वे बहुत बूढ़े और अशक्त हो गये हैं. बिना सहारे वे चल-फिर नहीं सकते. उन्हें बोलने-सुनने में कठिनाई होती है. वे मुश्किल से चलकर अपने स्टूडियो में पहुंच पाते हैं. पर एक बार ईजल पर रखे कैनवास के सामने पहुंचते ही उनमें अजस्र सिसृक्षा (रचने की असीमित इच्छा) जाग उठती है. उनकी नज़र कम़जोर हो गयी है पर पता नहीं कैसे उनकी उंगलियां मानो आंखें बन जाती हैं और वे ब्रश से कैनवास पर बिल्कुल अप्रत्याशित रंग लगाने लगते हैं. अपने सुपरिचित संयम से, कलाकौशल से अब वे बंधे नहीं है. उन्होंने अपने लिए अब स्वतंत्रता का एक नया परिसर रच लिया है. वे अपनी शैली में सहज ही ऐसा कुछ कर रहे हैं जो अनोखा और नया है. वे सैयद हैदर रज़ा हैं जो आज 94 वर्ष के हो गए हैं.

अपने सुपरिचित संयम से, कलाकौशल से अब वे बंधे नहीं है. उन्होंने अपने लिए अब स्वतंत्रता का एक नया परिसर रच लिया है. वे अपनी शैली में सहज ही ऐसा कुछ कर रहे हैं जो अनोखा और नया है

अकेले इस चौरानवें वर्ष में बनाये उनके चित्रों की तीन प्रदर्शनियां दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में आयोजित हैं. शायद ही विश्व में इतनी वय (उम्र) का कोई दूसरा कलाकार हो जो पिछले एक वर्ष में इतने चित्र बनाकर प्रदर्शित कर रहा हो. रज़ा के यहां अब जीवन और कला के बीच की दूरी लगभग समाप्त हो चुकी है. उनके लिए जीना और चित्र बनाना अब दो नहीं एक ही संयुक्त क्रिया बन गये हैं. वे अपनी कला मे ही अपनी कला के लिए ही जीवित हैं. कला को कोई जीवन इससे अधिक दिव्य और टिकाऊ उपहार शायद ही दे सकता है.

रज़ा बहुत कुछ भूल गये हैं: उनके लम्बे जीवन की कई घटनाएं, कई जगहें और कई लोग फिर भी उन्हें याद आते रहते हैं. जैसे विस्मृति के अंधेरे में कुछ ज्योतियां कौंधती है, कुछ दीप-शिखाएं जब-तब बल उठती हैं और उनका आलोक रज़ा को अनुप्राणित कर जाता है. हालांकि रज़ा बोलने में हमेशा कम विश्वास करते रहें हैं उन्होंने तीन भाषाओं हिंदी, फ्रेंच और अंग्रेजी में कुछ लिखा है. उसका एक संचयन ‘सीईंग बियॉण्ड’ शीर्षक से प्रकाशित हो रहा है.

‘एकाग्रता, चिंतन और साधना से ही आत्मविश्वास हो सकता है’, मानने वाले इस चित्रकार ने दर्ज़ किया था कि ‘समय कम है. शब्द नहीं मिलते हैं. अतल शून्य की अनंतता को कौन समझ सकता है. इसलिए चाहता हूं... मैं न बोलूं, चित्र बोलें.’ उन्होंने भोपाल उत्सव 1978 में भाग लेने के बाद लिखा था - ‘कला रचना के लिए बड़े धैर्य की आवश्यकता है. एक निरंतर संवाद होना चाहिए, मन और जीवन के बीच, दैनिक कार्य के साथ. प्रकृति बड़ी विराट है, हमारी समझ कितनी कम. ज्ञान हमें किसी दूरी तक ले जा सकता है. फिर एक क्षण आता है जब मन आकाश में प्रकृति के दृश्य नहीं, प्रकृति ही दिखायी देती है.’

अकेले इस चौरानवे वर्ष में बनाये उनके चित्रों की तीन प्रदर्शनियां दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में आयोजित हैं. शायद ही विश्व में इतनी वय (उम्र) का कोई दूसरा कलाकार हो जो पिछले एक वर्ष में इतने चित्र बनाकर प्रदर्शित कर रहा हो.

रज़ा ने यह भी लिखा है: ‘कला कर्म एक विचित्र उन्माद है. ... रूप से अतिरूप तक अनेक अपरिचित सम्भावनाएं हैं जहां सत्य छिपा है. निस्सन्देह बुद्धि, तर्क और व्यवस्थित उन्माद के शिखर पर बसी दिव्य शक्ति ही कलाकर्म का सर्वश्रेष्ठ साधन हैं.’

रज़ा इतनी उम्र में इसी अन्तर्ज्योति के विमल आलोक में सृजनरत हैं- उनका हर चित्र संसार का गुणगान, एक प्रार्थना है जो सिर्फ़ उनके ही अनूठे रंगों में सुनी-देखी जा सकती है.