प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी | फोटो - Al Jazeera English / Foter / CC BY-SA
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी | फोटो - Al Jazeera English / Foter / CC BY-SA
काठ की हांडी बार-बार चूल्हे पर नहीं चढ़ती. उसी प्रकार राजनीति में हर बार एक ही फॉर्मूला काम नहीं करता. दिल्ली के चुनाव परिणामों ने यह साबित कर दिया है. लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड में जीत और जम्मू-कश्मीर में जबरदस्त प्रदर्शन के बाद बीजेपी को दिल्ली में शर्मनाक पराजय का मुंह देखना पड़ा. ऐसी हार कि बीजेपी नेता आत्ममंथन करने से भी डर रहे हैं. आत्ममंथन तब होता है जब आत्मा गवाही देती है. और मंथन से फैसला निकलता है. यहां दोनों ही मुश्किल हैं. दिल्ली को भूलकर भाजपा बिहार की तरफ चलना चाहती है. लेकिन बड़े रोड़े हैं बिहार के रास्ते में भी. जो दिल्ली में हुआ वह बिहार में भी हो सकता है. इसके पीछे चार तर्क हैं.

1- बिहार भाजपा की गुटबाजी

बिहार में दिल्ली की तुलना में कम गुटबाजी नहीं है. एक दो नहीं अलग-अलग जाति के नेताओं का गुट है. और हर गुट को किसी न किसी बड़े नेता का आशीर्वाद मिला हुआ है. इस बार पहले की तुलना में बिहार में बीजेपी के विरोधी ज्यादा सशक्त हैं, एकजुट हैं. राष्ट्रपति भवन के सामने लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने इस एकता का खुलेआम एलान कर दिया और नारा भी दे दिया - दिल्ली में भाजपा हारी है, अब बिहार की बारी है. इसके विपरीत भाजपा में भितरघातियों की कमी नहीं है. 2014 के लोकसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने के बाद भाजपा को उसके विभीषणों ने ही बिहार विधानसभा चुनाव में हराया था. हार के बाद अगर पार्टी सबक नहीं सीखती है तो उसे पराजय से कोई नहीं बचा सकता.

2- मुस्लिम वोटरों का गोलबंद होना

दिल्ली में मुस्लिम वोटरों ने कांग्रेस को गुडबाय कह दिया और आम आदमी पार्टी की झाड़ू को थाम लिया. 243 सीट वाले बिहार में कम से कम पचपन सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाताओं का दबदबा है. सीमांचल के इलाके में मुस्लिम मतदाताओं ने ऐसा करके दिखाया भी है. पिछली बार लोकसभा चुनाव में सीमांचल की सभी आठ सीटें बीजेपी हार गई थी. भाजपा के एक बड़े नेता ने पाकिस्तान भेजनेवाला बयान दिया और इसका रिएक्शन हुआ. पहले फेज में आठ सीटों पर चुनाव हुआ और लहर के बावजूद सभी आठ सीटें मोदी को नहीं मिली.

3- पब्लिक मैनेजमेंट की जगह बूथ मैनेजमेंट में यकीन

दिल्ली का नतीजा बिहार में भी दोहराया जा सकता है, इसकी तीसरी वजह है, भाजपा का अब भी मैनेजमेंट के भरोसे होना. बीजेपी के पास बूथ मैनेजमेंट की जगह पब्लिक मैनेजमेंट का कोई शास्त्र नहीं है. बिहार में भी सारा जोर अभी से मैनेजमेंट पर ही है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने चुनाव से चार महीने पहले उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया. बीजेपी आखिर वक्त तक उम्मीदवारों की घोषणा से बचती रही. नतीजा यह हुआ कि जब बीजेपी कैंडिडेट वोटरों के घर पहुंचे तो उन्होंने टका सा जवाब दिया - आप अब आए हैं. वो तो चार बार आकर जा चुके हैं. ऐसा लगता है बिहार में भी पूरी संभावना है बीजेपी जल्दी उम्मीदवारों का एलान नहीं करेगी. इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.

4- नेताओं का घमंड

दिल्ली में आप अरविंद केजरीवाल की छवि की वजह से जीती. इतनी भारी जीत के बावजूद केजरीवाल की पार्टी ने विजय जुलूस नहीं निकाला. ये सब जनता को पसंद आया. वोटर केवल शोर-शराबा और शोशेबाजी पसंद नहीं करता. उसे नेता की सादगी भी पसंद आती है. बिहार में ठीक उल्टा है. बिहार जीतने के लिए मोदी सरकार में बिहार के अलग-अलग जातियों के मंत्री बनाए गए. जाति समीकरण बिठा लिया गया. लेकिन नेताओं में अहंकार और भर गया. वोटर तो छोड़िए वे ठीक से कार्यकर्ताओं तक से बात नहीं करते. पहले नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के साथ भी ऐसा था. लेकिन अब दोनों बदल रहे हैं. लालू बिहार जीते क्योंकि वोटर ने उनका गंवई अंदाज़ पसंद किया. गांव के गरीब वोटरों को लालू अपना लगा. वह तो बाद में लालू राज में तकलीफ बढ़ी तो नीतीश को चुना. जब नीतीश का अहंकार बढ़ा तो लोकसभा चुनाव में नीतीश को भी झटका दे दिया. लेकिन इस सबसे भाजपा नेताओं ने नहीं सीखा. लालबत्ती पर बैठते ही वे जनता से दूर होने लगे. वे कब समझेंगे, लालबत्ती प्रेमी मंत्री से जनता कभी प्रेम नहीं कर सकती. जनता का प्यार पाने के लिए धूल-मिट्टी और ऑटो में चलना होगा.
अगर बीजेपी को बिहार जीतना है तो उसे एक केजरीवाल चाहिए. बिहार का वोटर आज हर नेता में केजरीवाल को ढूंढ रहा है. लेकिन केजरीवाल नहीं उसे चारों ओर सिर्फ सवाल ही देखने को मिलते हैं.