हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान के राज के दौरान मैसूर की रियासत और अंग्रेजों के बीच चार युद्ध हुए थे. चौथे युद्ध के बाद मैसूर पर अंग्रेजों का शासन हो गया था. लेकिन पहले तीन युद्ध ऐसे रहे जिनमें अंग्रेजी फौज को काफी नुकसान उठाना पड़ा. इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि मैसूर की सेना के पास रॉकेट थे. इनसे वह दो किलोमीटर दूर तक दुश्मन सेना को निशाना बना सकती थी. इतिहासकारों के मुताबिक युद्ध में रॉकेट तकनीक का इस्तेमाल दुनिया में सबसे पहले (1780 में) दक्षिण भारत की इसी रियासत में हुआ.

संयोग है कि आज भी जब हम भारत में किसी रॉकेट के प्रक्षेपण की खबर सुनते हैं तो वह भी दक्षिण (केरल के थुंबा या आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा) से ही आती है. बुधवार को भी ऐसा ही हुआ जब इसरो ने श्रीहरिकोटा से एक साथ 104 उपग्रह छोड़ने का कारनामा किया और इस मामले में बाकी दुनिया को मीलों पीछे छोड़ दिया. इससे पहले यह रिकॉर्ड रूस के नाम था जिसने 2014 में एक साथ 37 उपग्रहों को प्रक्षेपित किया था

बीती जनवरी में गूगल लूनर एक्स प्राइज की घोषणा हुई तो पता चला कि इसमें से एक पुरस्कार बैंगलोर की इंडस नाम की निजी कंपनी को मिला है. यानी सरकारी संस्थानों के साथ दक्षिण भारत के निजी संस्थान भी इस मामले में पीछे नहीं हैं

रॉकेट विज्ञान में कोई शोध या नई खोज हो तब भी हमें दक्षिण भारत के ही किसी शहर का नाम सुनाई देता है. और तो और, बीती जनवरी में गूगल लूनर एक्स प्राइज (गूगल द्वारा चांद पर उतरने की तकनीक के विकास से जुड़ी एक प्रतियोगिता) की घोषणा हुई तो पता चला कि इसमें एक पुरस्कार बैंगलोर की इंडस नाम की निजी कंपनी को मिला है.

यानी सरकारी संस्थानों के साथ दक्षिण भारत के निजी संस्थान भी इस मामले में पीछे नहीं है. सरकारी संस्थानों की बात करें तो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के 20 सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से 14 दक्षिण के राज्यों में ही हैं. रॉकेट निर्माण से लेकर परीक्षण, लॉन्च और ट्रेकिंग के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र इसी क्षेत्र में हैं. इन सब की बदौलत दक्षिण भारत पूरी दुनिया में रॉकेट विज्ञान का हब बन चुका है. वैसे एक दिलचस्प बात यह भी है कि शिवकाशी नाम का वह मशहूर शहर भी दक्षिण भारत में ही है जहां दीवाली के रॉकेट बनते हैं.

लेकिन क्या वजह रही कि उत्तर भारत इस मामले में पिछड़ गया? दरअसल दक्षिण भारत में अंतरिक्ष संस्थानों के विकास के पीछे इतिहास, विज्ञान और सहूलियत, इन तीनों का मिलाजुला योगदान है. साथ ही इसमें इसरो की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण रही है.

बात 1962 शुरू होती है. तब मशहूर वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा की सलाह पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए एक समिति बनाई थी. इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च यानी इंकोस्पार नाम की इस समिति के प्रमुख विक्रम साराभाई का पहला काम था कि वे ऐसी जगह की खोज करें जहां से विदेशों से मिले प्रायोगिक रॉकेट छोड़े जा सकें. वैज्ञानिक नियमों के हिसाब से इस काम के लिए वे जगहें सबसे उपयुक्त होती हैं जहां से मैग्नेटिक इक्वेटर लाइन गुजरती हो. भारत में ये क्षेत्र देश के दक्षिणी हिस्से में हैं. यही वजह है कि एक अदद प्रक्षेपण केंद्र की खोज भाभा व साराभाई को केरल ले गई. इस तरह से रॉकेट विज्ञान के क्षेत्र में थुंबा के एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने की शुरूआत हुई और इसे रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र के रूप में विकसित किया गया.

भारत को उस समय अमेरिका, सोवियत संघ और फ्रांस से प्रायोगिक रॉकेट मिले थे. थुंबा में इनके प्रायोगिक प्रक्षेपण भारतीय वैज्ञानिकों का अनुभव बढ़ाने में काफी मददगार साबित हुए. अब इन वैज्ञानिकों को स्वदेशी रॉकेटों का परीक्षण करना था. 1969 में इंकोस्पार का नाम औपचारिक रूप से इसरो कर दिया गया. स्वदेशी रॉकेटों के विकास का काम इसी की कमान में होना था.

थुंबा प्रक्षेपण केंद्र में शुरूआत में रॉकेट साइकिल से ढोकर ले जाए जाते थे
थुंबा प्रक्षेपण केंद्र में शुरूआत में रॉकेट साइकिल से ढोकर ले जाए जाते थे

ब रॉकेटों से जो सेटेलाइट छोड़े जाने थे उनके लिए इसरो को पूर्वी तट पर एक बड़े लॉन्चिंग पैड की जरूरत थी. इसके लिए चेन्नई से 100 किलोमीटर उत्तर में श्रीहरिकोटा का चयन किया गया. यह इस लिहाज से भी ठीक था कि इसके एक तरफ बंगाल की खाड़ी है तो दूसरी तरफ जंगल. यदि रॉकेट छोड़ने के बाद यहां कोई दुर्घटना हो भी जाए तो जानमाल के नुकसान की आशंका कम से कम है.

इसके बाद केरल के ही तिरुवअनंतपुरम में लिक्विड प्रॉपल्शन सेंटर की स्थापना हुई. इसका नाम बाद में विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी) कर दिया गया. अब जो रॉकेट इंजन वीएसएससी में बनने थे उनके परीक्षण के लिए पास ही कोई सेंटर बनाने की जरूरत थी तो इसके लिए तमिलनाडु का महेंद्रगिरी चुन लिया गया.

इन सभी केंद्रों से प्रशासनिक तालमेल के लिए बैंगलोर में इसरो का मुख्यालय बन गया. श्रीहरिकोटा और वीएसएससी से इसकी समान दूरी है. बाद में जैसे-जैसे इसरो का विकास हुआ उससे जुड़े दूसरे संस्थान भी बैंगलोर के आसपास ही खुलने लगे जैसे इसरो टेलिमेट्री ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क हेडक्वार्टर और इसरो सेटेलाइट सेंटर आदि.

जो भी रॉकेट इंजन वीएसएससी में बनने थे उनके परीक्षण के लिए पास ही कोई सेंटर बनाने की जरूरत थी. इसके लिए तमिलनाडु का महेंद्रगिरी चुना गया

इसरो से संबद्ध बड़े संस्थानों में डीप स्पेस ट्रेकिंग सेंटर सबसे नया है. इसकी स्थापना 2008 में हुई थी. यह भी दक्षिण भारत यानी कर्नाटक के ब्याललु में बनाया गया है. इस जगह बहुत कम आबादी है और यहां इलेक्ट्रो मैग्नेटिक डिस्टरबेंस भी न्यूनतम है. हैदराबाद में रिमोट सेंसिंग का मुख्य केंद्र बनाया गया क्योंकि यह नए संस्थानों से भी समान दूरी पर स्थित है.

ऐसा नहीं कि उत्तर भारत इस लिहाज से बिल्कुल ही अछूता है. लेकिन यहां इसरो के जो भी संस्थान हैं वे मुख्य रूप से बुनियादी अनुसंधान और पेलोड के निर्माण का काम करते है. अहमदाबाद की फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी में एस्ट्रो फिजिक्स के उच्च अनुसंधान होते हैं. शहर के ही दूसरे संस्थान- स्पेस एप्लीकेशन सेंटर में सेटेलाइट और दूसरे पेलोड का निर्माण किया जाता है. भोपाल में इसरो ने एक ट्रेकिंग सेंटर स्थापित किया है.

दक्षिण भारत में इन संस्थानों के विकास को इस बात से भी जोड़ा जाता है कि ये पाकिस्तान और चीन से काफी दूर हैं. हालांकि बैलेस्टिक मिसाइलों के इस दौर में अब यह दूरी मायने नहीं रखती लेकिन, 1970 के दशक में यह एक महत्वपूर्ण वजह जरूर रही होगी.

इसरो ने अपनी विकास यात्रा विदेशों से आयातित ऐसे रॉकेटों के प्रेक्षेपण से शुरू की थी जो 60 किमी से ऊपर नहीं जा पाते थे. लेकिन आज वह भूस्थैतिक कक्षा (36,000 किमी की ऊंचाई) और मंगल की कक्षा तक में सेटेलाइट भेज चुका है. ये उपलब्धियां उत्तर-दक्षिण, और पूरब-पश्चिम के सभी भारतीयों में समान रूप से गर्व की भावना पैदा करती हैं. यानी जमीन पर जो कुछ भी दिखे आखिर में हमारे रॉकेट विज्ञान ने देश को क्षेत्रीयता से ऊपर उठाने का ही काम किया है.