भारतीय रेल की सबसे बड़ी समस्या के तौर पर पैसे की कमी को रेखांकित किया जाता है. कहा जाता है कि रेलवे के पास पैसों की कमी है इसलिए भारतीय रेल की सेहत नहीं सुधर रही. अब तक यह देखा जाता रहा है कि पैसे की कमी की बात कहकर रेल किराया बढ़ा दिया जाता है. नरेंद्र मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में भी यही हुआ. रेल मंत्रालय ने इस दौरान कुछ मौकों पर प्रत्यक्ष तो कुछ पर अप्रत्यक्ष रूप से रेल किराया बढ़ाने का काम किया. यह काम माल ढुलाई के मोर्चे पर भी हुआ. इसके बावजूद न तो रेलवे की आमदनी बढ़ी और न ही माली हालत सुधरी.

रेलवे के कामकाज को समझने वालों लोग बजट के पहले से लगातार यह कह रहे थे कि उसे अगर अपनी माली हालत सुधारनी है तो आमदनी के नए रास्ते तलाशने होंगे. इस बार अपने बजट भाषण में सुरेश प्रभु ने जिन तीन रास्तों के जरिए रेलवे के कायाकल्प का मंसूबा जाहिर किया उनमें से एक है नव अर्जन. इसके तहत उन्होंने रेलवे की कमाई के नए रास्ते तलाशने की बात की. प्रभु ने कहा कि अब तक रेलवे आमदनी बढ़ाने के लिए किराया बढ़ाने की राह पर चलती थी और अब हम इस मानसिकता को बदलना चाहते हैं. क्योंकि बतौर रेल मंत्री उनके अब तक के कार्यकाल में किरायों में की गई बढ़ोतरी से रेलवे की आमदनी पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा है.

इस बार अपने बजट भाषण में सुरेश प्रभु ने जिन तीन रास्तों के जरिए रेलवे के कायाकल्प का मंसूबा जाहिर किया उनमें से एक है नव अर्जन. इसके तहत उन्होंने रेलवे की कमाई के नए रास्ते तलाशने की बात की

इसे एक अच्छी सोच मानने में कोई हर्ज नहीं है. लेकिन इसके लिए क्या रोडमैप रखा गया है, यह भी देखना जरूरी है. इस दृष्टि से अगर प्रभु के बजट को देखा जाए तो निराशा हाथ लगती है. आमदनी बढ़ाने का कोई स्पष्ट रोडमैप उनके बजट में नहीं दिखता है. कुछ छोटे—छोटे कदमों का उल्लेख जरूर वे करते हैं लेकिन उनसे बड़ी आमदनी या बड़ी बचत की उम्मीद नहीं की जा सकती है.

यात्री किराया बढ़ाने से अलग हटकर आमदनी बढ़ाने के लिए सुरेश प्रभु जिन नए रास्तों की बात कर रहे हैं उसमें एक यह है कि वे रेलवे के खर्चे को कम करने की दिशा में भी काम करेंगे. प्रभु ने कहा कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद खर्च में जो 32.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी, उसे सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद वे 11.6 फीसदी पर सीमित रखेंगे. यह लक्ष्य कैसे हासिल करेंगे, इस बारे में पूरी स्पष्टता रेल बजट में नहीं है. रेल मंत्री सिर्फ इस बारे में इतना कहते हैं कि ऐसा वे अगले साल नए कदम उठाकर करेंगे.

हालांकि, कुछ ऐसी बातों का जिक्र रेल मंत्री जरूर करते हैं जिससे लगता है ऐसा करने से रेलवे के खर्चे में कमी आ सकती है. सुरेश प्रभु ने अपने बजट भाषण में बताया कि भारतीय रेल के लिए जो बिजली खरीदी जाती है, उसके लिए उनका मंत्रालय लंबी अवधि के समझौते कर रहा है. इससे कम दर पर रेलवे को बिजली मिल रही है और पैसे बच रहे हैं. उन्होंने यह भी बताया कि डीजल से चलने वाली गाड़ियों में भी जो खर्चा होता था, उसमें भी कमी आ रही है. साफ तौर पर उन्होंने तो नहीं कहा लेकिन इसकी पृष्ठभूमि यह है कि पिछले एक साल में डीजल की कीमतों में काफी कमी आई है और इस वजह से डीजल पर आधारित हर गतिविधि की लागत कम हुई है.

रेल बजट में रेल मंत्री ने अगले वित्तीय वर्ष यानी 2016—17 के लिए 1.84 लाख करोड़ रुपये कमाई का लक्ष्य रखा है. इस लक्ष्य को कैसे हासिल किया जाएगा, इस बारे में स्पष्टता का अभाव रेल बजट में है

रेल बजट में रेल मंत्री ने अगले वित्तीय वर्ष यानी 2016—17 के लिए 1.84 लाख करोड़ रुपये कमाई का लक्ष्य रखा है. इस लक्ष्य को कैसे हासिल किया जाएगा, इस बारे में स्पष्टता का अभाव रेल बजट में है. ऐसे में यह डर स्वाभाविक तौर पर पैदा होता है कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने से जिस 30,000 करोड़ रुपये का आर्थिक बोझ रेलवे पर पड़ने का अनुमान है, उसकी भरपाई के लिए एक बार फिर सरकार कहीं यात्री किराये और माल भाड़े में बढ़ोत्तरी की राह पर ही तो नहीं चल पड़ेगी. क्योंकि पिछले बजट में भी किराये में बढ़ोत्तरी की घोषणा नहीं हुई थी लेकिन पूरे साल में कई मौके ऐसे आए जब किसी न किसी बहाने आम यात्रियों की जेब ढीली कर ली गई.

ऐसे में अगला वित्तीय वर्ष न सिर्फ सुरेश प्रभु बल्कि नरेंद्र मोदी सरकार की कड़ी परीक्षा लेगा. क्योंकि अगर कभी किराये में बढ़ोतरी हुई तो कहा जाएगा कि रेल बजट में तो सरकार इस मानसिकता को दूर करने की बात कहती है लेकिन असल में उसी मानसिकता के तहत काम कर रही है. वहीं अगर आमदनी के नए रास्ते तलाशने और उन रास्तों पर चलने में सरकार को सफलता नहीं मिली तो भी उसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा.