कुछ समय पहले फिलीपींस की अपनी यात्रा के दौरान ईसाई धर्मगुरू पोप फ्रांसिस ने ऐसी कई बातें कहीं जो अपने आप में ऐतिहासिक हैं. अपनी अंतिम सामूहिक सभा (फाइनल मास) में पोप फ्रांसिस ने कहा कि 'पुरुषों को स्त्रियों के विचारों को ज्यादा सुनना चाहिए और खुद को श्रेष्ठ नहीं मानना चाहिए'. पोप के मन में ये विचार उस समय आए जब उनको संबोधित करने वाले पांच लोगों में से चार पुरुष थे. वे हैरान थे कि स्त्रियों का वहां कितना कम प्रतिनिधित्व है.

पोप का कहना था, 'आज के समय में स्त्रियों के पास हमें कहने के लिए बहुत कुछ है. हमने स्त्रियों को कोई जगह नहीं दी है, लेकिन उनके पास चीजों को अलग नजरिए से देखने की दृष्टि है. स्त्रियों के पास ऐसे सवाल खड़े करने की ताकत है जो हम मर्द समझ भी नहीं सकते.' उन्होंने गौर किया कि सवाल पूछने वाले पांच लोगों में से सिर्फ एक 12 साल की बच्ची ही थी जिसने सबसे मुश्किल सवाल किया कि ‘ईश्वर बच्चों को लावारिस क्यों छोड़ देता है?‘

किसी ने नहीं कहा कि भ्रूण हत्या करने वाले को ईश्वर ने नरक में जाने का आदेश दिया है और उसके लिए ‘नरक के ट्रेलर‘ का इंतजाम इसी जीवन में किया जाए.

रोमन कैथोलिक चर्च अपने इस निर्णय पर अभी भी अटल है किसी स्त्री को पादरी नहीं बनाया जा सकता. ऐसी स्थिति में पोप फ्रांसिस का कहना है कि ज्यादा से ज्यादा ननों की भर्ती की जाए, साथ ही वेटिकन में चर्च में उच्च पदों पर ज्यादा स्त्रियों की नियुक्ति की जाए. चुटकी लेते हुए उनका कहना था, ‘जब अगला पोप मनीला आए तो आप लोगों की भीड़ में स्त्रियों की संख्या ज्यादा होनी चाहिए‘. इससे पहले पोप फ्रांसिस ने समलैंगिकों के समर्थन में भी अपने विचार रखे थे. कुल मिलाकर वे पहले ऐसे पोप बने जिन्होंने वैश्विक स्तर पर पहली बार स्त्रियों के प्रति इस कदर संवेदनशीलता दिखाई है और लोगों को उनके प्रति ज्यादा सहिष्णु होने की सीख दी है.

शायद पूरी दुनिया के इतिहास में अभी तक किसी धर्मगुरू ने पुरुषों को ऐसी सीख नहीं दी. अपवादों को छोड़ दें तो सारी दुनिया के धर्मों, धर्मग्रंथों और धर्मगुरुओं की सारी सीखें हमेशा सिर्फ और सिर्फ स्त्रियों के लिए ही रही हैं. क्या भारत में किसी भी पंडित, धर्माचार्य, पादरी, मौलवी या ग्रंथी ने कभी स्त्रियों के संदर्भ में पुरुषों से कोई जेंडर संवेदी अपील की है? कम से कम मेरी जानकारी में तो ऐसा नहीं है. दरअसल अपवादों को छोड़ दें तो हमारे देश के ज्यादातर धर्माचार्य आकंठ भोग और स्त्रियों के यौन शोषण में डूबे हुए हैं. जब-तब किसी न किसी के बारे में भंडाफोड़ होता ही रहता है. जिनका भंडाफोड़ नहीं हुआ है, वे दूध के धुले हैं यह खुद को झूठी तसल्ली देने जैसा होगा. छवि उनकी खराब ही है और यह सिर्फ समय, परिस्थिति और ताकत का खेल है कि उनके पापों का घड़ा कब फूटना है.

क्या सच में ये सारे धर्मग्रंथ किसी सर्वशक्तिशाली ईश्वर ने लिखे हैं. अगर हां तो ईश्वर स्वयं भयानक रूप से लिंगभेद करता है. अगर नहीं तो फिर दूसरी संभावना यह है कि सारे के सारे धर्मग्रंथ पुरूषों द्वारा ही लिखे गए हैं

लेकिन अच्छी छवि वाला भी तो ऐसा कोई धर्माचार्य, मौलवी, ग्रंथी या पादरी नहीं जिसने स्त्रियों के प्रति समाज में पसरी भयानक असंवेदना पर कभी एक शब्द भी कहा हो. जिसने पुरुषों से ऐसी कोई अपील की हो कि वे भी अपनी जिंदगी की महत्वूर्ण स्त्रियों (मां, बहन, जीवनसाथी) के प्रति अपना अटूट प्रेम दिखाने के लिए साल में एक दिन निर्जल व्रत रखें. किसी धर्माचार्य ने नहीं कहा कि दहेज लेने वाले का सामाजिक बहिष्कार किया जाए, बलात्कार या किसी भी तरह के यौन शोषण में लिप्त पुरुष का हुक्का-पानी बंद किया जाए. किसी ने नहीं कहा कि भ्रूण हत्या करने वाले को ईश्वर ने नरक में जाने का आदेश दिया है और उसके लिए ‘नरक के ट्रेलर‘ का इंतजाम इसी जीवन में किया जाए. ऐसी कोई पहल किसी भी धर्म के धर्मगुरू की तरफ से क्या कभी हुई है?

इसके विपरीत लड़कियों को ‘अच्छी बेटी‘, स्त्रियों को ‘अच्छी पत्नी और मां‘ बनने की अंतहीन सलाहें हमेशा दी गई हैं. पतियों के लिए एकाग्र समर्पण रखने, उनकी खुशियों-जरूरतों का हर क्षण ख्याल रखने और उनके लिए हमेशा खड़े रहने की सीख धर्मगुरुओं द्वारा हमेशा दी जाती हैं. लेकिन कभी ऐसी कोई सलाह नहीं आई कि लड़कों को ‘अच्छा बेटा‘ बनना चाहिए पुरुषों को ‘अच्छा पति और पिता‘ बनना चाहिए. क्यों? क्या सारी अच्छाई का ठेका सिर्फ लड़कियों/स्त्रियों ने उठा रखा है? लड़कों/पुरुषों को अच्छा बनने का स्वाद क्यों नहीं चखना चाहिए? क्या ‘अच्छा‘ बनना इतना बेस्वाद है कि वह पुरुषों के चखने लायक चीज ही नहीं? या फिर सारी लड़कियां ही ऐब की पोटली लेकर पैदा हुई हैं कि उन्हें आजीवन अच्छा बनना सीखने में ही अपनी सारी ऊर्जा लगा देनी है?

क्या ‘अच्छा‘ बनना इतना बेस्वाद है कि वह पुरुषों के चखने लायक चीज ही नहीं? या फिर सारी लड़कियां ही ऐब की पोटली लेकर पैदा हुई हैं कि उन्हें आजीवन अच्छा बनना सीखने में ही अपनी सारी ऊर्जा लगा देनी है?

बड़ा सवाल यह भी है कि जब धर्मों, धर्मग्रंथों और धर्मगुरूओं की अधिकतर सीखें स्त्रियों के लिए ही हैं तो कोई धर्मगुरू स्त्री क्यों नहीं है. किसी भी धर्म में सर्वोच्च गुरू स्त्री नहीं है. आज भी किसी स्त्री को सर्वोच्च धर्मगुरू बनने की अनुमति नहीं. यही एक तर्क सारी दुनिया के धर्मग्रंथों और धर्मगुरुओं पर सवाल खड़ा करता है कि इस मामले में भी वही धांधली और लैंगिक असमानता क्यों है जो आम घरों में आम चीजों में होती है. यहीं से सवाल पैदा होता है कि क्या सच में ये सारे धर्मग्रंथ किसी सर्वशक्तिशाली ईश्वर ने लिखे हैं. अगर हां तो ईश्वर स्वयं भयानक रूप से लिंगभेद करता है. अगर नहीं तो फिर दूसरी संभावना यह है कि सारे के सारे धर्मग्रंथ पुरूषों द्वारा ही लिखे गए हैं. तीसरी कोई संभावना इसलिए नहीं बनती, क्योंकि यह संभव ही नहीं कि स्त्रियां धर्मग्रंथ लिखतीं और सारे कड़े नियम, कठोर व्रत, उपवास, तपस्याएं अपने लिए रख लेतीं, पुरुषों को इस सब से मुक्त रखतीं. यह प्रकृति के खिलाफ है कि कोई इंसान स्वयं के लिए कष्ट चुने और अपने साथी को मौज करने दे. यह असंभव है कि कोई अपने लिए तमाम तरह के प्रतिबंध चुने और साथ वाले को अबाध नहीं बल्कि ‘निरंकुश‘ आजादी दे. यदि स्त्रियों ने ही धर्मग्रंथ लिखे होते तो क्या वे अपने ही सर्वोच्च धर्मगुरू बनने पर पाबंदी लगा लेतीं? 

जिस दुनिया में धर्म किसी नशे जैसा हो और धर्मगुरू किसी ईश्वर सरीखे जिनका कहा असंख्य लोग नहीं टालते, उस दुनिया में कितनी आसानी से बड़े-बड़े सामाजिक बदलाव लाए जा सकते हैं. आज के दौर में धर्मगुरू ही हैं जिनकी कही बातें लोग पत्थर की लकीर की तरह मानते हैं, या मानने की कोशिश तो जरूर ही करते हैं. स्त्रियों के साथ भेदभाव, भ्रूण हत्या, दहेज, बलात्कार, यौन शौषण जैसे मुददों पर तो इन धर्मगुरूओं की मदद से युद्ध स्तर पर बदलाव और सुधार लाए सकते हैं, वह भी बिना किसी बड़े तामझाम के या बगैर जबरदस्ती किए. 

लेकिन सभी धर्मों के अधिकतर धर्माचार्य दिन-रात सिर्फ भोग, भावनाओं को भड़काने या फिर सिर्फ स्त्रियों को ही ज्ञान और तरह-तरह की सीख देने में लगे हैं. समाज की किसी भी भयानक समस्या की तरफ से आंखें बंद करके बैठे इन तमाम धर्मगुरूओं को कभी माफ नहीं किया जा सकता. इसलिए कि इन्होंने अपने पद और असीमित ताकत का समाज के हित में वैसा उपयोग नहीं किया जैसा ये कर सकते थे या इन्हें करना चाहिए था. अपनी सत्ता और ताकत का सही उपयोग न करना भी ताकत के दुरुपयोग करने जैसा ही भयानक अपराध है. न सिर्फ भारत के बल्कि पूरी दुनिया के अधिकांश धर्माचार्य इस अपराध के लिए दोषी हैं.

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