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जिन क्षेत्रों से भारत की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की उम्मीद लगाई जा रही थी उनका हाल यह है कि बैंकों के लाखों करोड़ रु उनमें फंसे हुए हैं.
कुछ ही दिनों में आम बजट पेश होने वाला है. वित्त मंत्रालय उन उपायों पर माथापच्ची कर रहा है जिनसे देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आ आए. लेकिन इस सुधार के जो रास्ते हैं उनका हाल बद से बदतर होता दिख रहा है. यह संकेत उस लगातार गहरा रहे संकट से मिलता है जिसका सामना सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कर रहे हैं. संकट उस कर्ज का है जिसके वापस आने के आसार न के बराबर हैं.
ऐसे कर्जों को बैंकिंग की शब्दावली में नॉन परफॉर्मिंग एसेट यानी एनपीए कहा जाता है. चिंता की बात यह है कि ये कर्ज उन क्षेत्रों में दिए गए हैं जिनके बारे में उम्मीद जताई जा रही थी कि वे भारत की अर्थव्यवस्था को उबारने में अहम भूमिका निभाएंगे. सरकार के मुताबिक इस रकम का एक अहम हिस्सा इंफ्रास्ट्रक्चर (ऊर्जा, दूरसंचार, सड़क, रेल, बंदरगाह आदि), स्टील उद्योग, खनन और वायु परिवहन जैसे क्षेत्रों में फंसा हुआ है.
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकार सबसे बड़ी हिस्सेदार होती है. सरकार का नुकसान यानी आम करदाता का नुकसान.
अलग-अलग खबरों के मुताबिक बीते नौ महीने के दौरान बैंकों के एनपीए का आंकड़ा 20 फीसदी बढ़ गया है. गौरतलब है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अलग-अलग कंपनियों या व्यक्तियों को दिए गए कुल व्यावसायिक कर्ज में 72 फीसदी के हिस्सेदार हैं. लगभग डूब गए इस पैसे का कुल हिसाब निकाला जाए तो यह करीब 2.73 लाख करोड़ रु बैठता है. यह बैकों द्वारा दिए गए कुल कर्ज के पांच फीसदी से भी ज्यादा है.
यह आंकड़ा तब और भी चिंतानजक लगता है जब इसमें वह कर्ज भी जोड़ दिया जाए तो कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग के तहत आता है. गौरतलब है कि सीडीआर तब की जाती है जब किसी कंपनी का कारोबार मंदा चल रहा हो और वह बैंक से प्रार्थना करे कि उसे कर्ज वापसी की प्रक्रिया में थोड़ी राहत दी जाए. उदाहरण के लिए यह राहत ऐसे दी जा सकती है कि कंपनी से कहा जाए कि वह एक साल बाद कर्ज वापस करना शुरू करे. हालांकि तब भी इसके काफी आसार होते हैं कि पैसा डूब जाए फिर भी सीडीआर के तहत डाला गया कर्ज एनपीए में शामिल नहीं किया जाता. बीते दिसंबर तक सीडीआर के तहत दिए गए कर्ज का आंकड़ा था 2.72 करोड़ रु.
यानी अगर एनपीए और सीडीआर को जोड़ दिया जाए तो बैंकों के करीब साढ़े पांच लाख करोड़ रु फंसे हुए हैं. इसे कई तरह से देखा जा सकता है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकार सबसे बड़ी हिस्सेदार होती है. सरकार का नुकसान यानी अलग-अलग कर चुकाने वाले देश के आम आदमी का नुकसान. एनपीए का स्तर ऊंचा होने का दूसरा असर यह होता है कि बैंक की कर्ज देने की क्षमता में गिरावट आ जाती है. इसका तीसरा पहलू यह है कि अपना विस्तार करने के लिए बैंक को नई पूंजी की जरूरत होती है. एनपीए ज्यादा हो तो शेयर बाजार में बैंक की छवि पर प्रतिकूल असर पड़ता है. इससे पूंजी जुटाने की बैंक की क्षमता घटती है. इन सारी चीजों का बुरा असर अंतत: अर्थव्यवस्था पर ही पड़ता है.