यूरोप के एक ऐसे युद्ध में उलझने की पूरी आशंका बन गई थी जिस पर यूरोप वालों का कोई नियंत्रण नहीं रहता जबकि उसके अकल्पनीय अनिष्टकारी परिणाम उन्हें ही भुगतने पड़ते.
शिखर सम्मेलन जर्मनी और फ्रांस की पहल था. आनन-फानन में हुआ था. स्थानीय समय के अनुसार बुधवार 11 फ़रवरी की शाम साढ़े छह से गुरुवार सुबह सवा दस बजे तक-- यानी पूरी रात सहित क़रीब 17 घंटे चला. कोई नेता सो नहीं पाया. कुछ ही घंटे पहले तक निश्चित नहीं था कि शिखर सम्मेलन हो भी पायेगा या नहीं. आनन-फानन में यह सम्मेलन इसलिए हुआ, क्योंकि पूर्वी यूक्रेन में एक वर्ष से चल रहे संघर्ष में रूसी-भाषी पृथकतावादियों का पलड़ा भारी होने लगा था. शक्ति-संतुलन को एक बार फिर पश्चिम समर्थक यूक्रेनी सरकार के पक्ष में झुकाने हेतु अमेरिका उसे अधुनिक भारी हथियार देने के लिए अधीर होता दिख रहा था. इससे यूरोपीय देशों, मुख्यतः जर्मनी और फ्रांस को डर लगने लगा कि तब रूस भी पृथकतावादियों के समर्थन में खुल कर रणभूमि पर कूद सकता है. यूरोप अंततः एक ऐसे खुले युद्ध में उलझ सकता है, जिस पर यूरोप वालों का कोई नियंत्रण नहीं रह जायेगा, जबकि उसके अकल्पनीय अनिष्टकारी परिणाम उन्हें ही भुगतने पड़ेंगे.

मेर्कल का माथा ठनका

अब तक अमेरिका की हां में हां मिलाती रहीं जर्मन चांसलर (प्रधानमंत्री) अंगेला मेर्कल का भी माथा यूक्रेन को अमेरिकी हथियार मिलने की संभावना से ठनकने लगा. पहली बार उन्होंने अमेरिका को आंख दिखाने का साहस जुटाते हुए म्युनिक के अंतरराष्ट्रीय रक्षानीति सम्मेलन में 7 फ़रवरी को कहा, 'मैं ऐसी स्थिति की कल्पना बिल्कुल नहीं कर पा रही हूं कि यूक्रेन को सैन्य-सहायता मिलने से राष्ट्रपति पूतिन अपना विचार बदल देंगे.'
यूक्रेन की तीन बटालियनों को हथियारों से लैस करने और उन्हें इन हथियारों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण देने के लिए अमेरिका अपनी एक बटालियन भेजने को तैयार बैठा है.
म्युनिक सम्मेलन में आए अमेरिकी उपराष्ट्रपति और विदेशमंत्री का कहना था कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन को सबक सिखाना है, तो केवल आर्थिक प्रतिबंधों से काम नहीं चलेगा,  यूक्रेन को तुरंत आधुनिक हथियारों से लैस भी करना होगा. यूक्रेन की तीन बटालियनों को ऐसे हथियारों से लैस करने और उन्हें इन हथियारों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण देने के लिए अमेरिका अपनी एक बटालियन भेजने को तैयार बैठा है.
जर्मनी और फ्रांस को लगा कि हर संकट से सैनिक बल से निपटने और उसे बद से बदतर बना देने के आदी अमेरिकी अहम को यूक्रेन के मामले में यूरोप से दूर ही रखना होगा. उन्हें महसूस हुआ कि इसके लिए अब उन्हें ही अपनी निगरानी में रूस और यूक्रेन के बीच बातचीत करवानी होगी. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन और यूक्रेनी राष्ट्रपति पेत्रो पोरोशेंको से पूछा गया कि क्या वे अगले तीन-चार दिनों में बेलारूस की राजधानी मिंस्क में एक आकस्मिक शिखर सम्मेलन के लिए आ सकते हैं. उनकी सहमति मिलते ही चांसलर मेर्कल पहले 9 फ़रवरी को वॉशिंगटन गईं. वहां राष्ट्रपति बराक ओबामा को विश्वास में लिया. 10 फ़रवरी को बर्लिन लौटीं. अगले दिन, यानी 11 फ़रवरी को,  इस बात की पुष्टि हो जाने के बाद कि यूक्रेनी और रूसी राष्ट्रपति सचमुच मिंस्क जा रहे हैं, चांसलर मेर्कल और फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रोंस्वा ओलांद भी मिंस्क के लिए रवाना हुए.

यूक्रेन बना अड़ियल

पश्चिमी मीडिया की सारी प्रचारात्मक अटकलों को झुठलाते हुए राष्ट्रपति पूतिन ने नहीं, बल्कि यूक्रेनी राष्ट्रपति पोरोशेंको ने वार्ताओं में सबसे अड़ियल रुख का परिचय दिया. शायद इसलिए कि वे जानते थे कि यदि वार्ताएं विफल हो गयीं तो अमेरिकी हथियार मिलने का रास्ता साफ़ हो जायेगा. अमेरिकी हथियारों के साथ ही अमेरिका का वरदहस्त भी सिर पर होगा. इसलिए वार्ताएं लंबी खिंचती रहीं. लेकिन, जर्मन चांसलर और फ्रांसीसी राष्ट्रपति भी संभवतः मन में ठान कर गए थे कि मिंस्क से ख़ाली हाथ नहीं लौटेंगे. अमेरिका को यूक्रेन-संकट का अमेरिकीकरण यथासंभव नहीं ही करने देंगे.
परिणाम निकला. यूक्रेन-संकट से जुड़े पक्ष 14 जनवरी की मध्यरात्रि तक संघर्ष-विराम के अतिरिक्त कई दूसरे क़दमों पर भी सहमत हुए. शिखर सम्मेलन व्यर्थ नहीं रहा. परिणाम बहुत उत्सहवर्धक भले ही न आंका जा रहा हो, चांसलर मेर्कल के शब्दों में वह 'आशा की एक किरण' तो है ही. राष्ट्रपति ओलांद ने उसे 'यूरोप के लिए राहत और यूक्रेन के लिए आशावाद' बताया. परिणाम एक साझी घोषणा और एक 13 सूत्री कार्यसूची के रूप में सामने आया है.

साझी घोषणा

चारो पक्षों की साझी घोषणा में कहा गाया है कि उनका ''दृढ़ विश्वास है कि समस्या के पूरी तरह शांतिपूर्ण समाधान के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है.'' जर्मनी और फ्रांस संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में बैंकिंग सेक्टर के पुनर्निमाण में तकनीकी और विशेषज्ञता सहायता देंगे. यूरोपीय संघ, यूक्रेन और रूस के बीच सहयोग बेहतर बना कर वर्तमान संकट को हल करने का काम आसान बनाया जायेगा. भविष्य में इन तीनों के बीच त्रिपक्षीय वार्ताओं द्वारा समस्याओं के व्यावहारिक समाधान खोजे जायेंगे.
अगले दिनों में शांति-स्थापना की दिशा में जो क़दम उठाये जाने हैं, उनके बारे में कहा गया है कि मिंस्क-समझौते के 48 घंटे बाद संघर्ष-विराम लागू हो जाना चाहिये. उसके दो दिन बाद भारी अस्त्र-शस्त्र का हटाया जाना शुरू हो जाना चाहिये, ताकि दो सप्ताहों के भीतर यह काम पूरा हो जाये. यूक्रेनी सेना को अपने हथियार उस सीमारेखा से परे हटाने होंगे, जहां वे इस समय हैं, जबकि पृथकतावादियों को 19 सितंबर 2014 वाली सीमारेखा तक पीछे हटना होगा. दोनों सीमाओं के बीच 50 किलोमीटर चौड़ा एक विसैन्यीकृत बफर-क्षेत्र होना चाहिये. संघर्ष-विराम के 19 दिनों के भीतर सभी बंदियों की रिहाई पूरी हो जानी चाहिये.

यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता को मान्यता

पूतिन, मर्कल और ओलांद की साझा कोशिशें काम आईं
पूतिन, मर्कल और ओलांद की साझा कोशिशें काम आईं
रूसी राष्ट्रपति ने यूक्रेन की सार्वभौमता और क्षेत्रीय अखंडता को स्वीकार करते हुए रूसी-भाषी पृथकतावादियों से आग्रह किया कि वे तुरंत लड़ाई बंद करें. उनका कहना था कि मिंस्क वार्ताएं इसलिए इतनी लंबी खिंच गयीं, क्योंकि यूक्रेनी राष्ट्रपति पोरोशेंको पृथकतावादी विद्रोहियों के साथ सीधी वार्ताओं के लिए कतई तैयार नहीं हुए. यूक्रेन को अब अपने संविधान में संशोधन करना होगा और दोन्येत्स्क क्षेत्र के लोगों को कानूनी अधिकार देने होंगे. इस बात पर भी सहमति हुई है कि उनके क्षेत्र को एक विशेष दर्जा दिया जायेगा.
जर्मनी के एक पूर्वी यूरोप विशेषज्ञ हेनिंग श्रोएडर ने अखिल जर्मन टेलीविज़न नेटवर्क 'एआरडी' से कहा कि 13-सूत्री कार्यसूची को सितंबर 2014 वाले प्रथम मिंस्क समझौते का ही नया, संशोधित संस्करण कहा जा सकता है. उसमें सीमाओं की निगरानी रखने और पूर्वी यूक्रेन में चुनाव करवाने की तकनीकी व्यवस्थाओं को शामिल किया गया है. उसमें कुछ ऐसी भी बातें हैं, जो विवाद का विषय बन सकती हैं. जैसे यह बात कि यूक्रेन को संविधान में संशोधन द्वारा पूर्वी यूक्रेन के विद्रोहियों वाले क्षेत्रों को ''वस्तुतः  नए राज्यों का दर्जा'' देना होगा. श्रोएडर का मानना है कि राष्ट्रपति पोरोशेंको इस संशोधन को संसद में आसानी से पास नहीं करवा पायेंगे. इसी तरह ' सभी अवैध ग्रुपों को निहत्था करने' की बात भी एक ऐसी शर्त है, जो शायद ही पूरी हो पायेगी. यूक्रेन में सरकार की तरफ से भी और सरकार के विरोधियों की तरफ़ से भी बहुत सारे ऐसे स्वयंसेवी या भाड़े के सैनिक गिरोह लड़ रहे हैं, जिनकी नकेल किसी के पास नहीं है.

रूस चाहे, तो 48 घंटों में पूर्वी यूक्रेन हथिया ले

'एआरडी' के ही एक दूसरे कार्यक्रम में 2000 से 2002 तक जर्मनी के सेनाध्यक्ष और 2002 से 2005 तक नाटो की सैन्य समिति के अध्यक्ष रहे जनरल हाराल्ड कूयात ने अपने एक बयान से खलबली मचा दी. उनका कहना था, 'यूक्रेन में सैनिक बलप्रयोग से पश्चिम के लिए कोई हल नहीं निकल सकता. यदि हम इतने मूर्ख हो सकते हैं कि इस युद्ध में हस्तक्षेप करें, तो कभी जीत नहीं सकते. हम हारेंगे और एक भारी आपदा को न्यौता देते हुए हारेंगे. जबकि रूस के लिए सैनिक हल संभव है. (राष्ट्रपति) पूतिन ने अब तक काफ़ी धैर्य दिखाया है. कब तक और दिखायेंगे, कोई नहीं जानता. रूस यदि वाकई चाहे, तो इस लड़ाई को मात्र 48 घंटों में निपटा सकता है. इसे बिल्कुल साफ़-साफ़ कह देने की ज़रूरत है.'
जनरल कूयात के शब्दों में, 'राष्ट्रपति पूतिन ने एक बार कहा कि यदि वे चाहें तो दो सप्ताह में यूक्रेन की राजधानी किएव पहुंच सकते हैं. यह तो बहुत बढ़ा-चढ़ा कर कहा. वे 5-6 दिनों में ही किएव पहुंच सकते हैं. पूर्वी यूक्रेन में तो लड़ाई 48 घंटों में ही पूरी हो जायेगी.' जनरल कूयात का कहना था कि यह पश्चिम का झूठा 'प्रचार' है कि पूर्वी यूक्रेन में नियमित रूसी दस्ते लड़ रहे हैं. जर्मनी के पूर्व सेनाध्यक्ष का दोटूक कहना था, 'वहां छिट-फुट रूसी सैनिक हो सकते हैं. रूसी हथियार भी हो सकते हैं. लेकिन नियमित रूसी दस्ते यदि वहां होते, तो मामला 48 घंटों में ही निपट जाता.'
उनका इशारा इस बात की ओर था कि पश्चिमी देश, विशेषकर अमेरिका, पूर्वी यूक्रेन में रूसी सैनिक और हथियार होने के आरोप लगा कर वहां अपने हस्तक्षेप की भूमिका बनाने में लगे हैं. यदि उनके आरोप सच होते, तो राष्ट्रपति पूतिन या तो मिंस्क जाते ही नहीं. जाते भी तो ऐसे किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करते, जिससे यूक्रेन के रूसी-भाषी विद्रोहियों का न तो रूस के साथ विलय का और न अपने अलग स्वतंत्र देश का सपना साकार होता दिखता है. विद्रोहियों के प्रतिनिधि इसी कारण मिंस्क समझौते से कतई खुश नहीं हैं और यह संशय बना हुआ है कि वहां यदि हथियार ठंडे पड़े भी तो कब तक ठंडे रहेंगे.