जब सुरेश प्रभु को रेल मंत्री बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाए थे तो लोगों को उनसे काफी उम्मीदें थीं. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में बिजली मंत्री के तौर पर उन्होंने सभी को खासा प्रभावित किया था. इसी को ध्यान में रखते हुए नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली पसंद डीवी सदानंद गौड़ा को छह महीने में ही हटाकर रेल मंत्रालय का जिम्मा सुरेश प्रभु को सौंप दिया था.

प्रभु ने अपने पहले रेल बजट में जब किसी नई रेलगाड़ी की घोषणा नहीं की तो उस वक्त लोगों ने कहा भी था कि ये नई तरह के रेल मंत्री हैं और रेलवे की सेहत सुधारकर ही रहेंगे. जिस तरह के लक्ष्य पिछले रेल बजट में उन्होंने तय किए थे, उनसे भी ऐसी उम्मीदें जगी थीं. लेकिन साल भर बाद जब प्रभु अपना दूसरा और मोदी सरकार का तीसरा रेल बजट पेश करने वाले हैं तो पता चल रहा है कि पिछले बजट में तय किए गए लक्ष्य कहीं पीछे छूट गए हैं. ऐसे में इस बजट में रेल मंत्री को बीमार रेलवे को सेहतमंद बनाने के लिए कुछ कदम उठाने की न सिर्फ घोषणा करनी होगी बल्कि इनके क्रियान्वयन की स्पष्ट रूपरेखा भी पेश करनी चाहिए.

इसका मतलब यह हुआ कि रेलवे को होने वाली हर 100 रुपये की आमदनी पर 120 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. इससे रेलवे की माली हालत का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है

परिचालन औसत में सुधार

परिचालन औसत का मतलब यह है कि रेलवे को जो आमदनी होती है, उसका कितना हिस्सा उसे खुद को चलाने पर खर्च करना पड़ता है. 2014-15 में यह 91.8 फीसदी था. इसका मतलब यह हुआ कि रेलवे को जो 100 रुपये की आमदनी हो रही थी, उसमें से 91.8 रुपये इसे चलाने पर खर्च हो रहे थे. पिछले बजट में प्रभु ने इसे घटाकर 88.5 फीसदी पर लाने का लक्ष्य रखा था. अब जब वे 2016—17 का रेल बजट पेश करेंगे तो आधिकारिक तौर पर मालूम चलेगा कि 2015-16 में परिचालन औसत कितना रहा.

पूर्व रेल मंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा है उसमें उन्होंने दावा किया है कि भारतीय रेलवे का परिचालन औसत 2015-16 में बढ़कर 120 फीसदी हो गया है. इसका मतलब यह हुआ कि रेलवे को होने वाली हर 100 रुपये की आमदनी पर 120 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. इससे रेलवे की माली हालत का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. हालांकि, कई जानकार ऐसे भी हैं, जिन्हें लगता है कि पिछले साल का परिचालन औसत 120 फीसदी से भी ज्यादा हो चुका है. यह हालत तब है जब इस एक साल में किसी न किसी बहाने यात्री किरायों में कई बार बढ़ोतरी की गई. ऐसे में अगर सुरेश प्रभु वाकई चाहते हैं कि रेलवे की सेहत सुधरे तो उन्हें परिचालन औसत को कम करने की न सिर्फ घोषणा करनी चाहिए बल्कि अपने बजट में वह रोडमैप भी रखना चाहिए जिसके जरिए इस लक्ष्य को हासिल किया जा सके.

यातायात राजस्व बढ़ाना

नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद से रेल में सफर करने वाले यात्रियों की जेब पर काफी बोझ बढ़ा है. सरकार बनने के महीने भर के अंदर रेलवे ने यात्री किराये में 14.2 फीसदी और माल भाड़े में 6.5 फीसदी की बढ़ोतरी की थी. 2015-16 के बजट में सेवा कर 12.36 फीसदी से बढ़ाकर 14 फीसदी करने और फिर बाद में इस पर 0.5 फीसदी सेस यानी उपकर लगाने से भी रेलवे के एसी दर्जों का किराया 4.35 फीसदी तक बढ़ गया. नवंबर में ही रेलवे ने टिकट रद्द कराने के नियमों में भी ऐसे बदलाव किये कि हर क्लास का टिकट रद्द कराने का प्रभार अब दुगना हो गया है. अब अगर चार घंटे पहले तक टिकट कैंसिल नहीं कराया तो रेलवे आपको आपकी टिकट का एक रुपया भी वापस नहीं देने वाली. इसके कुछ ही दिनों बाद रेलवे ने यह निर्णय लिया कि 5 से 12 साल के उन बच्चों से 1 अप्रैल, 2016 से पूरा किराया वसूला जाएगा जिनके लिए बर्थ बुक करायी जाती है. पहले इसके लिए आधा किराया देना होता था. इसी कड़ी में रेलवे ने तत्काल शुल्क बढ़ाने का फैसला भी कर लिया.

पिछले रेल बजट में सुरेश प्रभु ने यातायात राजस्व में 17 फीसदी बढ़ोतरी का लक्ष्य रखा था. अनुमान है कि इस दौरान यातायात राजस्व में सिर्फ छह फीसदी की ही बढ़ोतरी हो सकी है.

इतना करने के बावजूद रेलवे को यातायात से होने वाली आमदनी उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी. पिछले रेल बजट में सुरेश प्रभु ने यातायात राजस्व में 17 फीसदी बढ़ोतरी का लक्ष्य रखा था. अनुमान है कि इस दौरान यातायात राजस्व में सिर्फ छह फीसदी की ही बढ़ोतरी हो सकी है. इसका मतलब यह हुआ कि उन्होंने यातायात के जरिए जितनी आमदनी का लक्ष्य रखा था, रेलवे उससे 17,000 करोड़ रुपये कम ही कमा सकी. जानकारों का मानना है कि बार-बार यात्री किराये और माल भाड़े में की गई बढ़ोतरी के बावजूद अगर यातायात से होने वाली आमदनी अपेक्षाकृत नहीं बढ़ पा रही है तो कहीं न कहीं कोई ऐसी गड़बड़ी हो रही है जिसकी पहचान जरूरी है. ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि इस समस्या के समाधान के लिए इस बार के रेल बजट में सुरेश प्रभु क्या कहते-करते हैं.

आमदनी के नए स्रोत

रेलवे के कामकाज को समझने वाले जो भी लोग हैं, वे सब मानते हैं कि सिर्फ यातायात राजस्व ​पर निर्भर होकर रेलवे की स्थिति नहीं सुधारी जा सकती है. लंबे समय से आमदनी के वैकल्पिक माध्यम तलाशने की बातें न सिर्फ रेलवे को समझने वाले लोग कर रहे हैं बल्कि रेल मंत्रालय की विभिन्न समितियों की रपटों में भी इस बात का जिक्र होता रहा है. इसके बावजूद इस मोर्चे पर अब तक कुछ खास होता दिखा नहीं.

ऐसे में सुरेश प्रभु के सामने यह चुनौती है कि वे रेलवे की सेहत सुधारने के लिए यातायात राजस्व के अलावा दूसरे विकल्पों को इस्तेमाल करने के मोर्चे पर कितना कुछ कर पाते हैं. सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने की वजह से रेलवे के खर्चे आने वाले दिनों में और भी बढ़ने वाले हैं. ऐसे में सुरेश प्रभु को इस खतरे का अहसास होगा कि परिचालन औसत जो अभी ही शायद 120 फीसदी के करीब है आने वाले समय में और बढ़ने वाला है. इस बजट पर कई लोग यह जानने के लिए भी टकटकी लगाए हुए हैं कि वित्तीय प्रबंधन में माहिर माने जाने वाले सुरेश प्रभु इस समस्या से निपटने के लिए किस तरह की रूपरेखा देश के सामने रखते हैं. कुछ जानकार रेलवे की खाली पड़ी जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल को आमदनी बढ़ाने का अहम औजार बताते हैं.

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने की वजह से रेलवे के खर्चे आने वाले दिनों में और भी बढ़ने वाले हैं. ऐसे में सुरेश प्रभु को इस खतरे का अहसास होगा कि परिचालन औसत जो अभी ही शायद 120 फीसदी के करीब है आने वाले समय में और बढ़ने वाला है

निवेश में बढ़ोतरी

रेलवे की सभी समस्याओं की जड़ पैसों की कमी को बताया जाता है. इस वजह से न तो बुनियादी ढांचा मजबूत हो रहा है और न ही घोषणाओं पर क्रियान्वयन हो पा रहा है. सुरेश प्रभु ने पिछले रेल बजट में अगले पांच साल के लिए जो लक्ष्य तय किए थे उनमें एक यह था कि रेलमार्गों की लंबाई 1.14 लाख किलोमीटर से बढ़ाकर 1.38 लाख किलोमीटर की जाएगी. भारतीय रेल के लिए जिस तरह का तकनीकी सुधार और विकास जरूरी है, वह पैसे की कमी के कारण नहीं हो पा रहा है. जानकार बताते हैं कि दुनिया के प्रमुख देशों का रेलतंत्र तकनीकी मोर्चे पर नए बदलावों के दौर गुजर रहा है लेकिन भारत में इस मोर्चे पर कुछ खास नहीं हो रहा है. सुरक्षा संबंधी जो उपकरण दूसरे देशों में सालों पहले से इस्तेमाल किए जा रहे हैं उससे भारत अभी भी अछूता है. और वजह पैसे की कमी को बताया जाता है.

ऐसे में रेलवे के लिए सरकारी ढांचे के बाहर से होने वाला निवेश बेहद अहम है. सुरेश प्रभु को जब रेल मंत्री बनाया गया था तो उस वक्त यह भी कहा गया था कि नरेंद्र मोदी ने देश के बाहर प्रभु की साख की वजह से उन्हें यह जिम्मेदारी दी है और मोदी को यह भरोसा है कि प्रभु की वजह से रेलवे में निवेश आएगा. लेकिन इस मोर्चे पर भी रेलवे को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली है.

पिछले बजट से इस बजट के बीच एक दौर ऐसा भी आया जब इस तरह की खबरें आने लगीं कि रेलवे में अपेक्षित निवेश नहीं होने की वजह से मोदी सुरेश प्रभु से नाराज हैं. रेलवे के बुनियादी ढांचे और सुरक्षा क्षेत्र में सरकार ने 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी दे दी है लेकिन फिर भी निवेशकों ने अब तक इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है. निवेशकों ने दिलचस्पी अगर रेलवे की किसी परियोजना में दिलचस्पी दिखाई है तो वह है बुलेट ट्रेन परियोजना. हालांकि, दिल्ली मेट्रो परियोजना के प्रमुख रहे ई श्रीधरन जैसे कई जानकारों ने बुलेट ट्रेन परियोजना के औचित्य पर ही सवाल उठाया है.

अगर सुरेश प्रभु इस दिशा में कुछ कर सकें तो आम लोगों की जिंदगी बेहद आसान हो जाएगी और इससे उन्हें और उनकी सरकार को जबर्दस्त वाहवाही मिल सकती है. ऐसा करके वे यात्री किरायों में की गई बढ़ोतरी को भी सही ठहरा सकते हैं.

सेवाओं का स्तर सुधारना

जब भी रेल किराये में बढ़ोतरी की जाती है तो सरकार की तरफ से दो तर्क प्रमुखता से दिए जाते हैं. पहला यह कि रेलवे बहुत घाटे में है और दूसरा यह कि ये फैसले बेहतर सेवाओं के लिए किए जा रहे हैं. यात्री किराये और माल भाड़े में बढ़ोतरी के बावजूद रेलवे की माली हालत क्या है, इसका जिक्र इस रिपोर्ट में पहले ही किया गया है. यहां बात करते हैं रेलों की हालत की. रेलवे की सेवाओं के स्तर से आज शायद ही कोई रेल यात्री खुश होगा. ट्रेनों का देर से अपने गंतव्य तक पहुंचना और गंदगी, भारतीय रेल के पर्याय बन चुके हैं. ट्रेनों का लेट चलना पहले ज्यादातर सर्दियों में ही होता था लेकिन अब इसका कोई मौसम नहीं रहा.

अगर सुरेश प्रभु इस दिशा में कुछ कर सकें तो आम लोगों की जिंदगी बेहद आसान हो जाएगी और इससे उन्हें और उनकी सरकार को जबर्दस्त वाहवाही मिल सकती है. ऐसा करके वे यात्री किरायों में की गई बढ़ोतरी को भी सही ठहरा सकते हैं.

फिलहाल तो रेलवे की दूसरी सेवाओं के स्तर में भी कोई खास सुधार नहीं दिखता. जिन ट्रेनों को प्रीमियम श्रेणी का माना जाता है, उनमें भी गंदगी से यात्री परेशान हैं. जिस महामना एक्सप्रेस की चमचमाती कोचों और आधुनिक सुविधाओं का प्रचार रेल मंत्रालय ने किया, उसकी हकीकत यह है कि उसमें सफर करने या यों कहें कि इन आधुनिक सुविधाओं के लिए सामान्य ट्रेनों के मुकाबले 15 फीसदी अधिक किराया देना पड़ता है. ट्रेन में और स्टेशन पर खाने-पीने की चीजों की गुणवत्ता से लेकर मनमानी कीमत वसूले जाने से भी यात्री काफी परेशान हैं. इन परेशानियों को दूर करने के उपाय करके रेल मंत्री प्रभु के पास रेल यात्रियों को बड़ा सौगात देने का मौका है.