भाजपा के जिस मार्गदर्शक मंडल के बारे में यह कहा गया था कि वह मुश्किल वक्त में पार्टी को दिशा दिखाता रहेगा उसकी अब तक एक भी बैठक नहीं हुई है.
स्थितियां प्रतिकूल हों और खुद को कुछ नहीं सूझ रहा हो तो कहते हैं कि मार्गदर्शन के लिए अनुभवी लोगों के पास जाना चाहिए. दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा भी मुश्किल हालात में नजर आ रही है. तो क्या उसे भी किसी मार्गदर्शक की शरण में नहीं जाना चाहिए? वह भी तब जब ऐसा करने के लिए उसने खुद ही एक व्यवस्था कर रखी है?
पिछले साल 26 अगस्त को भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने जब नई टीम बनाई तो पार्टी के संसदीय बोर्ड से उन तीन नेताओं का नाम हटा दिया, जो भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे थे. ये नेता थे अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी. हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेई गिरती सेहत के चलते बहुत पहले ही सक्रिय राजनीति से अलग हो चुके थे, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की राजनीतिक सक्रियता अभी भी बरकरार है. इस फैसले के बाद साफ हो गया था भारतीय जनता पार्टी में एक नया दौर शुरू हो चुका है.
लेकिन इन तीन नेताओं की भूमिका को पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए एक मार्गदर्शक मंडल बनाया गया और उसमें इन्हें शामिल कर दिया गया. इस मार्गदर्शक मंडल का वजन और भारी करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह को भी बतौर सदस्य इसमें शामिल किया गया था. तब अमित शाह समेत भाजपा के तमाम प्रवक्ताओं का कहना था कि यह यह मंडल मुश्किल वक्त में पार्टी को दिशा दिखाता रहेगा.
दिल्ली विधानसभा के चुनावी अभियान में आडवाणी और जोशी की भूमिका बेहद उपयोगी हो सकती थी क्योंकि इन दोनों दिग्गजों का अधिकांश राजनीतिक जीवन दिल्ली में ही बीता है.
इस वक्त दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली 'बहदवास' कर देने वाली हार के बाद पार्टी को सचमुच दिशा-निर्देशन की जरूरत है. लेकिन न तो पार्टी अपने मार्गदर्शक मंडल से कोई राय मांगती दिख रही है और न ही यह मंडल खुद आगे बढ़ कर किसी तरह की पहल करता दिख रहा है.
सवाल उठता है कि ऐसा क्यों है. इस मार्गदर्शक मंडल के गठन से अब तक के समय का लेखा-जोखा खंगालने पर जवाब मिल जाता है. यह बताता है कि करीब सात महीने का वक्त बीतने के बाद भी इस मार्गदर्शक मंडल की कुल जमा उपलब्धि 'शून्य' रही है. इस बात को समझने के लिए यह एक तथ्य ही काफी है कि अभी तक इस मंडल की एक भी बैठक नहीं हुई है. इसके अलावा केंद्र सरकार के गठन के बाद से अब तक हुए अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपाई रणनीति की भी बात करें, तो उसमें भी इस मार्गदर्शक मंडल की कोई भूमिका नहीं देखी गई है.
बल्कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान तो इसकी राय को खारिज ही कर दिया गया था. उस वक्त शिवसेना के साथ भाजपा का गठबंधन टूटने पर लालकृष्ण आडवाणी ने दुख जताया था, लेकिन इसकी परवाह किए बिना भाजपा ने शिवसेना से अलग हो कर ही चुनाव लड़ा. दिलचस्प बात यह है कि चुनाव के बाद भाजपा को शिवसेना के साथ गठबंधन करना पड़ा. इसके अलावा महाराष्ट्र के साथ ही हरियाणा, झारखंड और जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव के दौरान भी ये दोनों नेता नेपथ्य में ही रहे. तब पार्टी के दूसरे कई नेता स्टार प्रचारक बनकर जगह-जगह चुनावी रैलियां कर रहे थे, लेकिन किसी जमाने में भाजपा के चुनावी अभियानों के अगुआ रहे आडवाणी और जोशी को एक भी रैली में हाथ हिलाने तक का मौका नहीं मिला.
पार्टी के दूसरे कई नेता स्टार प्रचारक बनकर जगह-जगह चुनावी रैलियां कर रहे थे, लेकिन किसी जमाने में भाजपा के चुनावी अभियानों के अगुआ रहे आडवाणी और जोशी को एक भी रैली में हाथ हिलाने तक का मौका नहीं मिला.
इन चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में किनारे किए जाने के बाद इन दोनों नेताओं को दिल्ली विधानसभा के चुनाव प्रचार में भी शामिल नहीं किया गया. यहां पर एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि दिल्ली फतह करने के लिए भाजपा ने मोदी सरकार के दर्जनभर से अधिक मंत्रियों के साथ ही 100 से अधिक सांसदों की फौज यहां उतारी थी. जानकारों की मानें तो दिल्ली विधानसभा के चुनावी अभियान में आडवाणी और जोशी की भूमिका बेहद उपयोगी हो सकती थी, क्योंकि इन दोनों दिग्गजों का अधिकांश राजनीतिक जीवन दिल्ली में ही बीता है. आडवाणी की बात करें तो दिल्ली के संभ्रांत वर्ग में उनकी अच्छी पैठ मानी जाती है, जबकि मुरली मनोहर जोशी प्रवासी समुदाय के बीच अच्छा खासा प्रभाव रखने वाले नेता बताए जाते हैं. इसके बावजूद ये दोनों नेता तसवीर से पूरी तरह गायब रहे.
दिल्ली चुनाव में भाजपा का सफाया हो गया. उसकी इस दुर्गति को देश-दुनिया में प्रधानमंत्री मोदी के साथ ही भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की रणनीतिक असफलता बताया जा रहा है. ऐसे में क्या भाजपा अब अपने उन मार्गदर्शकों से वाकई कोई मार्गदर्शन लेगी जिन्हें उसने पिछले लंबे अर्से से मूकदर्शक भर बना कर कोने में रखा हुआ है.