व्यापम घोटाले की जांच में जो खामियां सामने आईं हैं उनके बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद पर लगे आरोपों को राजनीतिक कहकर इनसे पल्ला नहीं झाड़ सकते.
मध्य प्रदेश के व्यापम (व्यावसायिक परीक्षा मंडल) घोटाले का शोर थमने का नाम नहीं ले रहा. अब इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दे रही है. कल दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में कथिततौर पर व्हिसिल ब्लोअर रहे एक कंप्यूटर विशेषज्ञ (डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञ) को दिल्ली में सुरक्षा उपलब्ध कराने निर्देश दिया है. इस व्यक्ति का दावा है कि उसने घोटाले की जांच कर रही एसटीएफ की कुछ सबूत जुटाने में मदद की थी. लेकिन मध्य प्रदेश पुलिस अब उसे धमकी दे रही है कि मामले से जुड़ी ‘संवेदनशील जानकारी’ वह किसी को न दे. इसी व्यक्ति ने पिछले दिनों कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को घोटाले से जुड़े कथित असली नामों वाली एक्सेल शीट उपलब्ध करवाई है जिसके बाद अचानक यह मामला फिर सुर्खियों में आ गया.
पिछले हफ्ते कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने व्यापम घोटाले से जुड़े कुछ सबूत जारी किए थे. उनका कहना है कि इनके आधार पर मुख्यमंत्री सीधे-सीधे इस घोटाले में शामिल हैं. उन्होंने मामले की जांच कर रही एसआईटी के सामने हलफनामे के साथ 15 पृष्ठों में सबूत सौंपे हैं. इन सबूतों को सीधे-सीधे खारिज किया जाना आसान नहीं है और इसी आधार पर आने वाले समय में शिवराज सिंह चौहान को कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह व्यापम मामले की सीबीआई से जांच की मांग करते रहे हैं
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह व्यापम मामले की सीबीआई से जांच की मांग करते रहे हैं
एक सवाल यह भी है कि एसटीएफ ने हार्ड डिस्क की ‘हैश वैल्यू’ रिकॉर्ड क्यों नहीं की. यह संख्या बताती है कि हार्ड डिस्क जब कंप्यूटर से जुड़ी थी तब उसमें कितना डेटा था
व्यापम मध्य प्रदेश में मेडिकल, इंजीनियरिंग और दूसरे विषयों के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करता है. इसके अलावा सरकारी विभागों में कुछ नौकरियों ( जैसे पटवारी, संविदा शिक्षक आदि) के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की जिम्मेदारी भी मंडल के पास है. इन परीक्षाओं में फर्जीवाड़े के आरोप व्यापम पर 2009 से लग रहे थे लेकिन बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का खुलासा जून, 2013 में हुआ. उस समय पुलिस ने प्री मेडिकल प्रवेश परीक्षा (पीएमटी) में छात्रों को पास करवाने वाले एक रैकेट का भंडफोड़ किया जिसका सरगना एक डॉक्टर ही था. इस पूरे रैकेट में व्यापम के कुछ अधिकारी शामिल पाए गए. सरकार ने इस मामले की जांच तुरंत एसटीएफ को सौंप दी. व्यापम के असिस्टेंट प्रोग्रामर सीके मिश्रा, सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा और उसके सहायक अजय सेन की इस फर्जीवाड़े में सबसे अहम भूमिका थी. ये लोग परीक्षार्थियों की असली मार्कशीट में हेरफेर कर उन्हें पास करवाते थे. सबसे पहले इनकी ही गिरफ्तारी हुई और व्यापम से दस्तावेज (कागजी रिकॉर्ड के साथ-साथ कंप्यूटर हार्ड डिस्क) जब्त किए गए.
जांच आगे बढ़ने साथ-साथ इस मामले के तार कारोबारियों से लेकर राजनेताओं तक जुड़ने लगे. कंप्यूटर हार्डडिस्क के मिले डेटा के आधार पर जब जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि अन्य प्रवेश परीक्षाओं में उम्मीदवारों को पास करवाने के लिए सिफारिशें भी की गई थीं. इसमें पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती से लेकर कई प्रशासनिक अधिकारियों के नाम सामने आए. नितिन महिंद्रा से पूछताछ के बाद पता चला कि प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने संविदा शिक्षकों की प्रवेश परीक्षा के बाद कई उम्मीदवारों की पैरवी की थी. एसटीएफ ने बाद में शर्मा को भी हिरासत में ले लिया. वे फिलहाल जेल में हैं. भाजपा से जुड़े रहे एक खनन व्यापारी सुधीर शर्मा भी इस मामले में जेल भेजे जा चुके हैं.
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने व्यापम घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपने के लिए पिछले साल नवंबर में जबलपुर हाईकोर्ट में एक याचिका लगाई थी. हाईकोर्ट ने इसपर कोई निर्देश देने से तो मना कर दिया लेकिन एसटीएफ की जांच पर निगरानी के लिए पूर्व न्यायाधीश चंद्रेश भूषण की अध्यक्षता में एक एसआईटी गठित कर दी. हाल ही में सिंह ने एसआईटी को घोटाले से जुड़े सबूत सौंपे हैं.
क्या हैं सबूत?
दिग्विजय सिंह ने एसआईटी को एक एक्सेल शीट (डेटा शीट) सौंपी है. उनका दावा है कि एसटीएफ 2011 के संविदा शिक्षक भर्ती घोटाले की जांच जिस एक्सेल शीट के आधार पर कर रही है, उससे छेड़छाड़ की गई है. यह शीट व्यापम के सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर से निकाली गई थी और अभी तक मामले की जांच इसी आधार पर चलती रही है. सिंह ने जो शीट एसआईटी को सौंपी है उसके अनुसार परीक्षा में शामिल 138 उम्मीदवारों में से 48 के सामने सीेेएम लिखा हुआ था. यानी इनकी सिफारिश मुख्यमंत्री ने की थी. लेकिन फर्जी शीट (जिसके आधार पर जांच चल रही है) में सीएम के स्थान पर सात जगह उमा भारती, एक स्थान पर राजभवन और 21 उम्मीवारों के नाम के आगे मिनिस्टर लिख दिया गया है. दिग्विजय सिंह के अनुसार असली शीट में 17 स्थानों पर मिनिस्टर-2, मिनिस्टर-3, मिनिस्टर-4 भी लिखा है जबकि फर्जी शीट में इन सभी की जगह मिनिस्टर ही लिख दिया गया. दिग्विजय सिंह का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने खुद को बचाने और जांच को संदिग्ध करने के लिए असली एक्सेल शीट से छेड़छाड़ करवाई है.
क्यों ये सबूत पूरी तरह खारिज नहीं किए जा सकते?
दिग्विजय सिंह का दावा है कि एसटीएफ ने नितिन महिंद्रा की कंप्यूटर हार्ड डिस्क से छेड़छाड़ कर फर्जी एक्सेल शीट बनवाई है. यह दावा सीधे-सीधे इसलिए गलत नहीं माना जा सकता क्योंकि एसटीएफ की जांच में कुछ बुनियादी खामियां रही हैं. एसटीएफ ने नितिन महिंद्रा के कंप्यूटर की हार्ड डिस्क को ही जब्त किया जबकि उसे पूरा कंप्यूटर जब्त करना चाहिए था. इसके बिना यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि हार्ड डिस्क किस कंप्यूटर की थी. इसके अलावा एक सवाल यह भी है कि एसटीएफ ने हार्ड डिस्क की ‘हैश वैल्यू’ रिकॉर्ड क्यों नहीं की. यह संख्या बताती है कि हार्ड डिस्क जब कंप्यूटर से जुड़ी थी तब उसमें कितना डेटा था. डिजिटल सबूतों की जांच में यह सबसे ध्यान रखने वाली बात होती है लेकिन एसटीएफ ने अपनी किसी भी चार्जशीट में इसका उल्लेख नहीं किया.
एसटीएफ की जांच पर सबसे बड़ा सवाल गांधीनगर की फॉरेंसिक लैब (डीएफएस) की रिपोर्ट से उठ रहा है. हार्ड डिस्क से डेटा प्राप्त करने के लिए जुलाई, 2013 में इसे डीएफएस भेजा गया था. डीएफएस ने इस डिस्क की क्लोनिंग (किसी हार्ड डिस्क का पूरा डेटा दूसरी डिस्क में लेना) करके कुछ दिन बाद वापस इंदौर पुलिस को भेज दिया. लेकिन इसके बाद यह डिस्क एक बार और क्लोनिंग के लिए डीएफएस भेजी गई. अब सवाल यह है कि यह काम दूसरी बार क्यों किया गया जबकि उस डिस्क से डेटा एक बार प्राप्त किया जा चुका था.
हालांकि इन सवालों के उठने के बाद खुद मुख्यमंत्री ने एसआईटी से अपने खिलाफ लगे आरोपों की जांच करने को कहा है. फिलहाल एसआईटी ने हाई कोर्ट से राज्यपाल राम नरेश यादव के बेटे के खिलाफ जांच करने की अनुमति मांगी है. पिछले दिनों राज्यपाल के बेटे का नाम भी संविदा शिक्षक घोटाले में सामने आया था. जहां तक मुख्यमंत्री पर आरोपों की बात है तो एसआईटी ने अभी तक इसपर कुछ नहीं कहा. लेकिन जिस तरह कांग्रेस आक्रामक होकर यह मामला और जांच से जुड़ी खामियों पर सवाल उठा रही है उससे मुख्यमंत्री चौहान के लिए फिलहाल ‘मिस्टर क्लीन’ वाली छवि बचाना आसान नहीं लग रहा है.