जो समिति कांग्रेस ने इस मकसद के साथ बनाई थी कि वह मोदी सरकार को घेरने में पार्टी की मदद करेगी वह समिति खुद मुश्किलों में घिरी है.
मोदी सरकार के खिलाफ कांग्रेस एक असरदार विपक्ष कैसे बने, इस दिशा में मदद करने के लिए चार महीने पहले पार्टी ने एक समिति बनाई थी. चार सदस्यों वाली इस समिति को खुद मदद की जरूरत पड़ गई है. समस्या इस सवाल को लेकर है कि समिति की कमान किसके हाथ में रहे.
रिसर्च एंड कोऑर्डिनेशन कमेटी नाम की इस समिति को कांग्रेस ने बीते साल अक्टूबर में बनाया था. लेकिन, अब तक इसकी कोई खास उपलब्धि नहीं दिखती. बताया जा रहा है कि इसके सदस्यों में ही इस बात को लेकर खींचतान चल रही है कि समिति की अगुवाई कौन करेगा. संदीप दीक्षित, राजीव गौड़ा, रणदीप सुरजेवाला और संजय निरुपम समिति के सदस्य हैं. खबरें हैं कि अब पार्टी नेतृत्व को इस मुद्दे में दखल देना ही पड़ेगा क्योंकि अक्टूबर से लेकर अब तक एक बार भी समिति की बैठक नहीं हुई है.
इस समिति को काफी उम्मीदों के साथ बनाया गया था. कहा जा रहा था कि पूर्व केंद्रीय मंत्रियों और उनकी विशेषज्ञता को ध्यान में रखकर बनाई गई यह समिति केंद्र सरकार को घेरने में कांग्रेस की मदद करेगी. पार्टी के पास लोकसभा में सिर्फ 44 सांसद हैं और उसे यह चिंता सता रही थी कि इतनी कम संख्या के साथ वह भारी बहुमत पा चुकी भाजपा सरकार पर हमलावर कैसे होगी. इसके लिए रास्ता निकाला गया कि एक विशेषज्ञ समिति बनाई जाए जो ऐसी जानकारियां जुटाए जिनसे मोदी सरकार को सार्वजनिक रूप से घेरा जा सके.
पार्टी को चिंता थी कि इतने कम सांसदों के साथ वह भारी बहुमत पा चुकी भाजपा सरकार पर हमलावर कैसे होगी. इसके लिए रास्ता निकाला गया कि एक विशेषज्ञ समिति बनाई जाए जो ऐसी जानकारियां जुटाए जिनसे मोदी सरकार को सार्वजनिक रूप से घेरा जा सके.
तब समिति के सदस्य संजय निरूपम का कहना था, 'हम सरकार पर करीब से नजर रखेंगे. हम इसकी नीतियों की समीक्षा करेंगे. नीतियों के अचर्चित पहलुओं और उनके नतीजों को सबके सामने लाएंगे.' इसके चलते अंदाजा लगाया जा रहा था कि इस समिति का दायरा काफी बड़ा होगा और शोधकार्य इसके केंद्र में होगा. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के औंधे मुंह गिरने के बाद पार्टी का यह पहला बड़ा फैसला था और लगा था कि पार्टी आगे की राह के प्रति गंभीर हो गई है.
लेकिन समिति का जो हाल है वह बताता है कि कांग्रेस में कुछ नहीं बदला है. जानकार मानते हैं कि कुल जमा चार लोगों के पैनल में चार महीने तक एक संयोजक न चुना जा सके तो सवाल तो खड़े होते ही हैं. गौड़ा राज्यसभा सांसद हैं. दीक्षित दो बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं और अतीत में एक ऐसे पैनल की अगुवाई कर चुके हैं. निरूपम मुंबई से आते हैं जबकि हरियाणा से ताल्लुक रखने वाले सुरजेवाला कांग्रेस के प्रवक्ता भी हैं. बताया जा रहा है कि सुरजेवाला और निरूपम के कंधों पर पहले से ही काफी जिम्मेदारियां हैं और इसके चलते इस समिति की अगुवाई करने में उनकी दिलचस्पी नहीं है.
उधर, खबरों के मुताबिक गौड़ा ने इससे इनकार किया है कि समिति के नेतृत्व को लेकर कोई खींचतान है. एक अखबार के साथ बातचीत में उनका कहना था कि वे अपनी खुद की टीम के साथ रिसर्च का काम कर रहे हैं और यह काम पार्टी नेताओं और सांसदों द्वारा मोदी सरकार पर हमले को मजबूत बना रहा है. गौड़ा के मुताबिक समिति की एक बार बैठक भी हुई है जिसमें एक सदस्य नहीं आ सका. उधर, संदीप दीक्षित का कहना है कि यह मुद्दा पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से बातचीत के बाद सुलझा लिया जाएगा.