार का अब तक हुये उपचुनावों में जिस तरह का एकतरफा प्रदर्शन रहा है उससे भी इसी बात की पुष्टि होती है. इसलिये इस बार भी माना जा रहा था कि महज 10-11 महीनों के लिये हो रहे इन उपचुनावों में भी समाजवादी पार्टी का ही एकतरफा परचम लहरायेगा. इसके कुछ और कारण भी थे.
मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बढ़ी साम्प्रदायिकता की आंच के कारण समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों को यकीन था कि इस इलाके में मुस्लिम वोट उनके पक्ष में ध्रुवीकृत हो गये हैं.
सबसे पहला कारण तो यही था कि इन तीनों सीटों पर पहले से ही समाजवादी पार्टी का कब्जा था. दूसरा, इन तीनों सीटों पर उपचुनाव विधायकों के निधन के कारण हो रहे थे और समाजवादी पार्टी ने उन्हीं विधायकों के परिवार के सदस्यों को ही चुनाव मैदान में उतारा था. इसलिये सहानुभूति लहर का पूरा-पूरा फायदा भी समाजवादी पार्टी को ही मिलना था. चूंकि मुजफ्फरनगर और देवबंद की सीटों के विधायक क्रमशः राजेन्द्र सिंह राणा और चितरंजन स्वरूप निधन के समय तक अखिलेश सरकार में मंत्री थे और मंत्री रहने के दौरान उनका क्षेत्र की जनता से ठीकठाक संपर्क भी था इसलिए भी लगता था कि इन सीटों पर सपा को ही विजय मिलने वाली है.
इन चुनावों में सपा को इसलिए भी जीतना चाहिए था क्योंकि वह लगातार दावा कर रही थी कि उसने राज्य को विकास की दौड़ में बहुत आगे पहुंचा दिया है और अपने चुनावी घोषणा पत्र में किये गये सारे वायदों को चार वर्ष में ही पूरा कर दिया है. सपा को जीत की उम्मीद इसलिए भी थी कि बीएसपी इन उपचुनावों से पहले ही किनारा कर चुकी थी और कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी की तैयारियां आधी-अधूरी थीं. कांग्रेस का तो राज्य में अभी संगठन ही ठीक से बन नहीं सका है और बीजेपी भी नया प्रदेश अध्यक्ष चुनने की उधेड़बुन में है.
लेकिन चुनाव नतीजों ने समाजवादी पार्टी को जोर का झटका देते हुये विधानसभा चुनाव से पूर्व सबसे बड़ी नसीहत दे दी है. समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में यादव-मुस्लिम वोट बैंक को अपना आधार वोट मानती आई है. लेकिन मुजफ्फरनगर और देवबंद में इस वोट बैंक का झुकाव उसके खिलाफ जाता दिखाई दिया है. यह बात इसलिये और महत्वपूर्ण हो जाती है कि इन उपचुनावों में औसत मतदान 47 फीसदी से कम हुआ था और सहानुभूति लहर वाले उपचुनावों में कम मतदान का सीधा लाभ सहानुभूति पाने वाले पक्ष को ही जाता है ऐसा पारंपरिक चुनावी ज्ञान कहता है.
इन तीनों सीटों पर उपचुनाव विधायकों के निधन के कारण हो रहे थे और समाजवादी पार्टी ने उनके परिवार के सदस्यों को ही चुनाव मैदान में उतारा था.
हालांकि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव पहले ही इस बात के लिये पार्टी के नेताओं और मंत्रियों को चेता चुके थे कि वे उपचुनावों के लिये पूरी मेहनत और जी जान से जुट जाएं. मगर उनकी यह चेतावनी भी काम नहीं आई और उपचुनाव के नतीजों ने पार्टी को कड़वी हकीकत से रूबरू करवा दिया. देवबंद और मुजफ्फरनगर की सीट की पराजय समाजवादी पार्टी के लिये बहुत बड़ी चेतावनी है क्योंकि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बढ़ी साम्प्रदायिकता की आंच के कारण समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों को यकीन था कि इस इलाके में मुस्लिम वोट उनके पक्ष में ध्रुवीकृत हो गये हैं.
लेकिन देवबंद में कांग्रेस ने जो सेंधमारी की है उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि मुस्लिम मतदाता अपने भले-बुरे की पहचान, राजनीतिक दलों के नेताओं से कही अलग और अच्छे तरीके से कर सकता है. इसका एक और उदाहरण फैजाबाद की बीकापुर विधानसभा सीट ने भी दिया है, जहां एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी के सारे जोड़-तोड़ धरे रह गये. उनके दलित उम्मीदवार के सहारे बनाए दलित मुस्लिम गठजोड़ के प्रयोग की भी जनता ने नकार दिया. चुनाव से पहले ओवैसी की सभाओं में भारी भीड़ तो दिखती थी मगर उनका उम्मीदवार इस दलित बहुल इलाके में 12000 वोट भी नहीं पा सका.
इन उपचुनावों के नतीजों के साथ साथ समाजवादी पार्टी के लिये एक और चुनौती पैदा हो रही है. कई मुस्लिम धर्मगुरूओं और नेताओं की ओर से समाजवादी पार्टी की नीयत पर सवाल उठाये जाने लगे हैं. लखनऊ में शिया धर्मगुरू कल्बे जव्वाद तो शिया वक्फ बोर्ड को लेकर आजम खान और समाजवादी पार्टी के खिलाफ खुलकर लड़ ही रहे हैं. जामा मस्जिद वाले बुखारी भी समाजवादी पार्टी की नीतियों पर सवाल उठाने लगे है. सबसे ताजा मामला मेरठ में कुछ दिन पहले हुई ‘हुसूले इंसाफ कांफ्रेंस’ का है. जमीयत उलेमाए हिन्द की ओर से हुये इस जलसे में एक लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ थी जो हिन्दुस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रही थी. इस जलसे में फिरकापरस्ती के खिलाफ खूब बोल बोले गये और जमीयत के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना सैयद महमूद मदनी ने कहा कि ‘लोगों को बेवकूफ बनाकर सत्ता कब्जाने वाले यह गलतफहमी न पालें कि हर बार ऐसा ही होगा.’
चुनाव से पहले ओवैसी की सभाओं में भारी भीड़ तो दिखती थी मगर उनका उम्मीदवार इस दलित बहुल इलाके में 12000 वोट भी नहीं पा सका.
मदनी का कहना था कि 'हम किसी हुकूमत का विरोध नहीं कर रहे पर सूबे के हाकिमों ने मुसलमानों को 18 फीसदी आरक्षण देने का वायदा किया था तो उसे तो पूरा करें. हमें पता था वह झूठा वायदा था. चुनावी छलावा था.’ एक स्थानीय इंजीनियरिंग कालेज के प्राध्यापक आफरान हुसैन कहते हैं कि ‘हां यह हकीकत है कि मुसलमान नागरिकों का एक बड़ा तबका यह समझने लगा है कि उनको वोट बैंक के नाम पर भीड़ बनाकर इस्तेमाल किया जाता है, पर उनको बेहतरी के लिये कुछ नहीं किया जाता. अखिलेश सरकार के चुनावी बजट ने भी लोगों को निराश किया है.’
इन हालातों में यह तो दिखता है कि समाजवादी पार्टी के लिये मुस्लिम नाराजगी को दूर कर पाना एक बड़ी चुनौती होगी, लेकिन अगर इसके लिये सांप्रदासिकता का कार्ड खेला गया तो यह उत्तर प्रदेश की जनता के लिये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा. नोएडा जाने में शुभ-अशुभ के अंधविश्वास से डरने वाले अखिलेश यादव को अब इससे भी डर लग रहा होगा कि 2006 में अपने पिछले कार्यकाल का अंतिम उपचुनाव (भदोही) हारने के बाद उनके पिता की सत्ता में वापसी नहीं हो सकी थी. और इन उपचुनावों के परिणाम भी बताते हैं कि इस बात की पूरी-पूरी संभावना है कि तीन सीटों पर हुये ये उपचुनाव अखिलेश सरकार के लिए भी वैसे ही साबित हो सकते हैं.