नीतीश कुमार और लालू यादव
नीतीश कुमार और लालू यादव
यह मामला नीतीश और लालू यादव का नहीं, लोकतंत्र की अपनी अपरिहार्यता का है. वे अगर इसे न समझते हुए राजनीति को अपने व्यक्तिगत करिश्मे और अहंकार से चलाने की सोचते रहेंगे तो इतिहास के घूरे पर फेंक दिए जाएंगे.
बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने विश्वास मत से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया है. जाहिर है, उन्हें मालूम था कि जेडीयू और आरजेडी की साझा ताकत के सामने भाजपा उन्हें बचा नहीं पाएगी. वे पहले से ही एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे थे. यह छोटी बात नहीं है कि अपनी जिद से उन्होंने यह लड़ाई इस मोड़ तक पहुंचा दी थी. इस लिहाज से जीतनराम मांझी के साथ सहानुभूति होती है. वे राजनीति की धारा के विरुद्ध भी खड़े थे और इतिहास की धारा के विरुद्ध भी. बिहार की सियासी उठापटक में पहली बार एक महादलित मुख्यमंत्री बना और फिर उसी उठापटक का शिकार होकर विदा हो गया.
दरअसल भाजपा को जीतनराम मांझी की परवाह नहीं थी. उसे बस मांझी का इस्तेमाल कर नीतीश कुमार का पत्ता काटना था. जैसे कभी नीतीश कुमार का इस्तेमाल कर उसने लालू यादव का सफ़ाया किया था.
लेकिन इस पूरे खेल में भाजपा की भूमिका सबसे बुरी रही. यह शायद दिल्ली के झटके का असर था कि बिहार में खुला खेल खेलने से पहले वह हिचकती रही और परदे के पीछे छुपी रही. जब विश्वास मत की तारीख़ आ गई तब भाजपा ने जीतनराम मांझी को समर्थन देने की बात कही. दरअसल भाजपा को जीतनराम मांझी की परवाह नहीं थी. उसे बस मांझी का इस्तेमाल कर नीतीश कुमार का पत्ता काटना था. जैसे कभी नीतीश कुमार का इस्तेमाल कर उसने लालू यादव का सफ़ाया किया था. इस बार भी वह कम से कम इस खेल में कामयाब रही कि उसने जीतनराम मांझी के भीतर राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा जगाई, अपने समर्थन का भोला भरोसा जगाया और अंततः जेडीयू के भीतर के दरार पैदा कर दी.
हालांकि इन सबसे शायद दीर्घकालीन राजनीति को बहुत फर्क नहीं प़ड़ता. नब्बे के दशक में मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव बड़े गुरूर से कहा करते थे कि अगले 20 बरस तक वे राज करते रहेंगे. लोकतंत्र ने उनका यह गुरूर तोड़ दिया, लेकिन इतिहास की धारा नहीं पलटी. लालू यादव की जगह एक दूसरे पिछड़े नेता नीतीश कुमार आ गए. नीतीश ने अपना स्थानापन्न जीतन मांझी में पाया. अब जीतन मांझी की विदाई हो चुकी है और बिहार फिर से दोराहे पर खड़ा है.
लेकिन इस दोराहे से बिहार जो भी रास्ता चुनेगा, वह भाजपा की गली में खुलने वाला नहीं है. बिहार में जो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आ रहे हैं, वे बता रहे हैं कि जेडीयू और आरजेडी मिलकर भाजपा को आसानी से शिकस्त दे देंगे. मगर मामला सिर्फ चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों का नहीं, संसदीय लोकतंत्र की अपनी गति का भी है. भाजपा इस गति में, बेशक, अपने बल से हेरफेर करती रही है, लेकिन यह काम उसने अपने वास्तविक स्वरूप में नहीं, रूप बदल कर किया है. केंद्र में भी अपने जाने-पहचाने मुद्दों को छोड़कर वह आक्रामक विकास की आकर्षक पैकेजिंग के जरिए आई. बिहार में भी वह अपना रास्ता पिछड़ों और दलितों की हमदर्द होने की दावेदारी के साथ ही बना सकती है.
बेशक, जेडीयू और आरजेडी की अपनी राजनीति की बहुत सारी पतनशीलताएं हैं. लालू यादव का राज कई लोगों की निगाह में जंगल राज रहा. लेकिन दरअसल फिर दुहराने की ज़रूरत है कि यह मामला नीतीश और लालू यादव का नहीं, लोकतंत्र की अपनी अपरिहार्यता का है. नीतीश-लालू यह सच नहीं समझेंगे और राजनीति को अपने व्यक्तिगत करिश्मे और अहंकार से चलाने की सोचते रहेंगे तो इतिहास के घूरे पर फेंक दिए जाएंगे. इतिहास अपने नए नायक बना लेगा.