व्यर्थ का हंगामा है. फिल्मों में लाज की पहल करने वाले पहलाज एक भले आदमी हैं. वो तो इतने सालों तक बॉलीवुड के लिए इतना करने के बाद भी उनका विकिपीडिया पर पेज नहीं बनाया किसी ने इसलिए दुख में 36 शब्दों और अभिव्यक्ति के कुछ इशारों-विचारों को बैन कर बैठे. कोई पहल कर पहलाज पर विकी पेज बना दे. उस पर मोदी जी के लिए उनके बनाए ‘अलौकिक’ वीडियो का जिक्र टॉप पर कर दे, वे आज ही उन पाबंदियां को फिल्मों से हटा देंगे. इसके बाद इन्हीं 36 शब्दों के इर्द-गिर्द वे सिनेमा का अगला शाहकार प्रोड्यूस करने को तैयार भी हो जाएंगे.

आप सिनेमा को दी उनकी हथेली की टेक को नजरअंदाज नहीं कर सकते. भारतीय सिनेमा के ‘स्वच्छता अभियान’ का प्रमुख चेहरा बनने से पहले उनकी फिल्मों पर एक पूरी पीढ़ी छुप-छुप कर बड़ी हुई है. उस पीढ़ी के लिए पहलाज निहलानी की फिल्में आज भी कल्ट क्लासिक हैं. उस पूरी पीढ़ी को पहलाज निहलानी से प्यार है, इतना कि वह उनके प्यार में निहाल है.

‘ले लो, ले लो मेरा इम्तिहान’ (फिल्म- अंदाज) में इम्तिहान ऐसे आता है जैसे सेंसर की कड़ाई की वजह से किसी और शब्द को सूरत बदल कर लगा दिया गया हो

निहलानी के सिनेमा से इस पीढ़ी की पहली मुलाकात ‘हथकड़ी’ फिल्म से हुई. शराब पीकर जंगल में अकेली लड़की को कैसे मदद दी जाती है, उसके कपड़े हवा में कैसे उड़ाए जाते हैं, स्लो मोशन में कैमरा महिला का किस तरह से सम्मान कर सकता है, इसे पूरी डिटेलिंग के साथ दिखाने वाले उस दृश्य में इतनी सज्जनता थी कि यहां पूरी की पूरी बताई तक नहीं जा सकती. फिर हमारे जीवन में ‘आंधी-तूफान’ आई. इसमें आइटम गर्ल को देखकर डैनी अपनी जीभ से ऐसी-ऐसी आकृति बनाते हैं कि अभी तक की खोजी हुई सभ्यताओं में ऐसी आकृतियां नहीं खोजी जा सकीं हैं. इसके बाद ‘आग ही आग’ परवान चढ़ी. हीरोइन नीलम खूबसूरत हीरो (चंकी पांडे!) को देखकर रात में सौम्य होते हुए गाने लगती है, वो गीत जिसमें हिचकी आने के बाद प्यास के जगने का जिक्र है. इस जिक्र के बाद हीरोइन की प्यासी आंखें हीरो पर रुकने से पहले कैमरे को कई बार हीरोइन के खास स्थलों पर रुकने का निर्देश है. इसके बाद एक ‘आग लग गई जी बरसातों में’ गीत है जिसके खास स्थलों का साधारण वर्णन करने का साहस भी लेखक में नहीं है.

लेकिन लेखक जैसे कम साहसी लोगों की उस पीढ़ी को संभालने पहलाज जी निहलानी बार-बार आगे आते रहे. वे अपनी फिल्मों के कैमरे को नायिका के शरीर के खास स्थलों पर रोककर उस पीढ़ी को संबल देते रहे. उनकी अनेकों फिल्मों ने उस कम साहसी पीढ़ी को जागरुक और शिक्षित करते रहने का बीड़ा उठाया हुआ था. चाहे वो ‘पाप की दुनिया’ हो या ‘गुनाहों का फैसला’ जिसमें डॉल्बी डिजिटल में डिंपल कपाड़िया ‘बंद कमरे में होगा फैसला प्यार का’ गाती हैं, निहलानी का कैमरा हमेशा वही काम करता रहा जिसके लिए उन्होंने उसे प्रशिक्षित किया था. या फिर वो गीत जो सिनेमा में शायद हायर एजुकेशन देने का कर्तव्य निभाने निकला था- ‘जवानी में जवानी के मजे लेना जवानी है.’ इस हायर एजुकेशन में टॉप का पीरियड था फिल्म ‘फर्स्ट लव लेटर’ में मनीषा कोइराला और विवेक मुश्रान का कंबल के अंदर वाला गीत, ‘कंबल न हटाओ मुझे लगता है डर...कोई जतन तो कर, कहीं कुछ न आज हो जाए कंबल के अंदर’.

इसके बाद, वे दो फिल्में आईं जिन्होंने सिनेमा के एब्स्ट्रेक्ट रूप से हमारी पीढ़ी को परिचित करवाया. अनिल कपूर और जूही चावला की ‘अंदाज’ में उस पीढ़ी ने जब अनिल कपूर को गाते सुना ‘खड़ा है, खड़ा है, खड़ा है’, ‘खोल, खोल, खोल’ तब ऐसे गीतों के असल मतलब सीखने के लिए हमने दिमाग खोलना सीखा. ‘ले लो, ले लो मेरा इम्तिहान’ में इम्तिहान ऐसे आया जैसे सेंसर की कड़ाई की वजह से किसी और शब्द को सूरत बदल कर लगा दिया गया हो. यह गीत ‘ले लो मेरा इम्तिहान’ भारतीय सभ्यता का वह प्रतीक है जिसे खजुराहो के मंदिर में शान से बड़ी टीवी पर चलाया जा सकता है. एक और गीत, ‘मैं मालगाड़ी तू धक्का लगा’ भी साथ में चले तो निरंतरता बरकरार रहेगी. वैसे तो, ये दोनों ही गीत और साथ में ‘रोज करेंगे हम कूंकूं कूंकूं’ पहलाज निहलानी साहब के दफ्तर में बड़ी स्क्रीन पर चलते रहने चाहिए, क्योंकि ऐसी उपलब्धियां छिपाने के लिए नहीं, दिखाने के लिए होनी चाहिए.

अगर ‘अंदाज’ एक मास्टरपीस कही जा सकती है तो निहलानी की अगली फिल्म ‘आंखें’ उसी मास्टर का एक और पीस थी

अगर ‘अंदाज’ एक मास्टरपीस थी तो निहलानी की अगली फिल्म ‘आंखें’ उसी मास्टर का एक और पीस थी. यह वही फिल्म है जिसके आने के बाद उस पीढ़ी ने जब-जब प्रेमिका के घर जाने की बात सोची तो ‘खेत गए बाबा, बाजार गई मां, अकेली हूं घर में तू आ जा बालमा’ जैसे साहित्यिक गीत को बार-बार सुनकर ही ऐसा करने का साहस किया. ‘ओ लाल दुपट्टे वाली’ ने ‘पहली मुलाकात में लड़की नहीं खुलती, हर अजनबी पे दिल की ये खिड़की नहीं खुलती’ का ऐसा ज्ञान दिया कि हर किताब ने कुछ दिनों के लिए खुद को बंद रखना ही बेहतर समझा. हमने भी बंद किताबों को खोलना वक्त की फिजूलखर्ची समझा और पहलाज निहलानी जी की फिल्मों से ही भारतीय संस्कार, सभ्यता, संस्कृति, कुछ अश्लील कहने के लिए सांकेतिक भाषा का चयन और दिअर्थी वाक्यों में क्रिएटिव होने जैसे महान भारतीय तत्वों को गंभीरता से आत्मसात किया.

धूप सेंसर नहीं होती, कितनी अच्छी बात है. नहीं तो श्रीमान पहलाज निहलानी की उन 36 बर्फ की सिल्लियों को पीठ पर ढो रहे हम कभी भी अपनी पीठ धूप में नहीं सेंक पाते. किताबें सेंसर नहीं हो पातीं, सबसे अच्छी बात है. नहीं तो हम और आज के बच्चे समझ ही नहीं पाते कि गालियां भी किसी सभ्यता का उतना ही अभिन्न हिस्सा हैं जितना धर्म और ईश्वर. गुफ्तगू सेंसर नहीं होती, खुदा की नियामत है. नहीं तो पता ही नहीं चल पाता कि समाज में कितनी अश्लीलता है जो विभिन्न स्तरों पर स्वीकार्य है और हर स्तर पर समाज के सेंसर बिना किसी जबरदस्ती के सुचारू रूप से चलते आ रहे हैं. उन्हें सरकारी सेंसर की आजतक जरूरत नहीं पड़ी.

लेकिन मूर्खता प्राकृतिक रूप से सेंसर होती है. पहलाज पहले नहीं हैं जिन्होंने गंदगी साफ करने का दावा करके सबसे ज्यादा गंदगी फैलाना शुरू की है. वे निर्माता बनकर जिस नाव में बैठकर फिल्मी दुनिया का चक्कर लगाते थे, अब उसी नाव को उलटने के बाद उसपर बैठकर सेंसर बोर्ड के दफ्तर जाते हैं. लेकिन इतिहास में, वे जो शब्दों और विचारों पर ताला लगाने आते रहे हैं, चाबियों को सरकार बनाते रहे हैं, कुछ समय बाद खुद ही मात भी खाते रहे हैं. वे इस बार भी मात खाएंगे, क्योंकि हर शब्द और हर विचार चाबियों का मोहताज नहीं होता, दर्शकों की नजर का होता है, और जब दर्शक नजर करेंगे, तो सेंसर बोर्ड अध्यक्ष क्या करेंगे. हवन करेंगे?