सत्ता यह न कहे कि वह उन्मादियों के साथ नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करे कि गुमसुम और चुप रह कर वह उन्मादियों के पक्ष में न दिखे. सिर्फ़ न्याय करना ही ज़रूरी नहीं है. यह भी ज़रूरी है कि आप न्याय करते हुए दिखें.

‘राष्ट्रवाद’ देशप्रेम का पर्याय नहीं है. और सरकार की नीतियों से सहमत होना या प्रेम करना देश से प्रेम करने के बराबर नहीं होता. सरकार तो देश के कई अंगों में से सिर्फ़ एक अंग है. सरकार को देश समझना और न समझने पर ज़बरन समझाना मूर्खता और तानाशाही से बिल्कुल भी कम नहीं. आखिर लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाएगा जब नागरिकों को असहमत होने का अधिकार ही न हो? लोकतंत्र के आधार में ही मानवता की आज़ादी है.

देश में सरकार है. संसद है. अदालतें हैं. पुलिस है. कानून है. फिर भी एक भीड़ जो हिंसा और अधूरी जानकारी से प्रेरित है, को यह तय करने की आज़ादी कैसे दी जा सकती है कि आरोपी असल में दोषी है भी या नहीं?

राष्ट्रवाद को कई नज़रों से पढ़ा और समझा गया है. कुछ ने इसे ‘उचक्कों की शरणस्थली’ भी कहा है तो रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसकी तुलना ‘फन फैलाए अज़गर’ से की है. केंद्र सरकार की अगुवाई करने वाली पार्टी ‘राष्ट्रवाद’ को अपना ध्येय और रास्ता दोनों मानती है जबकि इसी पार्टी ने संसद पर हमले के दोषी अफज़ल गुरु को ‘शहीद’ मानने वाली पीडीपी से समझौता कर जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाई. यही पार्टी पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे को माफ़ी देने के पक्षधर शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन कर पंजाब में सत्ता सहयोगी है.

क्या एक संप्रभु देश के किसी प्रान्त के मुख्यमंत्री की हत्या करना देशद्रोह नहीं है? क्या अदालत द्वारा घोषित आतंकवादी को शहीद मानने वाली पार्टी से गठबंधन करना देशद्रोह नहीं है? सवाल यह है कि कौन तय करेगा कि हमारी या आपकी कौन सी गतिविधि देशद्रोह है. यह देशप्रेम? क्या किसी विश्वविद्यालय के गेट पर तिरंगा लेकर लोगों या राजनीतिक-वैचारिक विरोधियों को मारना देशप्रेम है? पहले यह ही क्यों नहीं स्पष्ट कर लिया जाता कि आखिर देशद्रोह की परिभाषा क्या है. क्या एक विश्वविद्यालय में स्वतंत्र शैक्षणिक वाद-विवाद को भी देशद्रोह ही माना जाएगा? क्या एक देश के तौर पर हम अपने बच्चों को यह आज़ादी न दें कि वे निर्भय होकर अपने देश या समाज के विवादित से विवादित और अधिकतम से अधिकतम संवेदनशील विषयों पर खुलकर बहस कर सकें?

क्या हमारा राष्ट्रवाद इतना घबराया हुआ और कमजोर है कि वह चंद लोगों के भड़काऊ नारों से डगमगा जाएगा? सवाल यह भी है कि कौन तय करेगा कि हमारी या आपकी कौन सी गतिविधि देशद्रोह है.

यदि ऐसा है तो हमें तुरंत इन सारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को बंद कर देना चाहिए. क्योंकि शिक्षा का मतलब ही सत्यता की खोज है और जब यह मकसद ही पूरा न हो तो कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का क्या औचित्य रह जाएगा? हम क्यों न इन्हें बंद कर दें? हमें रोशनी बुझा देनी चाहिए. दरवाजें और खिड़कियाँ बंद कर देनी चाहिए. वही बोलना चाहिए जो लोग हम से सुनना चाहते हैं. वही करना चाहिए जो सरकार चाहती है. वही देखना चाहिए जिसे हमारे लिए तय कर दिया गया है. वही खाना चाहिए जो धर्म के ठेकेदारों ने परोसा है. वही पहनना चाहिए जिसे संस्कृति की दुकानों ने सिला है. वही पढ़ना और लिखना चाहिए जो सरकार के लिए सवाल बन ही न सके. अगर आप यह कर सकते हैं तो आप जश्न मनाइए. इंडिया गेट पर एक सिगरेट पी आइए और हो सके तो खंडाला में एक पार्टी कर आइए. खुशियां मनाइये कि आप अचानक से ‘देशभक्त में कनवर्ट’ हो गए हैं.

सवाल यह है कि प्रशासनिक या राजनीतिक व्यवस्था और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना देशद्रोह कैसे हो गया? जब विपक्ष ही न हो तो लोकतंत्र के होने या न होने का क्या मतलब रह जाएगा? देश के रहवासियों के बेहतर जीवन, वृहतर आज़ादी और बुनियादी सुविधाओं के संबंध में सवाल उठाना भी एक प्रकार से देशभक्ति ही तो है. सामाजिक आन्दोलन और विचारधाराओं के टकराव को यदि देशद्रोह ही समझा जाएगा तो राजा राम मोहन राय से लेकर भगत सिंह तक सभी देशद्रोही हो जाएंगे.

सामाजिक आन्दोलन और विचारधाराओं के टकराव को यदि देशद्रोह ही समझा जाएगा तो राजा राम मोहन राय से लेकर भगत सिंह तक सभी देशद्रोही हो जाएंगे.

1942 में गांधी जी ने जब ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन शुरू किया तब देशभक्ति की भावना और विचार दोनों ही अपने चरम पर थे. लेकिन देशभक्ति के उस चरमोत्कर्ष (आप चाहें तो इसे स्वर्णिम युग भी कह सकते हैं) वाले दौर में भी हम इतने लोकतांत्रिक थें कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भीमराव अम्बेडकर ने ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन का न सिर्फ विरोध किया बल्कि इसका बहिष्कार भी किया.

क्या होता यदि गांधी ने इन लोगों को ‘देशद्रोही’ होने का सर्टिफिकेट दे दिया होता! शुक्र है कि उस वक़्त तक न ही पाकिस्तान बना था और न ही भाजपा. नहीं तो आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भीमराव अम्बेडकर पाकिस्तान में होते. गांधी और इस देश ने इन संगठनों और नेताओं को न ही देशद्रोही कहा और न ही उनके देशप्रेम पर सवाल ही उठाए. उठा दिए होते तो ये संगठन आजतक उस कलंक से पीछा नहीं छुड़ा पाते. लेकिन गांधी और हमारे देश ने इसे वैचारिक मतभेद के तौर पर देखा.

हमारा जो राष्ट्रगान है – ‘जन गण मन’, जिसे हम देशभक्ति का सबसे ज्यादा मजबूत प्रतीक मानते हैं और बड़े उत्साह से गाते हैं; क्या आप जानना नहीं चाहेंगे कि हमारे इसी राष्ट्रगान के रचयिता रवीन्द्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रवाद पर क्या कहा था! वे कहते थे कि मैं राष्ट्रवाद को अपनी मानवता कुचलने की इज़ाज़त नहीं दे सकता. क्या अब आपको हमारे राष्ट्रगान के इस लेखक की देशभक्ति पर भी शक है?

हमारा राष्ट्रवाद तब क्यों नहीं विचलित होता जब बुंदेलखंड से ख़बरें आती हैं कि वहां लोग घास की रोटी खा कर जीने के लिए मजबूर हैं?

यह घोर आश्चर्य की बात है कि जब मणिपुर की राजधानी इम्फाल में सेना की ज्यादितियों के खिलाफ़ वहां की प्रौढ़ महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर अपने देश के सामने अपनी विवशता और दुःख व्यक्त किया तब भी हमारी भावनाएं नहीं पिघलीं. हमने यह बर्दाश्त कर लिया जबकि आलम यह है कि हम अपनी नारियों को माता और भारतमाता जैसे अलंकारों से नवाज़ते रहें हैं. तो क्या यह नहीं पूछा जाए कि हमारी देशभक्ति नकली और मौकापरस्त है? क्या यह सवाल आपको चुभता है?

हम जब-तब सरहदों पर लड़ने वाले अपने सैनिकों के प्रति तरह-तरह की भाषणबाजियों से सम्मान व्यक्त करते हैं और उनकी देशभक्ति को संदेह से परे देखते हैं. लेकिन जब वन रैंक-वन पेंशन की मांग को लेकर धरना करने की वजह से उन्हीं बुजुर्ग सैनिकों को जंतर-मंतर से खदेड़ा गया, उनके साथ हाथापाई की गई और उनके मेडल तक नोचे गए तब हमारे राष्ट्रवाद को क्या हो गया था? हमारा राष्ट्रवाद तब क्यों नहीं विचलित होता जब बुंदेलखंड से ख़बरें आती हैं कि वहां लोग घास की रोटी खा कर जीने के लिए मजबूर हैं? हमारा राष्ट्रवाद तब क्यों नहीं रोता जब हजारों अन्नदाता किसानों को आत्महत्या करने के सिवाय कोई रास्ता नहीं सूझता? हमारा राष्ट्रवाद सिर्फ कुछ तय मामलों में ही क्यों उग्र हो जाता है?

फ़्रांस की क्रांति के बाद वहां कई बदलाव होते रहे. एक बार यह बदलाव भी हुआ कि जो लोग टैक्स देते थे सिर्फ़ उन्हें ही वोट का अधिकार एवं एक्टिव नागरिक माना गया. आज भारत में टीवी पर हो रही बहसों से लेकर वट्सऐप पर वायरल हो रहे मैसेजों में पूछा जा रहा है कि करदाताओं का पैसा जेनयू में कथित तौर पर चल रही देशद्रोही गतिविधियों पर क्यों खर्च हो! क्या ये लोग इस बात पर गौर करना भूल गए या गौर करना ही नहीं चाहते कि इस देश का हर नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से टैक्स देता है? क्या ये लोग यह नहीं जानना चाहेंगे कि देश कि सरकारों और बैंकों ने समय-समय पर बड़े-बड़े उद्योगपतियों के कर्जे को बड़ी फुर्ती से ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ के नाम पर करदाताओं और खाताधारकों के पैसे से ही माफ़ किया है जबकि किसानों के कर्जों की माफ़ी पेंडुलम की तरह लटकती और भटकती रही है? क्या वट्सऐप पर देशभक्ति दिखाने वाले ये लोग फ़्रांस के उसी पुराने दौर में लौट जाना चाहेंगे?

क्या ये लोग यह नहीं जानना चाहेंगे कि देश कि सरकारों और बैंकों ने समय-समय पर बड़े-बड़े उद्योगपतियों के कर्जे को बड़ी फुर्ती से ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ के नाम पर करदाताओं और खाताधारकों के पैसे से ही माफ़ किया है

क्या टैक्स चोरी करना और फिर उसी चोरी के पैसे को विदेशी बैंकों में छुपाना देशद्रोह नहीं है? इन विषयों पर अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कर्ज माफ़ करने होंगे, थोड़ी ढील देनी होगी. ये लोग व्यवहारिक होने का तर्क भी देंगे. समस्या इसी बात से है कि जब आप चाहें तो सुविधानुसार व्यवहारिक बन जाएं और जब चाहें तो आदर्शवादी-राष्ट्रवादी. यह दोहरा मापदंड पाखण्ड नहीं तो और क्या है?

नौ फ़रवरी 2016 को जेनयू परिसर में जो हुआ वह निस्संदेह असंवैधानिक और भर्त्सना के लायक है. भारत के खिलाफ़ नारे लगाना निश्चित तौर पर निंदनीय है और दोषियों को कानून के अनुसार सज़ा मिलनी चाहिए. पर सवाल यह है कि क्या हमारा राष्ट्रवाद इतना घबराया हुआ और कमजोर है कि वह चंद लोगों के भड़काऊ नारों से डगमगा जाएगा! क्या हमें अपने ही देशवासियों की देशभक्ति पर भरोसा नहीं रहा? देश में संविधान है. चुनी हुई सरकार है. निर्वाचित संसद है. अदालतें हैं. पुलिस है. कानून है. फिर भी एक भीड़; एक मामूली भीड़ जो हिंसा और अधूरी जानकारी से प्रेरित है, को यह तय करने की आज़ादी कैसे दी जा सकती है कि आरोपी असल में दोषी है भी या नहीं?

15 फरवरी 2016 को भारत के सुप्रीम कोर्ट से महज़ डेढ़ किलोमीटर दूर पर स्थित पटियाला हाउस कोर्ट के कोर्ट रूम में वकीलों की एक भीड़ ने पत्रकारों और जेनयू के शिक्षकों की पिटाई की. इन वकीलों का मानना था कि सिर्फ़ वे ही देशभक्त हैं और ये पत्रकार देशद्रोही. फिर 17 फरवरी 2016 को 200 वकीलों की एक भीड़ ने दोबारा पत्रकारों पर हमला किया. यह सब सैकड़ों पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में एक अदालत परिसर में हुआ. यह शर्मनाक है.

मुझे महाभारत का वो दृश्य याद आ रहा है जब भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और धृतराष्ट्र की उपस्थिति में द्रौपदी को निर्वस्त्र किया गया पर सब चुप रहे. यह शर्मनाक है कि हमने अपनी लाज़ नहीं रखी. अदालत के परिसर में गुंडागर्दी हुई. अदालत अपनी गरिमा नहीं रख पाई. पुलिस कानून का राज स्थापित नहीं कर पाई. जनता चुप रही. सरकार तमाशा देखती रही और एक बार में पूरा देश ढह सा गया. यह इस महान देश का ढहना ही तो है. हमारा कुछ कतरा गिरा है. कुछ-कुछ हिस्से में गिरा है. लेकिन गिरा तो है.

(कुमार पीयुष सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची में अर्थशास्त्र के छात्र हैं.)