नीतीश कुमार ने सोचा होगा कि कुर्सी का त्याग करने के बाद बिहार की जनता उन्हें सिर पर बिठा लेगी और जीतनराम मांझी उनके चरणों में बैठे रहेंगे. हुआ उल्टा. मांझी उनके सिर पर बैठ गए और जनता ने पैरों के नीचे से ज़मीन खिसका दी.
नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी को चुना, यह उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल थी. न खुदा ही मिला न बिसाले सनम. नीतीश सोनिया गांधी की तर्ज पर त्याग पुरुष बनना चाहते थे लेकिन सोनिया तो छोड़ो वे पुराने नीतीश कुमार भी नहीं रह पाए. जहां सोनिया गांधी ने यह व्यवस्था पूरे 10 साल चलाई थी वहीं नीतीश को कुछ महीने ही भारी पड़ गए. उन्होंने सोचा होगा कि कुर्सी का त्याग करने के बाद बिहार की जनता उन्हें सिर पर बिठा लेगी और मांझी उनके चरणों में बैठे रहेंगे. हुआ उल्टा. मांझी उनके सिर पर बैठ गए और जनता ने पैरों के नीचे से ज़मीन खिसका दी. कुल मिलाकर नीतीश की छवि ऐसे नेता की बन रही है जो सत्ता के लिए त्याग-तपस्या की सिर्फ बातें किया करते थे. जिस कुर्सी को उन्होंने छोड़ा था उसी कुर्सी के लिए वे पटना से दिल्ली तक चक्कर लगा रहे हैं. अभी भी उन्हें 20 फरवरी तक का इंतजार करना होगा. 20 फरवरी के बाद मांझी का कुर्सी से हटना करीब-करीब तय है. लेकिन नीतीश की साख पर उन्होंने एक बड़ा बट्टा लगा दिया है.
नीतीश की इस लाचारी और बेचारगी का सबसे ज्यादा फायदा लालू उठा रहे हैं. पहले उन्होंने मांझी को शह दी, फिर नीतीश कुमार को मात देने के लिए उनकी पीठ पर हाथ रख दिया.
नीतीश की इस लाचारी और बेचारगी का सबसे ज्यादा फायदा लालू उठा रहे हैं. पहले उन्होंने मांझी को शह दी, फिर नीतीश कुमार को मात देने के लिए उनकी पीठ पर हाथ रख दिया. मांझी तो जाएंगे, लेकिन उन्होंने नीतीश को लालू यादव का शरणागत बनाकर छोड़ा है. जो नीतीश कभी किसी से दबते नहीं थे, वे अब दिखते नहीं हैं. कमजोर नीतीश कुमार, लालू और भाजपा दोनों को ही सूट करते हैं. वाकई ये नीतीश कुमार के लिए सबसे मुश्किल वक्त है. बड़ी मुश्किल और मेहनत से उन्होंने उस पुराने नीतीश और बिहार की अपनी राजनीति को गढ़ा था. लेकिन एक मांझी ने उस नीतीश को गायब कर दिया है. अब वे भी सामान्य नेताओं की श्रेणी में दिखने लगे हैं. सियासत में एक गलती कितनी भारी पड़ती है यह नीतीश से पूछिए. आज भी वे उस दिन, मूहुर्त और सबसे ज्यादा खुद को कोस रहे होंगे जब उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के लाख मना करने के बावजूद मांझी पर दांव खेला था. मोदी के प्रधानमंत्री बनने से नीतीश को एक झटका लगा था. खुद का सपना टूटने से ज्यादा बड़ा गम था, उस व्यक्ति का सपना पूरा होना जिसे वे जरा भी पसंद नहीं करते थे.
कहीं न कहीं बिहार की जनता उस नीतीश कुमार को ज़रूर मिस कर रही होगी जिसे उसने साढ़े चार बरस पहले इतने जबर्दस्त बहुमत के साथ मुख्यमंत्री चुना था.
धीरे-धीरे नीतीश के पास से सब चला गया. सुशील मोदी जैसा मेहनती, विश्वस्त और मिलकर चलने वाला नेता एक सहयोगी के तौर पर कहां मिलता है? राजनीतिक गठबंधनों में अधिकतर तू-तू-मैं-मैं ही होती रहती है. लेकिन बिहार में ऐसा नहीं हुआ करता था. अब नीतीश को बीजेपी की तरफ से सुशील मोदी ही ललकार रहे हैं. वे कभी खुद को नरेंद्र मोदी के बराबर समझते थे लेकिन अब सुशील मोदी की दहाड़ सुनते हैं. जो नीतीश कुमार लालू यादव का मजाक उड़ाते नहीं थकते थे, वे लालू के साथ राष्ट्रपति भवन के अहाते में हाथ मिलाते हैं. कहीं न कहीं बिहार की जनता उस नीतीश कुमार को ज़रूर मिस कर रही होगी जिसे उसने साढ़े चार बरस पहले इतने जबर्दस्त बहुमत के साथ मुख्यमंत्री चुना था. बिहार में अब वैसा नेता कोई नहीं बचा. नीतीश कुमार भी वह नीतीश नहीं रहे. अगर कोई टाइम मशीन होती तो नीतीश एक गलती सुधारना चाहते. मांझी को मुख्यमंत्री न बनाते. अपने घर के ही खोटे सिक्के पर दांव लगाने की गलती ठीक कर लेते. आज मांझी तो कुर्सी पर मजे कर रहे हैं, नीतीश जगह-जगह तरह-तरह की गुहार लगा रहे हैं. कुर्सी मिल भी गई वह रौब, रसूख और रुतबा कहां से मिलेगा? वे उस नीतीश कुमार को कहां से लाएंगे जिसकी शक्ल तो ऐसी ही थी लेकिन छवि की बात ही कुछ और थी. राजनीति में चेहरे से ज्यादा अहम होती है नेता की छवि. जनता छवि को ही तो मानती-पूजती है.