भाजपा और पीडीपी के नेताओं की मानें तो अमित शाह ने भाजपा का मुख्यमंत्री बनाने के लिए पीडीपी के साथ बहुत हार्ड बार्गेंनिंग की.
सियासत में सिद्धांत, विचारधारा, वादे और कसम जैसी चीजों की कोई गारंटी नहीं. कुर्सी और पद, दो चीजें सबसे अनमोल हैं. जम्मू-कश्मीर में जो कोई सोच नहीं सकता था, वह अब होने ही वाला है. यहां भाजपा और पीडीपी की सरकार बनना करीब-करीब तय है. जो चुनाव में दो धुरी बने एक-दूसरे के खिलाफ खम ठोंक रहे थे. अब मिलने ही वाले हैं. मुफ्ती मोहम्मद सईद जम्मू-कश्मीर के अगले मुख्यमंत्री बनेंगे. बीजेपी के विधायक निर्मल सिंह बीजेपी की तरफ से राज्य के उपमुख्यमंत्री बनेंगे. ये बात अब तय हो चुकी है. इस 'डील' के फाइनल होने के बाद ही पीडीपी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती दिल्ली आईं और अमित शाह के बेटे की शादी के रिसेप्शन में शामिल हुईं. अमित शाह ने बार-बार संघ के संशकित नेताओं को मनाया तो फिर वह भी दोनों के बीच तमाम शर्तों और वादों से निकले समझौते के लिए राजी हो गया.
अमित शाह ने बार-बार संघ के संशकित नेताओं को मनाया तो फिर वह भी दोनों के बीच तमाम शर्तों और वादों से निकले समझौते के लिए राजी हो गया.
चौंकाने वाली खबर यहीं खत्म नहीं होती. कश्मीर में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री भी बन सकता है. बीजेपी और पीडीपी के नेताओं की मानें तो इस बार अमित शाह ने बहुत हार्ड बार्गेंनिंग की. उन्हें इस बात की जिद थी कि हर हाल में जम्मू-कश्मीर में भाजपा का मुख्यमंत्री बनाना है. पीडीपी और बीजेपी के बीच जो डील लगभग हो ही गई है वह सबको हैरान कर सकती है. इसके मुताबिक शुरू में तीन साल मुख्यमंत्री का पद पीडीपी यानी मुफ्ती मोहम्मद सईद के पास रहेगा और आखिरी तीन साल जम्मू-कश्मीर में भाजपा का मुख्यमंत्री होगा. अगर यह फॉर्मूला आखिरी बाधा भी पार कर गया तो इसके मुताबिक चलने वाली सरकार में जब सईद मुख्यमंत्री होंगे तो बीजेपी के मंत्रियों की संख्या ज्यादा होगी. जब राज्य में भाजपा का मुख्यमंत्री होगा तो उस वक्त ज्यादा संख्या में मंत्री पीडीपी के होंगे. सूत्रों के मुताबिक, इस व्यवस्था के अनुसार राज्य में जिस पार्टी का मुख्यमंत्री होगा उसी के पास गृह और वित्त मंत्रालय भी रहेंगे. बाकी अहम मंत्रालय जैसे स्वास्थ्य, पर्यटन, जल संसाधन आदि दूसरी पार्टी के पास होंगे. अगर तीन साल तक यह गठबंधन चला तो उसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जीतेंद्र सिंह को सीएम की कुर्सी पर बिठाया जा सकता है.
ऐसा नहीं है कि पीडीपी और भाजपा इस मुकाम तक आसानी से पहुंच गए. भाजपा की शर्तों को मानने के एवज में पीडीपी की भी शर्तें बेहद कड़ी थीं. पाकिस्तान से बातचीत करना भी इन्ही में शामिल था. सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने अचानक क्रिकेट डिप्लोमेसी शुरू की, विदेश सचिव जयशंकर पाकिस्तान जाने वाले हैं तो ये सब भी जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ हुई बातचीत का एक हिस्सा हो सकता है. मुफ्ती चाहते थे जो वादा उन्होंने कश्मीर के लोगों से किया है वो वादा पूरा होता दिखाई दे. आज नहीं तो कल पाकिस्तान से बात शुरू होनी ही थी. वर्ल्ड कप एक अच्छा मौका था. प्रधानमंत्री की तरफ से शुरुआत कर दी गई.
जब सईद मुख्यमंत्री होंगे तो बीजेपी के मंत्रियों की संख्या ज्यादा होगी. जब राज्य में भाजपा का मुख्यमंत्री होगा तो उस वक्त ज्यादा संख्या में मंत्री पीडीपी के होंगे
पीडीपी हुर्रियत से भी बातचीत शुरू करना चाहती है. सूत्र बताते हैं कि पीडीपी को भाजपा की तरफ से भरोसा मिला है कि अभी नहीं लेकिन एक साल के भीतर यह भी हो सकता है. इसके लिए हुर्रियत को भी समझदारी दिखानी होगी. अगले कुछ महीने संभलकर बोलना होगा. मुफ्ती और महबूबा मुफ्ती यह भी चाहते थे कि भाजपा लिखित में दे कि वह धारा 370 के मुद्दे को नहीं उठाएगी. बीजेपी ने ऐसा करने से मना कर दिया. पीडीपी अफस्पा पर भी आशवासन चाहती थी. कम से कम इतना कि इसकी समीक्षा की जाएगी और एक तय समय में इसे राज्य से हटा दिया जाएगा. सरकार, भाजपा और सेना तीनों ने एक सिरे से इसे खारिज़ कर दिया. अब सिर्फ इतना तय हुआ है कि एक कमेटी बनेगी जो अनसुलझे और विवादित मुद्दों पर बात करेगी.
संघ की बात करें तो वह आखिर तक भाजपा और पीडीपी के गठबंधन को लेकर अड़ा और डरा रहा. लेकिन बीजेपी के बड़े नेता उसे यह समझाने में कामयाब रहे कि एक बड़ा सपना पूरा हो रहा है. जम्मू-कश्मीर में बीजेपी की सरकार बन रही है. तीन साल बाद उसका मुख्यमंत्री भी बन सकता है. बड़े सपने पूरे करने के लिए कुछ समझौते करने ही पड़ते हैं. आखिरकार संघ भी मान गया. अमित शाह के बेटे के रिसेप्शन में आकर महबूबा मुफ्ती ने यह संदेश भी दे दिया कि उन्हें अब बीजेपी कबूल है. अब अगले हफ्ते मुफ्ती मोहम्मद सईद की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात होगी जिसके बाद सारी चीजें सामने आ जाएंगी.
राजनीति में यह एक ऐसा मेल होगा जो अबूझ और अभूतपूर्व दोनों है. विचारधार अलग. सोच एकदम विपरीत. बस इतना है कि जम्मू ने जिसे जिताया वह भी सरकार में होगा और कश्मीर में जिस पार्टी को बहुमत मिला वह भी.