'लेखक को फिर से वह काम करने दीजिए जिसमें वह सबसे अच्छा है- लेखन'

इन शब्दों के साथ मद्रास हाई कोर्ट ने पेरुमल मुरुगन के हक में अपना फैसला सुना दिया है. इस तमिल लेखक के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग करती जनहित याचिकाओं को खारिज करते हुए अदालत ने नमक्कल जिला प्रशासन को भी फटकार लगाई जिसने मुरुगन पर अपनी किताब को वापस लेने का दबाव बनाया था.

इस विवाद की जड़ में पेरुमल मुरुगन का उपन्यास ‘मधोरूबगन‘ है. यह उपन्यास नमक्कल जिले के थिरूचेंगोड़े शहर के अर्धनारीश्वर मंदिर में होने वाले एक धार्मिक उत्सव ‘नियोग‘ के बारे में बात करता है. उपन्यास की निःसंतान विवाहित नायिका अपने पति की मर्जी के बिना भी नियोग नामक धार्मिक प्रथा को अपनाकर संतान पैदा करने का फैसला करती है. स्त्री निर्णय की स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व करती इस किताब का कट्टरपंथी हिंदुओं ने कड़ा विरोध किया. इसके बाद मुरुगन ने लेखन से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया था. अपने फेसबुक पेज उन्होंने लिखा, ‘मर गया पेरुमल मुरुगन. वह ईश्वर नहीं कि दोबारा आए. अब वह पी मुरुगन है, बस एक शिक्षक. उसे अकेला छोड़ दो.’

लेकिन उन्हें परेशान कर रहे कट्टरपंथी तत्वों को इससे भी संतोष नहीं हुआ. तमिलनाडु के नमक्कल जिले में रहने वाले इस लेखक को सामाजिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिशें हुईं. उनके दोस्तों और रिश्तेदारों को धमकाया गया. इस सबसे परेशान होकर नमक्कल के सरकारी डिग्री कॉलेज में पढ़ाने वाले पेरुमल और उनकी पत्नी ने अपने तबादले की अर्जी दे दी.

वे चाहते हैं कि बच्चा किससे पैदा करना है, यह तय करने का हक सिर्फ पुरुष यानी पिता का है. कोई स्त्री यह कैसे तय कर सकती है कि वह किस पुरुष से बच्चा पैदा करना चाहती है?

शब्दों और रेखाओं के माध्यम से होने वाली अभिव्यक्ति पर यह कोई पहला हमला नहीं है. लेकिन यह विरोध सिर्फ धर्म और संस्कृति की अवमानना से आहत होने के चलते हुआ, ऐसा नहीं लगता. सवाल कई हैं. पहला, क्या विरोध करने वाले नियोग के परंपरागत रूप को तोड़ने से खफा हैं? मतलब कि क्या नाराजगी इस बात से है कि स्त्री ने स्वयं नियोग के लिए पुरुष चुन लिया. वे चाहते हैं कि बच्चा किससे पैदा करना है, यह तय करने का हक सिर्फ पुरुष यानी पिता का है. कोई स्त्री यह कैसे तय कर सकती है कि वह किस पुरुष से बच्चा पैदा करना चाहती है? क्या यह पुरुष के सदियों पुराने अधिकार के छिनने का मातम है?

या फिर वे नियोग को ही बुरा मानते हैं? यदि वे नियोग को बुरा मान रहे हैं तो वे अपनी पूरी हिंदू संस्कृति और परंपरा को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. क्या वे सच में ऐसा करना चाहते हैं? चाह सकते हैं?

तीसरा, वे संस्कृति और सभ्यता के अभिन्न अंग के रूप में तो नियोग को पूज्य मानते हैं, लेकिन व्यवहार में उसे घटित होते हुए नहीं देख सकते. यह ठीक वैसा ही है कि किसी बिनब्याही मां की फिल्म तो लोग देख सकते हैं, नायिका के विपरीत हालात पर इमोशनल भी हो जाते हैं, लेकिन व्यवहार में बिनब्याही मां की कल्पना भी नहीं कर सकते.

मेरे ख्याल से सारा विरोध सिर्फ स्त्री के अपने निर्णय की स्वतंत्रता का है. स्त्री का स्वेच्छा से गर्भ धारण करने के लिए स्वयं नियोग पुरुष तय करना और उससे यौन संबंध बनाना अपराध है. ठीक उसी मंदिर में यदि मंदिर का पुजारी उस स्त्री का बलात्कार करता और तब वह गर्भवती हो जाती, तो यह स्थिति भी क्या इतने ही भयंकर विरोध का कारण बनती? निसंदेह नहीं!

जब पति स्वयं पत्नी को गर्भवती करने में अक्षम है, तो ऐसे में पुरुष को किस आधार पर यह तय करने का अधिकार मिलना चाहिए कि उसकी पत्नी किससे गर्भ धारण करे?

‘नियोग‘ प्रथा का आधार हिंदू धार्मिक ग्रंथ ही हैं. जिस तरह से रामायण के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती, वैसे ही ‘नियोग प्रथा‘ के बिना महाभारत और वेदों की कल्पना नहीं की जा सकती. ‘नियोग प्रथा‘ के मुताबिक यदि पति की अकाल मृत्यु हो जाए या पति संतान उत्पन्न करने की स्थिति में न हो (‘बांझ‘ हो या कहें कि वीर्यहीन हो!) तो ऐसी स्थिति में पत्नी अपने देवर या समगोत्री से गर्भ धारण कर सकती है. पत्नी किससे गर्भ धारण करे, यह पति का निर्णय होता था. ग्रंथों के अनुसार नियोग सिर्फ संतान प्राप्ति के लिए मान्य था, यौन आनंद के लिए नहीं. नियोग से जन्मी संतान वैध थी लेकिन उस संतान पर नियुक्त पुरुष का कोई अधिकार नहीं होता था. महाभारत के पांच पांडव नियोग से ही पैदा हुए थे. धृतराष्ट्र और विदुर भी नियोग प्रथा से ही जन्मे थे जिसमें नियुक्त पुरुष ऋषि वेदव्यास थे.

नियोग कुल मिलाकर क्या है? पति के वीर्यहीन या नपुंसक होने पर किसी दूसरे पुरुष के साथ पत्नी के संबंध से बच्चे का जन्म. लेकिन विरोधियों की मर्दवादी सोच इस बात को हजम नहीं कर पा रही कि कोई स्त्री अपनी इच्छा से कैसे तय कर सकती है कि उसे किस पुरुष से बच्चा चाहिए. पति द्वारा तय किए जाने वाले पुरुष के साथ संबंध बनाना भी तो किसी स्त्री के लिए उतना ही कष्टकारी है. लेकिन नहीं, स्त्री का कष्ट, स्त्री का निर्णय यह सब सोच के केंद्र में कभी नहीं रहा. स्त्री का कष्ट और ‘स्त्री का निर्णय‘ समाज से ऐसे गायब है जैसे दिमाग नाम की चीज स्त्री के पास होती ही न हो. न वह दर्द महसूस करती है और न निर्णय लेने की स्थिति में होती है.

वर्तमान में जब लिंगभेद की परिभाषा फिर से लिखी जा रही है, नए संदर्भों में लिखी जा रही है और ज्यादा व्यापक स्तर पर लिखी जा रही है तो मुरूगन की यह किताब लिंगभेद के बेहद बुनियादी स्तर को खींचकर सबके सामने ले आती है. सवाल सच में मारक है. एक स्त्री जिसे नौ महीने बच्चा अपने पेट में रखना है, जिसे प्रसव पीड़ा झेलनी है, जिसे सालों तक रतजगे करने हैं, जिसे सालों तक दिन-रात का चैन, सुकून खोना है, उसे यह तय करने का अधिकार क्यों नहीं कि वह किसके बच्चे की मां बनना चाहती है?

एक स्त्री जिसे नौ महीने बच्चा अपने पेट में रखना है, जिसे प्रसव पीड़ा झेलनी है, जिसे सालों तक रतजगे करने हैं, जिसे सालों तक दिन-रात का चैन, सुकून खोना है, उसे यह तय करने का अधिकार क्यों नहीं कि वह किसके बच्चे की मां बनना चाहती है?

सवाल यहां आकर और भी जटिल हो जाता है कि जब पति स्वयं पत्नी को गर्भवती करने में अक्षम है, तो ऐसे में पुरुष को किस आधार पर यह तय करने का अधिकार मिलना चाहिए कि उसकी पत्नी किससे गर्भ धारण करे? सामान्य स्थिति में यह सवाल शायद बवंडर मचा दे, लेकिन कम से कम नियोग की स्थिति में तो पत्नी को इस निर्णय का अधिकार मिलना ही चाहिए जब उसका पति इस काम के लिए अनुपयुक्त है.

इस किताब का इतना ज्यादा विरोध साफ करता है कि विरोधियों को दिक्कत स्त्री के निर्णय की आजादी से है. और आजादी भी किस क्षेत्र में? यौन संबंध की आजादी! गर्भ धारण करने की आजादी! देह की आजादी! सारी दुनिया की धार्मिक आस्थाएं और पितृसत्ता एड़ी-चोटी का जोर लगाकर स्त्री की देह और दिमाग (जो कि उनके हिसाब से है नहीं) को कैद करने में दिन-रात एक किये हुए हैं. पुरुष द्वारा जबरन किसी लड़की या स्त्री से यौन संबंध बनाना किसी को नहीं अखरता क्योंकि ऐसा तो होता ही रहता है! पुरुष की बलात यौन इच्छा का भी इतना सम्मान! स्त्री की परस्पर सहमति पर इतना बवाल! थू है ऐसे समाज पर जो प्रेम या परस्पर सहमति के संबंध को कटघरे में खड़ा करता है, उसे कोड़े से पीटता है और जबरदस्ती के, हिंसा से भरे संबंधों को प्यार से सहलाता है.

स्त्री के निर्णय के सवाल पर समाज में जो मौत जैसी खामोशी है, मुरुगन ने उस खतरनाक चुप्पी को तोड़ा है. उन्होंने ऐसे जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है जो अब वापस उसी शक्ल में तो बोतल में नहीं ही जाएगा जिस शक्ल में बाहर निकला है. एक बेहद महत्वपूर्ण विषय पर बहस शुरू हुई है. बस डर यह है कि हमेशा की तरह बहस का विषय बदल कर कुछ और ही न हो जाए.